Pay scale के संबंध में सभी संशोधन/सुधार एक सरकारी कर्मचारी के सेवा में रहने के दौरान किया जाना चाहिए, रिटायर होने के 2 साल बाद पेंशन का वसूली आदेश रद
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, कर्मचारी को गलती से भुगतान किया गया कोई भी वेतन रिटायर होने के बाद वापस नहीं लिया जा सकता

याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के लगभग दो साल बाद पारित किया गया आदेश, जिसके तहत याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के बाद याचिकाकर्ता का Pay scale कम करने की मांग की जा रही है, सुशील कुमार सिंघल (सुप्रा) के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा व्याख्या की गई उपरोक्त सरकारी आदेश के आलोक में टिकाऊ नहीं है. इसके आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की बेंच ने निदेशक, आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएँ, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के आदेश को रद कर दिया है.
यह याचिका डॉ श्याम प्रकाश श्रीवास्तव की ओर से निदेशक, आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएँ, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के 26.08.2014 के आदेश को रद करने, उस आदेश को रद्द करने जिसमें याचिकाकर्ता को 7600 रुपये के Pay scale में सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था.
याचिका में Pay scale में पेंशन संबंधी लाभों के भुगतान में देरी के लिए दंड-स्वरूप ब्याज का भुगतान किये जाने की मांग में दाखिल की गयी थी
याचिकाकर्ता को 8700 रुपये के वेतन ग्रेड में पेंशन, जीपीएफ, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट, राशिकरण आदि जैसे पेंशन संबंधी लाभ दिलाने, याचिकाकर्ता के पेंशन संबंधी लाभों की गणना 8700 रुपये के Pay scale में करने के लिए 18.06.1988 से 21.01.1991 तक की उसकी एडहॉक सेवाओं को एड करने के साथ 8700 रुपये के Pay scale में पेंशन संबंधी लाभों के भुगतान में देरी के लिए दंड-स्वरूप ब्याज का भुगतान किये जाने की मांग में दाखिल की गयी थी.
तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता को 18.06.1988 को चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर एड-हॉक आधार पर नियुक्त किया गया था. उनकी सेवाओं को 21.01.1991 को नियमित कर दिया गया. 31.10.2012 को रिटायरमेंट के बाद से, याचिकाकर्ता को पेंशन से जुड़े लाभ और रिटायरमेंट के समय मिलने वाली बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया.
याचिकाकर्ता ने रिट याचिका संख्या 12393/2013 दायर करके इस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसका निपटारा 06.03.2013 के आदेश के माध्यम से निम्नलिखित टिप्पणियों के साथ किया गया:
“याचिकाकर्ता के वकील और प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए स्टैंडिंग काउंसिल की दलीलें सुनीं और रिकॉर्ड देखा. याचिकाकर्ता का मामला यह है कि वे 31 अक्टूबर, 2012 को मेडिकल ऑफिसर के पद से रिटायर हुए. उनका कहना है कि हालांकि उन्होंने रिटायरमेंट के समय मिलने वाली बकाया राशि के भुगतान से जुड़ी सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं, फिर भी उन्हें इसका भुगतान नहीं किया गया है.”
रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली रकम और पेंशन का भुगतान कोई मेहरबानी या इनाम नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे सालों में दी गई सेवाओं के बदले में होता है. रिटायरमेंट के तुरंत बाद नहीं तो कम से कम उचित समय के भीतर इसका भुगतान किया जाना चाहिए. कहा गया है कि ऐसी शिकायतों के संबंध में याचिकाकर्ता ने संबंधित अधिकारियों के सामने कई बार अपनी बात रखी है, लेकिन अभी तक उन पर कोई फैसला नहीं लिया गया है.
रिट याचिका को निस्तारित करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्ता रिट याचिका में उठाई गई अपनी शिकायतों के संबंध में निदेशक, आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएँ, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के समक्ष इस आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ एक नया और विस्तृत अभ्यावेदन दाखिल करता है, तो उस पर कानून के अनुसार, उचित कारणों और तर्कों के साथ छह सप्ताह के भीतर—विचार किया जाएगा और निर्णय लिया जाएगा. य

ह भी निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता जिस भी Pay scale राशि का हकदार पाया जाता है, उसका भुगतान उसके अभ्यावेदन पर निर्णय की तारीख से एक महीने के भीतर उसे कर दिया जाएगा. रिट याचिका पर फैसला आने के बाद याचिकाकर्ता ने प्रतिवादियों को एक विस्तृत आवेदन दिया गया. चूंकि कोई उचित निर्णय नहीं लिया गया और याचिकाकर्ता को पेंशन से जुड़े लाभ नहीं दिए गए, इसलिए उन्होंने अवमानना याचिका संख्या 3005/2014 दायर की.
इसके परिणामस्वरूप, 20.01.2014 के आदेश के तहत, याचिकाकर्ता को उनके Pay scale के आधार पर एक साल के लिए अस्थायी पेंशन दी गई. इसके बाद, 26.08.2014 के विवादित आदेश के माध्यम से प्रतिवादियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि याचिकाकर्ता ने 26 साल की सेवा पूरी नहीं की थी, इसलिए वे तीसरे ACP के हकदार नहीं थे. उन्हें पहले ही 01.12.2008 को दूसरा ACP दिया जा चुका था, जिसके अनुसार उन्हें 7,600 का Pay scale मिलना चाहिए था, न कि 8,700 का Pay scale पे, जो उन्हें दिया जा रहा था.
उन्होंने याचिकाकर्ता की पेंशन को 8,700 के बजाय 7,600 के Pay scale के आधार पर फिर से तय किया. याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सेवा रिकॉर्ड के अनुसार, उनके नौकरी शुरू करने की तारीख 28.06.1988 है. 28.06.1996 को उन्होंने 8 साल की सेवा पूरी की और उसके बाद 28.06.2002 को 14 साल की सेवा पूरी की, जब उन्हें 7,600 का Pay scale दिया गया था.
याचिकाकर्ता के अनुसार, 28.06.2002 को दूसरा ACP मिलने के बाद 8 साल की सेवा पूरी होने पर, उन्हें 28.06.2010 को तीसरे ACP के तौर पर 8,700 का ग्रेड पे दिया गया था. यह या तो 26 साल की सेवा पूरी होने पर या दूसरी ACP मिलने के आठ साल पूरे होने पर देय था.
प्रतिवादियों के लिए यह जरूरी था कि वे याचिकाकर्ता की नौकरी के दौरान वेतन (Pay scale) तय करने में अगर कोई कमी रह गई थी, तो उसे ठीक करते. साथ ही, याचिकाकर्ता के रिटायर होने के बाद, उन्हें मिलने वाले पेंशन के फायदे उनकी आखिरी सैलरी के आधार पर तय होने चाहिए थे. प्रतिवादियों के लिए 34 महीने के बाद इस मामले को फिर से खोलना सही नहीं है.
इसलिए, 07.12.2010 के आदेश के जरिए याचिकाकर्ता को 28.06.2010 से तीसरा ACP दिया गया था और इसमें कोई गड़बड़ी नहीं थी. याचिकाकर्ता के रिटायर होने के बाद, प्रतिवादियों के लिए उनके वेतन-मान (पे-स्केल) तय करने के मामले को फिर से खोलना सही नहीं है. यह काम याचिकाकर्ता की नौकरी के दौरान ही हो जाना चाहिए था.
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सुशील कुमार सिंघल बनाम प्रमुख सचिव, सिंचाई विभाग और अन्य’ (2014) 16 SCC 444 मामले के फैसले का हवाला दिया. इस मामले में उत्तराखंड सरकार ने 16.01.2007 को वैसा ही सरकारी आदेश जारी किया था. उस आदेश की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा था कि उस सरकारी आदेश के तहत, रिटायरमेंट के बाद न तो अपीलकर्ता को गलती से दी गई सैलरी वापस ली जा सकती थी और न ही उनकी पेंशन कम की जा सकती थी.
इसलिए, याचिकाकर्ता के वकील ने विवादित आदेश को रद्द करने और यह निर्देश देने की मांग की है कि याचिकाकर्ता को मिलने वाले पेंशन के फ़ायदों की गणना और भुगतान उनके रिटायरमेंट के समय मिली आखिरी सैलरी (Pay scale) के आधार पर किया जाए.
इसके उलट, राज्य के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल का कहना है कि 14 साल की सर्विस पूरी होने पर याचिकाकर्ता को जो पर्सनलाइज्ड Pay scale दिया गया था, वह दूसरी ACP स्कीम के तहत मिलने वाला फायदा नहीं था. वह इसके हक़दार तभी थे जब उन्होंने 16 साल की संतोषजनक सर्विस पूरी कर ली हो. याचिकाकर्ता 01.12.2008 से 16 साल की संतोषजनक सर्विस पूरी करने पर केवल 7,600 के Pay scale पर दूसरी ACP के हकदार थे.
इसलिए रिटायरमेंट के बाद जरूरी सुधार किया गया क्योंकि 15.11.2011 के सरकारी आदेश का फ़ायदा उन्हें गलती से दिया गया था. तर्क दिया कि सर्विस के दौरान याचिकाकर्ता को गलती से दिए गए Pay scale को ठीक करने में कोई गैर-कानूनी बात नहीं है और अगर ऐसा सुधार करने की इजाजत नहीं दी जाती है, तो इससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान होगा.
वकील द्वारा की गई प्रतिद्वंद्वी दलीलों को सुनने के बाद, इस न्यायालय ने मामले के रिकॉर्ड को ध्यान से देखा है. मामले के रिकॉर्ड से, यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता की ज्वाइनिंग तिथि 28.06.1988 है, उसने 28.06.1996 को 8 साल की सेवा पूरी की और 28.06.2002 को उसने 14 साल की सेवा पूरी की और तदनुसार उसे 14 साल की सेवा पूरी करने पर 7,600 के Pay scale पर और 8 साल के बाद व्यक्तिगत Pay scale प्रदान किया गया, तब से Pay scale का याचिकाकर्ता को आदेश 07.12.2010 से 8,700 रुपये दिए गए हैं.
28.06.2010 और याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के समय, याचिकाकर्ता को 8,700 का Pay scale वेतन मिल रहा था और इसके संदर्भ में याचिकाकर्ता को एक वर्ष के लिए दिनांक 20.01.2014 के आदेश के तहत अनंतिम पेंशन भी प्रदान की गई थी. इसके बाद, 28.06.2014 के आक्षेपित आदेश के माध्यम से राज्य ने Pay scale को संशोधित करने और कम करने की मांग की है, जो याचिकाकर्ता को पहले ही दिया गया था.
16.01.2007 के सरकारी आदेश में विशेष रूप से प्रावधान है कि वेतनमान के संबंध में सभी संशोधन/सुधार एक सरकारी कर्मचारी के सेवा में रहने के दौरान किया जाना चाहिए था और यह उसकी सेवानिवृत्ति के बाद नहीं किया जा सकता है और उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी पूर्वोक्त समान सरकारी आदेश के प्रावधानों की व्याख्या शीर्ष न्यायालय द्वारा की गई थी, जिसमें शीर्ष न्यायालय ने माना था कि अपीलकर्ता को गलती से भुगतान किया गया कोई भी वेतन वापस नहीं लिया जा सकता था और न ही अपीलकर्ता की पेंशन की वसूली की जा सकती थी. उनकी सेवानिवृत्ति के बाद यह कम हो गया.
इस मामले को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के लगभग दो साल बाद पारित किया गया आदेश, जिसके तहत याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के बाद याचिकाकर्ता का Pay scale कम करने की मांग की जा रही है, सुशील कुमार सिंघल (सुप्रा) के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा व्याख्या की गई उपरोक्त सरकारी आदेश के आलोक में टिकाऊ नहीं है.
ऐसे में 26.08.2014 का आक्षेपित आदेश कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है. उत्तरदाताओं को याचिकाकर्ता को उसकी सेवानिवृत्ति के समय प्राप्त अंतिम वेतन (Pay scale) के अनुसार याचिकाकर्ता को सभी पेंशन और अन्य लाभ देने का निर्देश दिया है.