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Evidence Act के सेक्शन 26 के अनुसार मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में दिया गया बयान ही उस व्यक्ति के खिलाफ साबित माना जाएगा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, Evidence Act के तहत पुलिस की कस्टडी में दिया गया इकबालिया बयान मान्य नहीं

Evidence Act के सेक्शन 26 के अनुसार मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में दिया गया बयान ही उस व्यक्ति के खिलाफ साबित माना जाएगा

Evidence Act एक्ट, 1872 का सेक्शन 26 यह प्रावधान करता है कि पुलिस अधिकारी की कस्टडी में रहते हुए किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई भी इकबालिया बयान उस व्यक्ति के खिलाफ तब तक साबित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह मजिस्ट्रेट की सीधी मौजूदगी में न दिया गया हो. सेक्शन 27 Evidence Act के सेक्शन 26 का एक अपवाद है. इसमें कहा गया है कि जब किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति से किसी तथ्य का पता चलता है (जबकि वह व्यक्ति पुलिस कस्टडी में हो) तो उस जानकारी का वह हिस्सा जो सीधे तौर पर पता चले तथ्य से संबंधित हो, उसे साबित किया जा सकता है.

Evidence Act के सेक्शन 27 के तहत यह जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति ‘किसी अपराध का आरोपी’ हो और ‘पुलिस अधिकारी की कस्टडी’ में हो; उसे ऐसी जानकारी देनी चाहिए जिससे किसी तथ्य का पता चले और उस जानकारी का वह हिस्सा जो सीधे तौर पर पता चले तथ्य से संबंधित हो, उसके खिलाफ साबित किया जा सकता है.

असल में, दोनों पहलू – यानी ‘पुलिस अधिकारी की कस्टडी’ में होना और ‘किसी अपराध का आरोपी’ होना – पुलिस के सामने दिए गए इकबालिया बयान को सीमित हद तक स्वीकार्य बनाने के लिए जरूरी शर्तें हैं, क्योंकि ये Evidence Act के सेक्शन 27 के तहत बताए गए अपवाद को लागू करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा Evidence Act के प्रावधान तय

सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘राजेश और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ द्वारा Evidence Act के प्रावधानों को लेकर तय की गयी इस कानूनी व्यवस्था के आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोरखपुर के रहने वाले एक महिला समेत तीन आरोपियों को हत्या और साक्ष्यों को गायब कर देने के आरोपों से मुक्त करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की बेंच ने गोरखपुर के रहने वाले गुलाबी देवी, राजेंद्र चौधरी और शिवप्रसाद चौधरी की अपील को मंजूर करते हुए सुनाया है.

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यह अपील गुलाबी देवी, राजेंद्र चौधरी और शिवप्रसाद चौधरी ने सेशंस कोर्ट के 20.05.2022 के उस फैसले से जुड़ी है जो सेशंस ट्रायल नंबर 201/2013 (राज्य बनाम गुलाबी देवी और अन्य) में सुनाया गया था. जिस FIR के आधार पर यह फैसला आया, वह गोरखपुर जिले के कैंपियरगंज पुलिस स्टेशन में केस क्राइम नंबर 345/2012 के तहत IPC की धारा 302 और 201 के तहत दर्ज की गई थी.

ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में अपीलकर्ताओं को IPC की धारा 302 के तहत दोषी पाया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा के साथ 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया. ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को IPC की धारा 201 के तहत भी दोषी पाया और उन्हें पांच साल की कठोर कैद की सजा सुनाई और 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया.

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अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, रामकिशोर (शिकायतकर्ता के पिता) के गुलाबी देवी के साथ अवैध संबंध थे. 16.12.2012 को रामकिशोर मोटरसाइकिल से चकदाहा के लिए निकले ताकि गुलाबी देवी को वे गहने दे सकें जो उन्होंने उसके लिए खरीदे थे. चकदाहा पहुँचने के बाद, उन्होंने अपने परिवार को बताया कि वे अगले दिन घर लौटेंगे.

शिकायत करने वाले के चाचा जगदीश ने शाम को उन्हें बजे कैम्पियरगंज से नौतनवा जाने वाली सड़क पर धनिडाला के पास रामकिशोर को गुलाबी देवी, राजेंद्र और शिव प्रसाद के साथ देखा था. राजेंद्र और शिव प्रसाद के भी उस गुलाबी देवी के साथ नाजायज संबंध थे. रामकिशोर अगले दिन घर नहीं लौटा और उसके मोबाइल फोन बंद थे.

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परिवार वाले उसे ढूंढते हुए 23.12.2012 को चकदाहा गांव पहुंचे. चकदाहा में कई लोगों ने उन्हें बताया कि गुलाबी देवी, राजेंद्र और शिव प्रसाद ने रामकिशोर की हत्या कर दी थी और उसकी लाश राप्ती नदी के पास मिरहिरिया गांव में फेंक दी थी. शिकायत करने वालों को मृतक की लाश नदी के पास मिली. FIR दर्ज होने के बाद पुलिस जांच शुरू हुई. 26.01.2013 को अपील करने वालों के खिलाफ IPC की धारा 302/201 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई. ट्रायल कोर्ट ने 16.05.2013 को अपराध का संज्ञान लिया. ट्रायल कोर्ट ने 02.07.2014 को अपील करने वालों के खिलाफ आरोप तय किए.

दोनों पक्षों की तरफ से पेश किये गये तर्कों को सुनने के बाद दो जजों की बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने FIR दर्ज करने में हुई देरी और अपराध करने के पीछे अपील करने वालों के मकसद को साबित करने में अभियोजन पक्ष की विफलता पर ध्यान नहीं दिया.कोर्ट ने दोषी Evidence Act के तहत गवाहों के पुलिस कस्टडी में दिये गये बयान के आधार पर ठहराने में गलती की.

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दोषी साबित करने वाली परिस्थितियों की कड़ी नहीं बन पाई थी और आरोपी के बेगुनाह होने की संभावना बहुत मजबूत थी. इसके आधार पर बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला गलत और रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों के खिलाफ है. बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी अपीलकर्ताओं के खिलाफ दोषी साबित करने वाली परिस्थितियों की कड़ी स्थापित नहीं कर सका.

अभियोजन पक्ष अपीलकर्ताओं के खिलाफ IPC की धारा 302 और 201 के तहत आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है. आरोपी अपीलकर्ताओं को उन आरोपों से बरी किया जाता है जो ट्रायल कोर्ट द्वारा उन पर लगाए गए थे और जो इस अपील का विषय हैं. इसी के साथ बेंच ने सेशन ट्रायल नंबर 201/2013 (स्टेट बनाम गुलाबी देवी और अन्य) में 18.05.2022 और 20.05.2022 के आदेश को रद्द कर दिया और तीनों अपीलकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया.

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