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विधानसभाओं के लिए Reservation रोटेशन का मामला विधायी अधिकार क्षेत्र में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा

विधानसभाओं के लिए Reservation रोटेशन का मामला विधायी अधिकार क्षेत्र में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा

संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी Reservation कानून को तब तक असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता जब तक यह साबित न हो जाए कि संबंधित विधानमंडल के पास कानून बनाने की क्षमता नहीं है या यह संविधान के भाग III में बताए गए मौलिक अधिकारों या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करता है. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने सुल्तानपुर जिले के रहने वाले जगदीश सिंह की तरफ से दाखिल याचिका खारिज करते हुए सुनाया है.

बेंच ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि कोर्ट राज्य को विधानसभा/संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST के लिए Reservation में रोस्टर लागू करने के लिए मजबूर करने वाला कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता, क्योंकि इस मुद्दे पर विचार करना संसद का काम है.

कोर्ट ने कहा कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST की आबादी तुलनात्मक रूप से अधिक है, वहां SC/ST उम्मीदवार अपनी बड़ी आबादी के कारण बिना Reservation की मदद के भी चुने जा सकते हैं. संविधान में दिए गए सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय और समानता के लक्ष्यों को सीटों के रोटेशन के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जिससे SC/ST उम्मीदवार उन सीटों से भी चुने जा सकें जहां उनकी आबादी निर्वाचन क्षेत्र की कुल आबादी की तुलना में काफी कम है.

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Reservation Rotation मुद्दे पर विचार करना और अपनी समझ के अनुसार कानून बनाना संसद का काम है और कानून के स्थापित सिद्धांतों को देखते हुए यह कोर्ट राज्य को विधानसभा/संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST के लिए Reservation में रोस्टर लागू करने के लिए मजबूर करने वाला कोई निर्देश जारी नहीं कर सकती. याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कादीपुर विधानसभा क्षेत्र का निवासी और मतदाता है ने अनुसूचित जाति श्रेणी के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में लगातार Reservation को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की.

निर्वाचन क्षेत्र में लगातार Reservation को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की

याचिकाकर्ता का कहना था कि यह सीट लगभग छह दशकों से लगातार आरक्षित रही है, जिससे ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 5(a) के तहत लगी रोक के कारण वह अपनी पसंद के सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट नहीं दे पा रहा है. याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति के लिए निर्वाचन क्षेत्र घोषित करने वाली अधिसूचना को रद्द करने और ‘परिसीमन अधिनियम, 2002’ की धारा 9(1)(c) के एक हिस्से को भारत के संविधान के खिलाफ (अल्ट्रा वायर्स) घोषित करने की मांग की.

तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को पीढ़ियों से Reservation के लिए जाति-आधारित वोट देने के लिए मजबूर किया गया जो कि भेदभावपूर्ण था और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन था. संविधान का अनुच्छेद 332 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के Reservation का प्रावधान करता है, लेकिन इसमें कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि इन श्रेणियों की बड़ी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्र रोटेशन के सिद्धांत को लागू किए बिना हमेशा आरक्षित ही रहें.

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परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) के कारण एक ही निर्वाचन क्षेत्र में स्थायी ठहराव और अनिश्चितकालीन Reservation की स्थिति पैदा होती है जो सीधे तौर पर संविधान की प्रस्तावना के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य के खिलाफ है. अदालत ने केस की सुनवाई की योग्यता से जुड़ी शुरुआती आपत्ति को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि संविधान के आधार पर परिसीमन आयोग के आदेशों की वैधता की जांच के लिए अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की जा सकती है, खासकर तब जब किसी कानूनी प्रावधान की वैधता को चुनौती दी जा रही हो.

कोर्ट ने फैसले के लिए दो मुद्दे तय किय

  • 1. क्या अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) इस आधार पर असंवैधानिक (ultra vires) है कि यह उन क्षेत्रों में Reservation श्रेणी के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के आवंटन का प्रावधान करती है जहाँ उनकी आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है, लेकिन Reservation में रोटेशन का कोई प्रावधान नहीं है. इसके परिणामस्वरूप, कोई विशेष सीट हमेशा के लिए आरक्षित श्रेणी के लिए आरक्षित रह जाती है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 330 और 332 का उल्लंघन है.
  • 2. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, यह अदालत विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर Reservation देने के लिए निर्देश जारी कर सकती है?

मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 आरक्षित सीटों की पहचान करने की सटीक प्रक्रिया के बारे में चुप हैं और लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के लिए Reservation रोटेशन सिस्टम को अनिवार्य नहीं करते हैं, जबकि पंचायतों और नगर पालिकाओं के लिए ऐसे स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं.

अदालत ने माना कि वोट देने या चुनाव लड़ने का अधिकार कानून द्वारा तय सीमाओं के अधीन एक संवैधानिक अधिकार है और कोई नागरिक उचित रूप से यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसके अधिकारों में बाधा डाली गई है, सिर्फ इसलिए कि कोई निर्वाचन क्षेत्र संवैधानिक योजना के अनुरूप आरक्षित किया गया है.

अदालत ने कानून की स्थापित स्थिति को दोहराया कि किसी कानून को केवल “मनमाना” होने के आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें विधायी क्षमता की कमी न हो या वह विशिष्ट मौलिक अधिकारों या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन न करता हो. कोर्ट ने कहा, “धारा 9(1)(c) के प्रावधान न तो संविधान के भाग III में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और न ही किसी संवैधानिक प्रावधान का.

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चूंकि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षण के लिए कोई तरीका नहीं बताया गया है और संसद को कानून के जरिए उचित उपाय करने की छूट दी गई है, इसलिए 2002 का कानून बनाकर ऐसा किया गया है. यह कानून उन इलाकों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के Reservation का प्रावधान करता है जहां उनकी आबादी तुलनात्मक रूप से ज्यादा है.

कोर्ट ने कहा कि विधायिका को आबादी पर आधारित Reservation रोस्टर या Reservation रोटेशन का सिद्धांत अपनाने का निर्देश देना पूरी तरह से संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है, और न्यायपालिका कानून बनाने और न्यायिक निर्णय लेने के बीच की बारीक रेखा को पार किए बिना कानून को फिर से नहीं बना सकती, न ही उसमें बदलाव कर सकती है और न उसे अनिवार्य कर सकती है.

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नतीजतन, कोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी और सामाजिक व राजनीतिक न्याय के व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सीटों के रोटेशन के मुद्दे पर विचार करने का काम संसद की समझदारी पर छोड़ दिया.

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