+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

Article 226 के अधिकार का इस्तेमाल बीमा कंपनी एमओयू के उल्लंघन का आरोप लगाकर मुआवजे को चुनौती देने के लिए उपाय के तौर पर नहीं कर सकतीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की द ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी की याचिका, तीन महीने के भीतर मुआवजे के भुगतान का आदेश

Article 226 के अधिकार का इस्तेमाल बीमा कंपनी एमओयू के उल्लंघन का आरोप लगाकर मुआवजे को चुनौती देने के लिए उपाय के तौर पर नहीं कर सकतीं

Article 226 के तहत मिलने वाले खास अधिकार का इस्तेमाल बीमा कंपनियाँ सिर्फ राज्य सरकार के साथ हुए समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाकर, कल्याणकारी योजनाओं के तहत तय मुआवजे को चुनौती देने के लिए एक आम उपाय के तौर पर नहीं कर सकतीं. Article 226 के तहत ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई करने से रिट अधिकार क्षेत्र एक समानांतर अपीलीय मंच में बदल जाएगा, जहाँ बीमा कंपनी और राज्य सरकार के बीच आपसी अनुबंध संबंधी विवादों का निपटारा होगा, जिससे योजना का मकसद ही खत्म हो जाएगा.

यह व्यवस्था तय करने के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने द ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी की तरफ से Article 226 के तहत दाखिल याचिका को खारिज ​कर दिया है और डीएम के आदेश के मुताबिक मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया है. जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने सुनाया है. कोर्ट में इसे जस्टिस गरिमा प्रसाद ने प्रोनाउंस किया.

बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने व्यावसायिक जोखिमों का आकलन करने और राज्य सरकार द्वारा देय प्रीमियम को स्वीकार करने के बाद स्वेच्छा से समझौते (MoU) के तहत अनुबंध संबंधी दायित्वों को स्वीकार किया था. इसलिए, वह आम तौर पर योजना के तहत लाभार्थी को सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्देशित भुगतान को रोकने के लिए आर्टिकल 226 का सहारा नहीं ले सकता.

Article 226 के तहत ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई करने के नतीजे बहुत गंभीर होंगे. गरीब किसान, विधवाएँ और परिवार के आश्रित सदस्य, जो पहले से ही परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की आकस्मिक मृत्यु से तबाह हो चुके हैं, उन्हें बीमा कंपनी द्वारा शुरू की गई संवैधानिक कार्यवाही का बचाव करने के लिए एक अदालत से दूसरी अदालत भागने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, सिर्फ इसलिए क्योंकि बीमा कंपनी राज्य सरकार के प्रति अपनी अनुबंध संबंधी देनदारियों पर विवाद करती है.

तत्काल वित्तीय राहत के लिए दिए जाने वाले कल्याणकारी मुआवजे को तब तक अनिश्चित काल के लिए नहीं रोका जा सकता जब तक कि बीमा कंपनी सरकार के साथ अपनी व्यवस्था के हर अनुबंध या प्रक्रियात्मक पहलू से पूरी तरह संतुष्ट न हो जाए.
बेंच ने कहा

Article 226 के तहत यह रिट याचिका द ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी की तरफ से दायर की गयी थी

Article 226 के तहत यह रिट याचिका द ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी की तरफ से दायर की गयी थी. इसमें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट कानपुर नगर के आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके तहत श्रीमती रचना सिंह के पक्ष में मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के तहत उनके पति, स्व. भानु प्रताप सिंह की एक्सीडेंटल मौत के कारण पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था.

तथ्यों के अनुसार श्रीमती रचना सिंह के पति की 29.11.2018 को सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. इसके बाद श्रीमती सिंह ने परिवार के कमाने वाले सदस्य की आकस्मिक मौत पर मुआवजे की मांग करते हुए स्कीम के तहत दावा किया. इंश्योरेंस कंपनी ने इस आधार पर दावा खारिज कर दिया कि इसे स्कीम के तहत तय समय सीमा के अंदर जमा नहीं किया गया था. इसके बाद उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और वहां जारी निर्देशों के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने मामले पर फिर से विचार किया और उसके बाद स्कीम के तहत मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया.

Article 226 के तहत याचिकाकर्ता इंश्योरेंस कंपनी के वकील का ने तर्क दिया कि यह स्कीम राज्य सरकार और इंश्योरेंस कंपनी के बीच हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग में शामिल कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के तहत आती है इसलिए कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के खिलाफ मुआवजा नहीं दिया जा सकता था. यह भी कहा गया है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पार्टियों के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से आगे नहीं जा सकते थे.

तर्क दिया गया कि स्कीम के तहत देरी से क्लेम और लिमिटेशन से जुड़ा मुद्दा, जैसा कि इस कोर्ट की डिवीजन बेंच ने गौतम यादव बनाम स्टेट ऑफ यूपी में 2020 SCC ऑनलाइन ऑल 1379 में रिपोर्ट किया था, अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है और उससे होने वाली अंतरिम कार्रवाई में फैसले के लागू होने पर रोक लगा दी गई है.

इसे भी पढ़ें….Advertisement की वैधता को चुनौती दिये बिना उसकी शर्तों पर याचिका दाखिल करके सवाल नहीं खड़े किये जा सकते

दलीलों को देखते हुए कोर्ट के सामने विचार के लिए मुख्य मुद्दा यह था कि क्या मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के तहत मुआवजा देने वाले सक्षम अधिकारी के आदेश को चुनौती देने के लिए बीमा कंपनी द्वारा भारत के संविधान के Article 226 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है?

बेंच ने कहा कि सबसे पहले, योजना की प्रकृति और स्वरूप को समझना जरूरी है. मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना निजी पक्षों के बीच कोई सामान्य व्यावसायिक बीमा व्यवस्था नहीं है. यह योजना राज्य सरकार द्वारा एक कल्याणकारी और सामाजिक सुरक्षा उपाय के रूप में बनाई गई है. इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना है, जब परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की दुर्घटना में मृत्यु हो जाए या वह विकलांग हो जाए.

यह व्यवस्था बीमा कंपनी और राज्य सरकार के बीच हुए समझौता ज्ञापन से उत्पन्न होती है. यह समझौता बातचीत के बाद तय किए गए अनुबंध ढांचे और सरकार द्वारा भारी प्रीमियम के भुगतान के आधार पर किया गया था. Article 226 के तहत याचिकाकर्ता ने योजना की व्यावसायिक व्यवहार्यता का आकलन करने के बाद स्वेच्छा से जोखिम उठाया और अपनी संतुष्टि के अनुसार MoU की शर्तों को स्वीकार किया. जबकि योजना के लाभार्थियों के संबंध में इसका स्वरूप जन-कल्याणकारी है, राज्य सरकार के खिलाफ याचिकाकर्ता द्वारा जताए गए अधिकार मूल रूप से अनुबंध संबंधी और व्यावसायिक प्रकृति के हैं.

इसे भी पढ़ें….वेतनमान के संबंध में सभी संशोधन/सुधार एक सरकारी कर्मचारी के सेवा में रहने के दौरान किया जाना चाहिए, रिटायर होने के 2 साल बाद पेंशन का वसूली आदेश रद

लाभार्थी न तो समझौता ज्ञापन के पक्षकार हैं और न ही याचिकाकर्ता और राज्य सरकार के बीच अनुबंध संबंधी व्यवस्था के पक्षकार हैं. उनका अधिकार राज्य द्वारा बनाई गई कल्याणकारी योजना से उत्पन्न होता है, न कि याचिकाकर्ता और राज्य सरकार के बीच मौजूद अनुबंध संबंधी अधिकारों और दायित्वों से. इसलिए, इनके बीच अंतर करना जरूरी है:

  • (i) सरकारी योजना के तहत सार्वजनिक कानून अधिकारों या कल्याणकारी लाभों को लागू करने का दावा; और
  • (ii) बीमाकर्ता और राज्य सरकार के बीच अनुबंध संबंधी दायित्व और क्षतिपूर्ति से मुख्य रूप से उत्पन्न विवाद.

कोर्ट ने कहा कि जहाँ कोई पात्र लाभार्थी सरकारी योजना के तहत कल्याणकारी लाभों को लागू करने की मांग करता है, वहाँ राज्य अधिकारियों के खिलाफ ‘मैन्डमस’ (आदेश) की मांग करते हुए Article 226 के तहत कार्यवाही स्पष्ट रूप से की जा सकती है, क्योंकि अधिकार का स्रोत सरकारी कल्याणकारी योजना से उत्पन्न होता है.

याचिकाकर्ता बीमा कंपनी की स्थिति बिल्कुल अलग है. याचिकाकर्ता पब्लिक लॉ के तहत किसी कानूनी या संवैधानिक अधिकार को लागू करने की मांग नहीं कर रही है. उसकी मुख्य शिकायत यह है कि राज्य सरकार के साथ हुए समझौते (MoU) के तहत समय-सीमा, क्लेम प्रक्रिया और दायित्व तय करने से जुड़ी शर्तों के खिलाफ मुआवजा देने का आदेश दिया गया है. इसलिए, Article 226 के तहत यह रिट याचिका किसी स्वतंत्र पब्लिक लॉ अधिकार के बजाय MoU के तहत बताए गए अधिकारों को लागू करने की कोशिश है.

इसे भी पढ़ें…. Select आदेश में था नियमानुसार ब्याज देय होगा, टाइप कापी में Foul play कर लिखा पहले वर्ष 9 % और उसके बाद 15% वार्षिक ब्याज देय होगा

बीमा कंपनी के वकील ने ABL इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (2004) 3 SCC 553 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा रिश्ता होने से रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं रुकता, खासकर तब जब राज्य या उसकी संस्था का काम मनमाना हो और विवाद में पब्लिक लॉ का पहलू शामिल हो.

बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य के खिलाफ किसी पब्लिक लॉ अधिकार को लागू करने की मांग नहीं कर रही है. बल्कि, वह राज्य सरकार के साथ हुए समझौते (MoU) में शामिल कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के कथित उल्लंघन का हवाला देकर एक कल्याणकारी योजना के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवजे का विरोध करना चाहती है. लाभार्थी न तो समझौते (MoU) का हिस्सा है और न ही याचिकाकर्ता और राज्य सरकार के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा है और उसे उन कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से जुड़े विवादों का बचाव करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिनसे उसका कोई लेना-देना नहीं है.

इसे भी पढ़ें…. New tax system को चुनने के बाद हाईकोर्ट जज (सैलरी और सर्विस की शर्तें) अधिनियम, 1954 की धारा 22 डी के तहत तय कानूनी अलाउंस पर छूट न मिलने को चुनौती

बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता-बीमा कंपनी की ओर से दायर वर्तमान रिट याचिका संविधान के Article 226 के तहत सुनवाई योग्य नहीं है. इस न्यायालय को विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं दिखता. जिला मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट रूप से पाया है कि दावा निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रस्तुत किया गया था और महिला योजना के तहत मुआवजा पाने की हकदार है. इसमें कोई मनमानी, अधिकार क्षेत्र की त्रुटि या स्पष्ट अवैधता नहीं दिखाई गई है जो संविधान के Article 226 के तहत हस्तक्षेप को उचित ठहरा सके.

बेंच ने कहा कि एक बार जब जिला मजिस्ट्रेट ने दावे का निपटारा कर दिया और लाभार्थी को योजना के तहत मुआवजे का हकदार ठहराया, तो याचिकाकर्ता-बीमा कंपनी राज्य सरकार के साथ समझौते (MoU) को नियंत्रित करने वाली अनुबंध संबंधी शर्तों की अपनी व्याख्या के आधार पर भुगतान से इनकार नहीं कर सकती. ऐसा नहीं माना गया, तो असल में इंश्योरेंस कंपनी को इस स्कीम के तहत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के हर फैसले के खिलाफ अपील करने का अधिकार मिल जाएगा, ऐसा न तो स्कीम में सोचा गया था और न ही पार्टियों के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट के नियमों में. कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए तीन महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया है.

इसे भी पढ़ें…. न्याय होना ही काफी नहीं, न्याय होते हुए दिखना भी जरूरी है, Bail को लेकर दाखिल 80 अर्जियों पर जस्टिस ने किया खुद को सुनवाई से अलग

WRIT – C No. – 16530 of 2026; The Oriental Insurance Company Limited Vs. Smt Rachna Singh and 2 others

इसे भी पढ़ें….Evidence Act के सेक्शन 26 के अनुसार मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में दिया गया बयान ही उस व्यक्ति के खिलाफ साबित माना जाएगा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *