Professional fees का भुगतान वकील और क्लाइंट का निजी और गोपनीय मामला, इसे कोर्ट की कार्यवाही का विषय नहीं बनना चाहिए
Professional fees के भुगतान की मांग में अधिवक्ता की तरफ से दाखिल चार याचिकाएं खारिज, सिविल कोर्ट जाने की छूट

Professional fees का भुगतान वकील और क्लाइंट के बीच निजी और गोपनीय मामला होना चाहिए और इसे कोर्ट की कार्यवाही का विषय नहीं बनना चाहिए. कोर्ट इस बात से अनजान नहीं रह सकता कि आम तौर पर वकील की फीस (Professional fees) के भुगतान से जुड़े विवाद को कोर्ट में नहीं लाया जाना चाहिए, बल्कि पार्टियों के बीच बातचीत या सुलह-समझौते से सुलझाया जाना चाहिए, भले ही एक पार्टी राज्य ही क्यों न हो. वकील को भी Professional fees के भुगतान के लिए क्लाइंट को कोर्ट में घसीटने में कुछ संयम बरतना चाहिए.
ऐसे मामलों में कोई एक पार्टी तो जीत सकती है, लेकिन हमेशा भरोसा और विश्वास हारता है, जो न्याय दिलाने की प्रक्रिया में अच्छी बात नहीं है. वकील और क्लाइंट के बीच कानूनी लड़ाई उस भरोसे और विश्वास की नींव को ही खत्म कर देती है, जो वकील और क्लाइंट के रिश्ते का आधार होता है. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच के जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने 4.80 करोड़ रुपये बकाया Professional fees के भुगतान की मांग में दाखिल चार अर्जियों को एक साथ खारिज कर दिया है.
Professional fees / बिल की वसूली के लिए मौजूदा रिट याचिकाएँ स्वीकार्य नहीं
बेंच ने कहा कि Professional fees / बिल की वसूली के लिए मौजूदा रिट याचिकाएँ स्वीकार्य नहीं हैं, क्योंकि रेस्पॉन्डेंट्स ने फीस-बिल के दावों को स्वीकार नहीं किया है. याचिकाकर्ता अपनी Professional fees का दावा करने के लिए सक्षम सिविल कोर्ट में जाएं. वहां पार्टियां रेगुलर ट्रायल में अपने पक्ष को साबित करने के लिए सबूत पेश कर सकती हैं, अपने दावे और दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान कर सकती हैं और गवाहों से जिरह कर सकती हैं. अगर वह सिविल केस दायर करने का फैसला करता है, तो उसे कानून के अनुसार लिमिटेशन एक्ट की धारा 14 का लाभ मिलेगा.
इसे भी पढ़ें….सजा के अनुपात की जांच अदालतें तभी कर सकती हैं जब वह अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दे
एक साथ चार रिट याचिकाएं दाखिल करते हुए अधिवक्ता ज्योतिन्जय वर्मा ने यह मांग की थी कि कोर्ट राज्य सरकार से उनकी Professional fees और उस पर पेनल्टी वाला ब्याज चुकाने के लिए आदेश जारी करे. वकील का दावा है कि उन्हें चार जिलों सीतापुर, लखनऊ, हरदोई और रायबरेली के लिए स्पेशल वकील के तौर पर नियुक्त किया गया था. बेंच ने कहा कि कोर्ट को ऐसे मुद्दों पर फैसला करना पड़ रहा है जिनसे बचा जा सकता था, अगर दोनों पार्टियां थोड़ी कोशिश, आपसी सम्मान और संयम दिखातीं.
इन याचिकाओं में कुल मिलाकर लगभग 4,80,00,000/- रुपये का भुगतान Professional fees के रूप में दिलाने की मांग की गयी थी. याचिकाकर्ता ने 23.04.2009 और 02.03.2011 के सरकारी आदेशों की कॉपी, उनके द्वारा लड़ी गई स्पेशल अपीलों की सूची, Professional fees पेमेंट के लिए संबंधित अधिकारियों को भेजे गए उनके अनुरोध-पत्र और सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिविल अपील नंबर 2142-2143/2024 (उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम गोपाल के. वर्मा) में पारित आदेश का सहारा लिया.
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 23(1) के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी दावा किया. प्रतिवादी उत्तर प्रदेश राज्य ने इस रिट याचिका पर आपत्ति जताई. उनका तर्क था कि किसी वकील द्वारा Professional fees की वसूली के लिए रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है. यह मामला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है, क्योंकि विवाद मुख्य रूप से काम पर रखे जाने की शर्तों के अनुसार Professional fees के पेमेंट से संबंधित है.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट, रोपड़ बनाम एस. तेजिंदर सिंह गुजराल और अन्य, 1995 सप्लीमेंट (4) SCC 577; विजय कुमार शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (रिट याचिका (C) नंबर 217/2018, फैसला 10.07.2023 को आया); इब्राहिम काजी बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य में बॉम्बे हाई कोर्ट का दिनांक 19.07.2024 का निर्णय आदि का हवाला दिया.
तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल उत्तरदाताओं द्वारा स्वीकार की गई फीस की उचित राशि की सीमा तक एक रिट याचिका की स्थिरता को प्रतिबंधित और अनुमति दी है, जो कि वर्तमान मामला नहीं है क्योंकि उत्तर प्रदेश राज्य के अनुसार, देय Professional fees की मात्रा और बेसिक शिक्षा परिषद के लिए विशेष वकील के रूप में याचिकाकर्ता की नियुक्ति से संबंधित एक गंभीर विवाद है.
उनके अनुसार, याचिकाकर्ता को दिनांक 06.02.2008 के आदेश के तहत लखनऊ स्थित उच्च न्यायालय के समक्ष विशेष अपील मामलों का संचालन करने के लिए बेसिक शिक्षा परिषद के लिए एक पैनल वकील के रूप में नियुक्त किया गया था.
बेंच ने कहा कि रिट याचिका में उठाए गए मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने के बाद चूंकि प्रतिवादियों की ओर से इस रिट याचिका के स्वीकार्य होने (मेंटेनेबिलिटी) से जुड़ा एक शुरुआती मुद्दा उठाया गया है, इसलिए पहले उस मुद्दे पर फैसला किया जाए और उसके बाद ही इस मामले के गुण-दोष पर विचार किया जाए.
बेंच ने कहा कि यह समझना जरूरी है कि संविधान का अनुच्छेद 142 एक अनोखा और असाधारण प्रावधान है जो सुप्रीम कोर्ट को ऐसे आदेश या डिक्री पारित करने की असाधारण, पूर्ण और असीमित शक्तियाँ देता है जो उसके सामने मौजूद पक्षों के बीच पूरा न्याय करने के लिए जरूरी हों.
याचिकाकर्ता की नियुक्ति मूल रूप से अनुबंध पर आधारित थी और यह स्थापित सिद्धांत है कि अनुबंध से जुड़े विवादित मौद्रिक दावों के मामले में मौजूदा रिट याचिका इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में सुनवाई योग्य नहीं है. यह रिट याचिका इसलिए भी स्वीकार करने योग्य नहीं है क्योंकि इस मामले में तथ्यों से जुड़े कई जटिल सवाल हैं, जिन्हें केवल सिविल कोर्ट में नियमित सुनवाई के दौरान सबूत पेश करके ही सुलझाया जा सकता है.