Matrimonial Dispute से जुड़े आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी का कोई खास आरोप न हो तो ट्रायल कोर्ट को विचार नहीं करना चाहिए
हाई कोर्ट ने द्विविवाह के अपराध के लिए ससुर, सास और जेठानी को समन जारी करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद किया

Matrimonial Dispute से जुड़े आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों के नामों का केवल जिक्र करना, जिसमें उनकी सक्रिय भागीदारी का कोई खास आरोप न हो, उस पर ट्रायल कोर्ट द्वारा विचार नहीं किया जाना चाहिए. जब Matrimonial Dispute के कारण घरेलू विवाद होते हैं तो अक्सर पति के परिवार के सभी सदस्यों को फँसाने की प्रवृत्ति देखी जाती है. ठोस सबूत या खास आरोपों के बिना लगाए गए ऐसे सामान्य और व्यापक आरोप Matrimonial Dispute के आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं बन सकते.
अदालतों को Matrimonial Dispute के मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए ताकि कानूनी प्रावधानों और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके और परिवार के निर्दोष सदस्यों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाया जा सके. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने इटावा की कोर्ट से द्विविवाह (Matrimonial Dispute) के अपराध के लिए आरोपी ससुर, सास और जेठानी को समन जारी करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद कर दिया है.
बेंच ने Matrimonial Dispute को लेकर दाखिल क्रिमिनल मिसलीनियस एप्लीकेशन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश में यह भी कहा है कि ट्रायल कोर्ट के उस आदेश में कोई गैर-कानूनी बात नहीं है जिसके तहत आरोपी/आवेदकों को IPC की धारा 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए समन किया गया है. बेंच ने IPC की धारा 494 के तहत आरोपी पति राम प्रताप सिंह को समन करने का आदेश बरकरार रखा है.
यह याचिका अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट नंबर 11, इटावा की अदालत द्वारा Matrimonial Dispute में पारित समनिंग ऑर्डर और केस नंबर 2355/2007 (शकुंतला देवी बनाम राम प्रताप सिंह और अन्य) की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गयी थी. केस के तथ्यों के अनुसार श्रीमती शकुंतला देवी ने 1997 को थाना बकेवर, जिला इटावा में तहरीर देकर कहा कि उनकी शादी राम प्रताप सिंह के साथ 1991 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी. शादी के समय उनके पिता ने अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार दहेज में सामान दिये थे.
आरोपी राम प्रताप सिंह (पति), फूलन देवी उर्फ भुरानी (सास), दशरथ सिंह (ससुर) और विमला (ननद) दहेज से संतुष्ट नहीं थे. वे लगातार शिकायतकर्ता के साथ मारपीट, गाली-गलौज और धमकी देकर क्रूरता करते थे. उन्होंने कथित तौर पर उसे मारने की कोशिश भी की और अतिरिक्त दहेज के रूप में एक स्कूटर और 5,000 रुपये नकद की मांग की. यह मांग पूरी नहीं हुई तो विवाहिता को इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उसे ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.
इसके बाद उसे कोई लेने के लिए नहीं दिया. वह खुद अपनी बड़ी बहन के साथ अपने ससुराल गई तो आरोपियों ने बदसलूकी और मारपीट की. बड़ी बहन के साथ भी बदसलूकी की गई. स्थानीय लोगों के जुट जाने पर आरोपी राम प्रताप सिंह ने कथित तौर पर बताया कि उसने दूसरी शादी कर ली है. आरोपों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 494, 498-A, 323, 504 और 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत Matrimonial Dispute की FIR (केस क्राइम नंबर 81/1997) दर्ज की गई.
जांच अधिकारी को Matrimonial Dispute को लेकर लगाये गये आरोपों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला तो उन्होंने फाइनल रिपोर्ट लगा दी
केस की विवेचना के बाद जांच अधिकारी को Matrimonial Dispute को लेकर लगाये गये आरोपों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला तो उन्होंने फाइनल रिपोर्ट लगा दी. इस पर शिकायतकर्ता ने विरोध याचिका दायर की और कहा कि जांच निष्पक्ष और बिना भेदभाव के नहीं की गई थी. विशेष रूप से यह कहा गया कि आरोपी राम प्रताप सिंह ने पिंकी नाम की महिला से दूसरी शादी की थी. यह भी आरोप लगाया गया कि जांच अधिकारी ने आरोपियों के साथ मिलीभगत की थी और इसलिए, अंतिम रिपोर्ट को खारिज किया जाना चाहिए और आरोपियों को समन जारी किया जाना चाहिए.
इटावा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने विरोध याचिका को शिकायत मामले के रूप में दर्ज किया. इसके बाद शिकायतकर्ता शकुंतला का बयान दर्ज किया गया. बयान में शकुंतला ने FIR में लगाए गए आरोपों को ही मुख्य रूप से दोहराया. सरोज (बड़ी बहन) और मुन्नी देवी (माँ) ने भी अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता और आरोपी की शादी कभी खत्म नहीं हुई और Matrimonial Dispute बना रहा. इसलिए कथित दूसरी शादी गैर-कानूनी थी. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने Matrimonial Dispute पर समन जारी किया जिसे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करके चुनौती दी.
आवेदकों के वकील का कहना है कि Matrimonial Dispute की शिकायत पूरी तरह से झूठी, बेबुनियाद और दुर्भावनापूर्ण है. उनका तर्क है कि दहेज की मांग, क्रूरता या शारीरिक हमले से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है और इसलिए, मजिस्ट्रेट ने उक्त अपराधों के लिए आवेदकों को समन जारी करके स्पष्ट रूप से गैर – कानूनी काम किया है.
यह स्थापित करने के लिए कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत नहीं है कि आरोपी राम प्रताप सिंह ने पिंकी नाम की लड़की के साथ दूसरी शादी की थी. मजिस्ट्रेट ने आईपीसी की धारा 494 के तहत दंडनीय अपराध के लिए आरोपी को तलब करते समय केवल Matrimonial Dispute के अनुमानों पर कार्रवाई की है.
इसके विपरीत, एजीए ने तर्क दिया कि विवादित आदेश (Matrimonial Dispute) किसी भी अवैधता, विकृति या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि से ग्रस्त नहीं है, जिसमें इस न्यायालय द्वारा अपने अंतर्निहित क्षेत्राधिकार के प्रयोग में हस्तक्षेप की आवश्यकता हो. सम्मन के चरण में, न्यायालय को केवल यह जांचने की आवश्यकता है कि क्या उसके सामने रखी गई सामग्री से प्रथम दृष्टया मामला बनता है और साक्ष्य का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करने या दोषसिद्धि की संभावना निर्धारित करने की अपेक्षा नहीं की जाती है.
कोर्ट ने ‘दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य (2025) 3 SCC 735’ मामले में, पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ Matrimonial Dispute कार्यवाही रद्द करने से जुड़े ऐसे ही एक मामले में सावधानी बरतने की बात का भी जिक्र अपने फैसले में किया:
“वैवाहिक विवाद (Matrimonial Dispute) से जुड़े आपराधिक मामले में परिवार के सदस्यों के नामों का सिर्फ जिक्र करना, बिना इस बात के कि वे सीधे तौर पर शामिल थे, शुरू में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए. न्यायिक अनुभव से यह बात अच्छी तरह साबित हुई है कि जब वैवाहिक कलह के कारण घरेलू विवाद होते हैं, तो अक्सर पति के परिवार के सभी सदस्यों को फंसाने की प्रवृत्ति देखी जाती है.
ठोस सबूत या खास आरोपों के बिना ऐसे सामान्य और व्यापक आरोप आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकते. अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए ताकि कानूनी प्रावधानों और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके और निर्दोष परिवार के सदस्यों को बेवजह परेशान होने से बचाया जा सके.”
बेंच ने कहा कि इस मामले में, आरोपी ससुर और सास पर आरोप है कि वे प्रताड़ना की कुछ घटनाओं के दौरान मौजूद थे और उन्होंने शिकायतकर्ता के भाई द्वारा दी गई रकम ली थी. हालांकि, FIR में उन पर किसी खास मौके पर मांग करने, धमकी देने या शारीरिक हमला करने का कोई खास आरोप नहीं लगाया गया है.
ननद पर आरोप है कि उसने सोना बेचकर मिले पैसे से फ्लैट खरीदने के लिए पैसे लिए थे, लेकिन उसकी तरफ से क्रूरता या जबरदस्ती करने का कोई खास आरोप नहीं लगाया गया है. तीनों मामलों में, आरोप सिर्फ मौजूदगी और बढ़ावा देने जैसी सामान्य बातों पर आधारित हैं, न कि ऐसी खास घटनाओं पर जो अलग-अलग तौर पर IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध बनाती हों.
IPC की धारा 494 के तहत आरोपों की बात करें तो, S. Nitheen बनाम केरल राज्य (2024) 8 SCC 706 मामले में यह तय किया गया है कि इस आरोप को साबित करने के लिए, शिकायतकर्ता को आरोपी व्यक्तियों द्वारा दूसरी शादी की रस्म (Matrimonial Dispute) में किए गए किसी स्पष्ट काम या न किए गए काम को शुरुआती तौर पर साबित करना होगा. अभियोजन पक्ष आरोपी-अपीलकर्ताओं की ओर से ऐसे किसी स्पष्ट काम या इरादे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं दे पाया है.
बेंच ने कहा कि यह भी साफ है कि शिकायतकर्ता को पहली नजर में यह साबित करना होगा कि आरोपी व्यक्तियों ने दूसरी शादी की रस्म में कोई प्रत्यक्ष काम किया या कोई जरूरी काम नहीं किया. सिर्फ दूसरी शादी की जानकारी होना ही परिवार के दूसरे सदस्यों को पति द्वारा किए गए ‘बिगेमी’ (Matrimonial Dispute) के अपराध का दोषी ठहराने के लिए काफी नहीं है. रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत होना चाहिए जिससे पता चले कि आरोपी व्यक्तियों ने उस शादी को संपन्न कराने में सक्रिय रूप से भाग लिया, मदद की या उसे बढ़ावा दिया.
इस कोर्ट को कानूनी पैमानों पर यह जांचना था कि क्या ट्रायल कोर्ट के सामने आरोपी/आवेदक को IPC की धारा 494, 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत समन जारी करने के लिए पहली नजर में काफी सबूत मौजूद थे?
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता मुन्नी देवी की माँ का बयान सामान्य है, जिसमें कहा गया है कि पति के रिश्तेदारों ने पिंकी के साथ उसकी दूसरी शादी में मदद की और साजिश रची, लेकिन रिश्तेदारों की कोई खास भूमिका नहीं बताई गई है कि उन्होंने किस तरह सक्रिय रूप से मदद की, दूसरी शादी को आसान बनाया और उसे बढ़ावा दिया और किस तरह उन्होंने पिंकी के साथ शादी करवाने की साजिश रची. ट्रायल कोर्ट के सामने गवाहों ने पति के रिश्तेदारों पर दूसरी शादी करवाने में किसी भी प्रत्यक्ष कार्य या चूक का आरोप नहीं लगाया है.
इन तथ्यों को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट ने निश्चित रूप से पति के रिश्तेदारों ससुर, सास और जेठानी को IPC की धारा 494 के तहत दंडनीय द्विविवाह के अपराध के लिए समन जारी करने में गलती की है. इसके बाद कोर्ट ने अपना फैसला कोट कराया. कोर्ट ने 2.7.2008 के अंतरिम आदेश से मिली राहत को भी रद्द कर दिया है और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह Matrimonial Dispute मुकदमे को एक साल के भीतर निस्तारित करे.