Married woman को अपनी मर्जी से रहने की आजादी, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट Married woman को अपनी मर्जी की जगह पर रहने की आजादी देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया है. यह आदेश जस्टिस संदीप जैन की एकलपीठ ने बांदा जिले के रहने वाली बलराम की याचिका पर दिया है. बांदा जिले के गिरवां क्षेत्र के रहने वाले बलराम की तरफ से दाखिल याचिका में विवाहित महिला (Married woman) को साथ रहने का आदेश देने के मांग की गयी थी. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विवाहित महिला (Married woman) और उसकी नाबालिग बेटी से सीधे बात की. उनकी बातों को सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया.
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता बलराम की पत्नी स्मृति विशेखा और उनकी नाबालिग बेटी आख्या को कोर्ट के 23 जुलाई 2026 के आदेश के अनुपालन में पुलिस द्वारा अदालत में पेश किया गया था. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों से सीधे बातचीत की. महिला (Married woman) विशेखा ने कोर्ट को बताया कि वह पति बलराम के साथ ससुराल में हुई कथित क्रूरता और उत्पीड़न के कारण उसके साथ रहने को तैयार नहीं है. उसने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी की गैरकानूनी हिरासत में नहीं है, बल्कि अपनी मर्जी से रह रही है.
याचिकाकर्ता बलराम ने बताया कि उसकी और विशेखा (Married woman) की चार संतानें हैं, जिनमें से तीन बच्चे उसके पास हैं जबकि सबसे छोटी बेटी आख्या मां के पास है. उसने पत्नी के साथ ससुराल में रहने की इच्छा जताई, लेकिन कोर्ट ने पाया कि पत्नी इसके लिए तैयार नहीं है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह भी कहा कि अगर आख्या की कस्टडी मां (Married woman) के पास रहे तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है.
Married woman किसी अवैध हिरासत में नहीं
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दोनों पक्षों के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद स्पष्ट रूप से नजर आता है. साथ ही, लगभग दो वर्ष की उम्र को देखते हुए बच्ची की कस्टडी मां (Married woman) के पास रहना उचित पाया गया. चूंकि महिला (Married woman) किसी अवैध हिरासत में नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने याचिका में कोई आधार न पाते हुए इसे खारिज कर दिया और महिला को अपनी इच्छानुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान की.
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रेप-छेड़छाड़ केस में एफआईआर रद्द करने से इन्कार, पुलिस को नोटिस

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना ने अर्पित गुप्ता की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ गाजियाबाद के वेव सिटी थाने में दर्ज छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी की एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी.
याची अर्पित गुप्ता, पारित एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड के मालिक हैं. पीड़िता, जो कंपनी में एडमिन के पद पर कार्यरत थी, ने आरोप लगाया कि गुप्ता ने पद पर पदोन्नति का लालच देकर बार-बार उसका यौन उत्पीड़न किया. मार्च 2026 में जबरन छेड़छाड़ की और शिकायत करने पर उसे व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी. पीड़िता के अनुसार, 8 अप्रैल 2026 को इस्तीफा देने के बाद गुप्ता ने पुलिस से मिलीभगत कर उसके खिलाफ एक जबरन वसूली का मुकदमा दर्ज करवाया, जिसमें उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा गया.

बाद में जमानत पर छूटने के बाद पीड़िता ने वेव सिटी थाने और पुलिस कमिश्नर गाजियाबाद के पास शिकायत की लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई. इसके बाद उसने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में धारा 173(4) बीएनएस के तहत आवेदन दिया, जिस पर मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई 2026 को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया.
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता के आरोप, प्रथम दृष्टया, गंभीर संज्ञेय अपराध दर्शाते हैं और इनकी सच्चाई की जांच विवेचना के जरिए ही हो सकती है, याचिका में नहीं. कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब शिकायत संज्ञेय अपराध दर्शाती है, तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है.
कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई कि पीड़िता की शिकायत पर, और फिर पुलिस कमिश्नर को की गई शिकायत पर भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई. कोर्ट ने डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया कि वे इस लापरवाही की जांच करें, संबंधित थाना प्रभारी वेव सिटी और पुलिस कमिश्नर गाज़ियाबाद सहित जिम्मेदार अफसरों को कारण बताओ नोटिस जारी करें और चार सप्ताह में व्यक्तिगत हलफनामे के रूप में रिपोर्ट कोर्ट में पेश करें.