Retirement benefits प्रोविडेंट फंड, पेंशन और बीमा सुरक्षित अधिकार, MV Act 1988 के तहत मुआवजे की गणना करते समय कटौती या बहिष्करण के लिए उत्तरदायी “आर्थिक लाभ” नहीं माना जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैधानिक सेवानिवृत्ति लाभ (Retirement benefits) प्रोविडेंट फंड, पेंशन और बीमा सुरक्षित अधिकार हैं. इन्हें (Retirement benefits) मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की गणना करते समय कटौती या बहिष्करण के लिए उत्तरदायी “आर्थिक लाभ” नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि पेंशन (Retirement benefits) किसी व्यक्ति के आर्थिक लाभों का एक वैध और निरंतर हिस्सा है, जिसे मोटर वाहन अधिनियम के तहत आर्थिक लाभ के रूप में घटाया नहीं जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना में मौत के दावों में निर्भरता के नुकसान का निर्धारण करते समय पेंशन जैसे वैधानिक सेवानिवृत्ति लाभों (Retirement benefits) को बाहर या घटाया नहीं जा सकता. कोर्ट ने माना कि Retirement benefits सुरक्षित अधिकार हैं क्योंकि ये उस आय का एक वैध और निरंतर हिस्सा हैं जो आश्रितों को अन्यथा प्राप्त होती और इसलिए दुर्घटना के समय मृतक को मिलने वाली पेंशन राशि को आय के नुकसान की गणना करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए.
Retirement benefits आय का एक वैध और निरंतर हिस्सा
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहाकि निर्भरता के नुकसान का निर्धारण करते समय, पेंशन राशि को बाहर या घटाया नहीं जा सकता, क्योंकि Retirement benefits आय का एक वैध और निरंतर हिस्सा है जो आश्रितों को अन्यथा प्राप्त होती, और इसलिए दुर्घटना के समय मृतक को मिलने वाली पेंशन राशि को आय के नुकसान की गणना करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए और इसलिए वर्तमान मामले में चूंकि मृतक को 5,839 रुपये प्रति माह पेंशन मिल रही थी और इसे मृतक को उसकी निजी नौकरी से प्राप्त वेतन में जोड़ा जाना चाहिए.
यह अपील राजस्थान हाई कोर्ट (जयपुर बेंच) द्वारा S.B. सिविल मिसलेनियस अपील नंबर 1866/2013 में 5 अक्टूबर 2023 को दिए गए फैसले और आदेश के साथ मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल, किशनगढ़, बास (अलवर) द्वारा MACT क्लेम याचिका नंबर 09/2011 में 21 जनवरी 2013 को दिए गए आदेश के खिलाफ दायर की गई थी.
अपील से जुड़े मुख्य तथ्य ये थे कि 21 नवंबर 2010 को, मृतक रामजस यादव अपने परिवार के साथ बाइक से अपने गाँव से अलवर जा रहे थे. वे शौच के लिए सड़क किनारे अपनी गाड़ी रोककर रुके थे तभी बस चालक ने वाहन को लापरवाही से चलाते हुए मृतक की गाड़ी को टक्कर मार दी. दुर्घटना में रामजस की मौके पर ही मौत हो गई. घटना के संबंध में दुर्घटना करने वाली गाड़ी के ड्राइवर के खिलाफ थाना खर्थल में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी.
मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 की धारा 166 के तहत क्लेम करने वाले अपीलकर्ता (मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी) की ओर से ट्रिब्यूनल के सामने 1,28,63,088 रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए क्लेम याचिका दायर की गई थी. दावा किया गया था कि मृतक की कुल मासिक आय 38,312 रुपये थी, जिसमें ‘इंटीग्रोन प्रॉपर्टी मैनेजमेंट सर्विस प्राइवेट लिमिटेड’ में स्टाफ ऑफिसर के तौर पर नौकरी से मिलने वाले 32,473 रुपये और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) से हेड कॉन्स्टेबल के पद से रिटायर होने के बाद मिलने वाली 5,829 रुपये की पेंशन (Retirement benefits) शामिल थी.
ट्रिब्यूनल ने मासिक आय कम दर पर तय की, निजी खर्चों के लिए एक-चौथाई हिस्सा घटाया, संबंधित मल्टीप्लायर लागू किया और ब्याज के साथ एक निश्चित राशि देने का आदेश दिया. ट्रिब्यूनल द्वारा तय की गयी मुआवजे की रकम से असंतुष्ट होकर, दावा करने वालों ने इसे बढ़ाने के लिए हाई कोर्ट में अपील की. हाई कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से मंजूर किया, आय का फिर से थोड़ा ज्यादा आकलन किया और भविष्य की संभावनाओं और पारंपरिक मदों के तहत रकम जोड़ी, जिससे मुआवजा और बढ़ गया. आय के आकलन से अभी भी असंतुष्ट होकर, दावा करने वाले सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे.

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि निचली दोनों अदालतों ने मृतक की मासिक आय का आकलन करने में गंभीर गलती की है क्योंकि उन्होंने असल सैलरी स्लिप और उसे मिलने वाले विभिन्न भत्तों पर विचार नहीं किया. यह भी कहा गया कि हाई कोर्ट ने इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि पारिवारिक पेंशन (Retirement benefits) को उस रकम से आधा कर दिया गया था, जिसके लिए मृतक हकदार होता अगर वह जीवित रहता, जिससे परिवार को अतिरिक्त आर्थिक परेशानी हुई.
प्रतिवादियों ने विवादित फैसलों का समर्थन करते हुए कहा कि चूँकि मृतक की पत्नी को उसकी मृत्यु के बाद भी पारिवारिक पेंशन (Retirement benefits) मिलती रही, इसलिए पेंशन के कारण कोई वास्तविक आर्थिक नुकसान दावा करने वालों द्वारा साबित नहीं किया गया था और इस तरह एक जैसे निष्कर्षों में किसी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं थी.
तथ्यों को परखने के बाद कोर्ट ने पाया कि मृतक की सालाना आय के आकलन के संबंध में निचली अदालतों के निष्कर्षों में न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत थी. यह देखा गया कि सैलरी स्लिप और पेंशनभोगी के पहचान पत्र ने स्पष्ट रूप से मृतक की निजी सेवा और उसकी सैन्य पेंशन से होने वाली दोहरी आय को स्थापित किया. अदालत ने माना कि पेंशन पिछली सेवाओं (Retirement benefits) से उत्पन्न आय का एक आवर्ती और सुनिश्चित स्रोत है जो मृतक व्यक्ति के आर्थिक लाभों का एक अभिन्न अंग है.
स्थापित कानूनी मिसालों पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने माना कि वैधानिक सेवानिवृत्ति लाभ (Retirement benefits) जैसे कि प्रोविडेंट फंड, पेंशन और बीमा सुरक्षित अधिकार हैं, जिन्हें मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की गणना करते समय कटौती या बहिष्करण के लिए उत्तरदायी “आर्थिक लाभ” नहीं माना जा सकता है. कोर्ट ने यह भी पाया कि निचली अदालतों ने मृतक की निजी सैलरी से अनुचित कटौती की थी.
“जहाँ तक प्राइवेट नौकरी से होने वाली आय का सवाल है, निचली अदालतों ने आय की गणना करते समय कुछ अनावश्यक कटौतियाँ की हैं. इसलिए, हम मृतक की प्राइवेट नौकरी से होने वाली आय को ₹32,673 प्रति माह तय करते हैं. नतीजतन, मुआवजे की गणना के लिए मृतक की कुल मासिक आय को ₹38,512 तय करते हैं. दावा करने वाले अपीलकर्ता कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार अन्य मदों के तहत भी मुआवजे के हकदार हैं.”
कोर्ट ने कहा
इसके बाद, कोर्ट ने प्राइवेट नौकरी से मिलने वाली असल सैलरी में पूरी पेंशन राशि (Retirement benefits) जोड़कर कुल मासिक आय को फिर से तय किया. भविष्य की संभावनाओं, व्यक्तिगत खर्चों के लिए कटौती और उचित मल्टीप्लायर से जुड़े स्थापित सिद्धांतों को लागू करते हुए, कोर्ट ने आश्रितता की फिर से गणना की और आय के नुकसान, एस्टेट, अंतिम संस्कार के खर्च और कंसोर्टियम (जीवनसाथी का साथ खोने) जैसी मदों के तहत कुल मुआवजे की राशि बढ़ाई.
इन शर्तों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील मंजूर कर ली. बेंच ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल, किशनगढ़, बास (अलवर) द्वारा क्लेम याचिका संख्या 09/2011 में 21 जनवरी 2013 को पारित अवार्ड (फैसला), जिसे राजस्थान हाई कोर्ट (जयपुर बेंच) ने 5 अक्टूबर 2023 के आदेश (S.B. सिविल मिसलेनियस अपील संख्या 1866/2013) द्वारा संशोधित किया था, उसे उसी के अनुसार संशोधित माना जाएगा.
संयुक्त और अलग-अलग दायित्व के पहलू में कोई बदलाव नहीं किया गया है. ट्रिब्यूनल द्वारा तय की गई दर से ही राशि पर ब्याज का भुगतान किया जाएगा. अपील दायर करने में हुई 443 दिनों की देरी और इसे दोबारा दायर करने में लगे 124 दिनों की अवधि को ब्याज की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा. बेंच ने निर्देश दिया कि यह राशि सीधे क्लेम करने वाले अपीलकर्ता(ओं) के बैंक खाते में भेजी जाए. बैंक खाते की जानकारी क्लेम करने वाले अपीलकर्ता(ओं) के वकील द्वारा तुरंत प्रतिवादी के वकील को दी जानी चाहिए. इसके बाद चार सप्ताह के भीतर यह राशि निश्चित रूप से भेज दी जानी चाहिए.