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GST Act मौजूद तो सामान्य दंड कानून के प्रावधानों का सहारा तभी सही जब आरोप अपराध के जरूरी तत्वों को स्वतंत्र रूप से दिखाते हों

इलहाबाद हाई कोर्ट ने बस्ती के ग्राम पंचायत सचिव को दी राहत, केस कार्रवाई रद की

GST Act मौजूद तो सामान्य दंड कानून के प्रावधानों का सहारा तभी सही जब आरोप अपराध के जरूरी तत्वों को स्वतंत्र रूप से दिखाते हों

कानूनी ढांचा साफ तौर पर दिखाता है कि विधायिका ने GST Act के तहत एक पूरा कोड बनाया है. यह GST Act अमाउंट की कटौती न करने, कम कटौती करने, देर से जमा करने या जमा न करने से पैदा होने वाली सभी स्थितियों से निपटने के लिए है. GST Act  में देनदारी तय करना, ब्याज लगाना,

जुर्माना लगाना, कानूनी कार्रवाई और अपराधों को कंपाउंड करना शामिल है. जब किसी खास ने किसी क्षेत्र के लिए पूरी व्यवस्था (GST Act) बना दी हो तो सामान्य दंड कानून के प्रावधानों का सहारा तभी सही ठहराया जा सकता है जब आरोप अलग-अलग आपराधिक अपराधों जैसे बेईमानी से गबन, जालसाजी, रिकॉर्ड में हेरफेर, धोखाधड़ी या गलत तरीके से फायदा उठाना के जरूरी तत्वों को स्वतंत्र रूप से दिखाते हों.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में दर्ज केस नंबर 1325/2026 (राज्य बनाम निसार अहमद और अन्य) की कार्यवाही जो केस क्राइम नंबर 215/2024 (धारा 316(5) B.N.S. से उत्पन्न हुई है और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट बस्ती के समक्ष लंबित है को आवेदक तनवीर अशरफ के संबंध में रद्द कर दिया है. इस आदेश के साथ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह आदेश संबंधित अधिकारियों को U.P. GSTAct, 2017 के प्रावधानों का सख्ती से पालन करते हुए यदि आवश्यक हो तो आवेदक के खिलाफ कार्यवाही करने से नहीं रोकेगा.

यह याचिका बस्ती के तनवीर अशरफ की तरफ से हाई कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 528 के तहत दायर की गई थी. इसमें 01.09.2025 की चार्जशीट, 02.04.2026 के संज्ञान/समन आदेश और केस नंबर 1325/2026 (राज्य बनाम निसार अहमद और अन्य) की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गयी थी. यह केस, केस क्राइम नंबर 215/2024 से निकला था जो भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5) के तहत थाना नगर, जिला बस्ती में दर्ज हुआ था और प्रोसीडिंग बस्ती के सीजेएम की कोर्ट में पेंडिंग है.

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केस के तथ्यों के अनुसार आवेदक जब ग्राम पंचायत सचिव के पद पर तैनात था तो ग्राम सभा के विकास कार्यों के लिए किए गए भुगतान से काटे गए GST / TDS की रकम को देर से जमा करने या जमा न करने के आरोप लगे थे. लोकायुक्त के पास की गई शिकायत के बाद जांच की गई. इसके आधार पर आवेदक और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज करायी गयी.

जांच पूरी होने पर जांच अधिकारी ने आवेदक और सह-आरोपियों के खिलाफ B.N.S. की धारा 316(5) के तहत 01.09.2025 को चार्जशीट दाखिल की. इसके बाद, बस्ती के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया और केस नंबर 1325/2026 (राज्य बनाम निसार अहमद और अन्य) में 02.04.2026 को समन आदेश जारी किया.

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आवेदक का पक्ष रखते हुए उसके अधिवक्ता ने कहा कि जांच रिपोर्ट और FIR में जो आरोप लगाया गया है, वह सिर्फ इस बात तक सीमित है कि कुछ ग्राम सभा के कामों के लिए खरीदे गए सामान पर GST / TDS कटौती की ₹8,629/- की रकम समय पर सरकारी खाते में जमा नहीं की गई थी.

यह भी बताया गया कि कथित तौर पर रकम जमा न होने की जानकारी मिलते ही आवेदक ने सह-आरोपियों के साथ मिलकर पूरी रकम सरकारी खाते में जमा कर दी और सक्षम अधिकारी के सामने रसीदें पेश कीं, जिससे यह साबित होता है कि उनकी कोई बेईमानी की मंशा या गलत तरीके से फायदा उठाने की कोई कोशिश नहीं थी.

U.P. Goods and Services Tax Act, 2017 (GST Act ) एक पूरा और अपने आप में सक्षम स्पेशल कानून

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जिस अभियोजन को चुनौती दी गई है वह पूरी तरह से गैर-कानूनी है और कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, क्योंकि पूरा आरोप सिर्फ GST /TDS की रकम देर से जमा करने या जमा न करने से जुड़ा है. आवेदक पर गबन, आपराधिक हेराफेरी या गलत तरीके से फायदा उठाने का कोई आरोप नहीं लगाया गया है. यह भी कहा गया है कि U.P. Goods and Services Tax Act, 2017 (GST Act) एक पूरा और अपने आप में सक्षम स्पेशल कानून है. GST Act में टैक्स कटौती, निर्णय, जुर्माना और अभियोजन से जुड़ी पूरी व्यवस्था दी गई है.

GST Act की धाराओं 51, 122, 126 और 127 का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि GST की रकम देर से जमा करने या जमा न करने का मामला खास तौर पर GST Act के कानूनी ढांचे के तहत आता है. जब आरोप पूरी तरह से GST Act के दायरे में आते हैं तो B.N.S. के तहत सामान्य दंड प्रावधानों को लागू करना सही नहीं है.

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वकील ने यह भी तर्क दिया कि कथित घटना वित्तीय वर्ष 2017-18 की है जबकि FIR (19.10.2024), चार्ज शीट (01.09.2025) और संज्ञान लेने का आदेश (02.04.2026) BNS, 2023 के प्रावधानों के तहत जारी किए गए हैं, जो जाहिर तौर पर बाद में लागू हुआ था. वकील का कहना है कि दंड प्रावधानों को पिछली तारीख से लागू करना संवैधानिक रूप से सही नहीं है और इसलिए BNS के तहत FIR दर्ज करना, चार्ज शीट दाखिल करना और संज्ञान लेना कानून की नजर में गैर-कानूनी और टिकने लायक नहीं है.

इन तर्कों के समर्थन में Sharat Babu Digumarti Vs. Government of NCT of Delhi (2017 (2) SCC 18) और Deepu & Others Vs. State of U.P. (2024 (8) ILRA 903) के मामलों का हवाला दिया गया.

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इसके विपरीत, A.G.A. का कहना था कि जिस चार्ज शीट को चुनौती दी गई है, वह उचित जांच के बाद दाखिल की गई है और जांच के दौरान आवेदक के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सबूत इकट्ठा किए गए हैं. आवेदक तय समय के भीतर काटे गए GST /TDS की रकम जमा करने में नाकाम रह इसलिए इस चरण पर आपराधिक दायित्व से इनकार नहीं किया जा सकता.

दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर लाए गए दस्तावेजों को देखने के बाद, इस कोर्ट के सामने विचार के लिए निम्नलिखित मुद्दे थे:-

  • क्या राज्य के अधिकारी U.P. Goods and Services Tax Act (GST Act) के दंड प्रावधानों और अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया को लागू किए बिना, IPC/B.N.S. के दंड प्रावधानों के तहत आपराधिक मुकदमा शुरू कर सकते हैं?
  • क्या वित्तीय वर्ष 2017-18 से जुड़ी कथित घटना के संबंध में Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के प्रावधानों के तहत दर्ज FIR, चार्जशीट और संज्ञान लेना कानून की नजर में कानूनी रूप से सही है?

रिकॉर्ड से पता चलता है कि आवेदक पर एकमात्र आरोप ग्राम सभा के कामों को पूरा करने के संबंध में काटे गए GST /TDS की रकम को देर से जमा करने या जमा न करने का है. इस चरण पर, यह ध्यान देना उचित होगा कि GST Act एक पूरा और अपने आप में सक्षम विशेष कानून है, जो टैक्स काटने, असेसमेंट, फैसले, जुर्माने और मुकदमे से संबंधित व्यापक व्यवस्था प्रदान करता है. इसलिए, GST Act के उन संबंधित प्रावधानों की जांच करना आवश्यक है जिनका इस मामले में शामिल विवाद पर सीधा असर पड़ता है.

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘शरद बाबू डिगुमार्टी’ मामले को कोट किया जिसमें इस स्थापित सिद्धांत को माना है कि जब कोई विशेष कानून (GST Act)अपराधों, दंड और अभियोजन से निपटने के लिए एक पूरी प्रक्रिया बनाता है, तो सामान्य आपराधिक कानून के तहत अलग अपराध बनाने वाले स्वतंत्र तत्वों की अनुपस्थिति में सामान्य दंड कानून का सहारा लेना स्वीकार्य नहीं है.

इसके आधार पर कोर्ट ने पाया कि आवेदक की इस दलील में दम पाता है कि मौजूदा मामले में लगाए गए आरोप पूरी तरह से U.P. गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट (GST Act) के प्रावधानों के दायरे में आते हैं और GST Act के तहत बताई गई कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, केवल B.N.S. की धारा 316(5) के तहत अभियोजन शुरू करना कानूनी रूप से सही नहीं लगता है.

जहाँ तक मुद्दा नंबर 2 का सवाल है, यह कोर्ट पाता है कि मौजूदा मामले में आरोप स्पष्ट रूप से वित्तीय वर्ष 2017-18 से संबंधित हैं, जबकि 19.10.2024 की FIR, 01.09.2025 की चार्जशीट और 02.04.2026 का संज्ञान/समन आदेश – ये सभी भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रावधानों के तहत दर्ज किए गए और उन पर कार्रवाई की गई.

रिकॉर्ड, FIR और विवादित चार्ज शीट को ध्यान से देखने के बाद, यह कोर्ट पाती है कि अगर अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को सच मान भी लिया जाए तो भी आवेदक पर आरोप सिर्फ ग्राम सभा के कामों के दौरान काटे गए GST/TDS की रकम को देर से जमा करने या जमा न करने तक ही सीमित है. न तो FIR और न ही चार्ज शीट में सरकारी फंड के गबन, बेईमानी से पैसे का गलत इस्तेमाल, निजी इस्तेमाल के लिए पैसे निकालना, रिकॉर्ड में हेर-फेर, नकली लेन-देन, जाली दस्तावेज, बेईमानी से पैसे निकालना या आवेदक को गलत तरीके से फायदा पहुँचाने जैसा कोई आरोप लगाया गया है.

रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी से पता चलता है कि जो रकम जमा नहीं की गई थी, उसे बाद में सरकारी खाते में जमा कर दिया गया था. इस तरह, आवेदक पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से U.P. GST Act  के कानूनी दायरे में आते हैं, न कि B.N.S. की धारा 316(5) के तहत सामान्य दंड प्रावधानों के दायरे में. इसलिए, GST Act के तहत बताए गए कानूनी तरीके को अपनाए बिना सामान्य दंड कानून के तहत आपराधिक मुकदमा शुरू करना कानूनी रूप से सही नहीं लगता है.

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मौजूदा मामले में, यह माना गया है कि कथित चूक वित्तीय वर्ष 2017-18 से संबंधित है. इसलिए, B.N.S. की धारा 316(5) के तहत FIR दर्ज करना, उसी प्रावधान के तहत चार्जशीट दाखिल करना और उस पर संज्ञान लेना कानूनी रूप से गलत है, क्योंकि अभियोजन पक्ष ने एक ऐसे दंडात्मक प्रावधान का इस्तेमाल किया है जो कथित घटना की तारीख को अस्तित्व में ही नहीं था. इसलिए, इस कोर्ट की यह राय है कि वित्तीय वर्ष 2017-18 से संबंधित कथित घटना के लिए B.N.S. की धारा 316(5) के तहत आवेदक पर मुकदमा चलाना कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता.

APPLICATION U/S 528 BNSS No. – 18970 of 2026 Tanveer Asharaf V/s State of U.P. and Another

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