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अनुकंपा के आधार पर Job के दावे की जाँच का दायरा परिवार के सदस्यों की संख्या और उनकी आर्थिक स्थिति तक ही सीमित होना चाहिए उससे आगे नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कैट के फैसले को किया खारिज, रेलवे पर लगाया 25 हजार जुर्माना, राशि याचिकाकर्ता को दी जाएगी

अनुकंपा के आधार पर Job के दावे की जाँच का दायरा परिवार के सदस्यों की संख्या और उनकी आर्थिक स्थिति तक ही सीमित होना चाहिए उससे आगे नहीं

अनुकंपा के आधार पर Job का दावा मृतक के परिवार की तंगी को देखते हुए किया गया था. Job के ऐसे दावे पर विचार करते समय जाँच का दायरा परिवार के सदस्यों की संख्या और उनकी आर्थिक स्थिति तक ही सीमित होना चाहिए उससे आगे नहीं. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के ओए नंबर 1086/2024 में दिये गये आदेश को रद कर दिया है.

कोर्ट ने मो. अली की तरफ से दाखिल याचिका को स्वीकार करते हुए रेलवे अफसरों को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता को मृतक आश्रित कोटे में Job देने पर छह सप्ताह में फैसला लें. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के लिए 25 हजार रुपये का मुआवजा भी मंजूर किया है.

फैसला सुनाते हुए दो जजों की बेंच ने कहा कि भले ही हम यह मान लें या यह सच हो कि याचिकाकर्ता स्व. अनवर अली और उनकी पत्नी को ट्रेन में तब मिला था जब वह दो दिन का शिशु था, हमारी राय में यह बात याचिकाकर्ता के Job के दावे को खत्म नहीं करेगी. कोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के दया के आधार पर Job के दावे पर विचार करें और एक तर्कपूर्ण आदेश पारित करें. इस आदेश में याचिकाकर्ता को दिए गए खर्च के भुगतान का विवरण भी शामिल होना चाहिए.

प्रतिवादी याचिकाकर्ता के Job के दावे को इस आधार पर खारिज नहीं करेंगे कि वह कथित तौर पर ट्रेन में पाया गया था या गोद लेने का कोई सबूत पेश नहीं किया गया

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रतिवादी याचिकाकर्ता के Job के दावे को इस आधार पर खारिज नहीं करेंगे कि वह कथित तौर पर ट्रेन में पाया गया था या गोद लेने का कोई सबूत पेश नहीं किया गया था या वह मृतक का जैविक बेटा नहीं था. Job के दावे पर विचार लागू योजना के तहत अन्य पैमानों के आधार पर किया जाएगा.

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यह रिट याचिका मोहम्मद अली पुत्र स्व० अनवर अली (पूर्व सफाईवाला, अधीन एसएसई/पीवे/शाहगंज), निवासी वार्ड नं० 7, नई आबादी, शाहगंज, जिला जौनपुर की तरफ से दाखिल की गयी थी. इसमें कैट के 06.02.2026 के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी जिसके तहत सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल की इलाहाबाद बेंच ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर ओरिजिनल एप्लीकेशन नंबर 1086/2024 को खारिज कर दिया था.

ट्रिब्यूनल ने अनुकंपा के आधार पर Job के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता मृतक कर्मचारी का कानूनी रूप से गोद लिया हुआ बेटा नहीं था, इसलिए वह अनुकंपा नियुक्ति (Job) के लिए ‘योग्य परिवार के सदस्य’ के दायरे में नहीं आता. तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता के पिता अनवर अली रेलवे में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करते थे. 2014 में नौकरी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई.

परिवार में उनकी पत्नी, तीन विवाहित बेटियां और एक नाबालिग बेटा (याचिकाकर्ता) थे. याचिकाकर्ता बालिग हुआ, तो उसकी मां ने प्रतिवादियों के सामने याचिकाकर्ता को अनुकंपा नियुक्ति (Job) देने का अनुरोध करते हुए एक आवेदन दिया. यह आवेदन 2018 में खारिज कर दिया गया. जिसके खिलाफ O.A. नंबर 746/2019 दायर किया गया. इसे 24.11.2023 को स्वीकार कर लिया गया और विभाग को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को दस्तावेजों/सबूतों के साथ अपना पक्ष रखने और व्यक्तिगत रूप से सुने जाने का मौका देने के बाद Job के मामले पर फिर से विचार करे.

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याचिकाकर्ता द्वारा जरूरी चीजें जमा करने के बावजूद प्रतिवादियों की ओर से कोई आदेश पारित नहीं किया गया, तो मौजूदा रिट याचिका से जुड़ी O.A. दायर की गई, जिसमें प्रतिवादियों को याचिकाकर्ता के अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई. प्रतिवादियों ने इसका विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि अनवर अली की मौत के बाद एक जांच की गई थी, जिसमें डिविजनल वेलफेयर इंस्पेक्टर ने रिपोर्ट दी थी कि याचिकाकर्ता स्व.अनवर अली का सगा बेटा नहीं था, बल्कि अनवर अली को वह ट्रेन यात्रा के दौरान एक शिशु के रूप में मिला था.

ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई आधार नहीं बताया और न ही कोई दस्तावेज पेश किया जिससे यह साबित हो सके कि उसे कानूनी रूप से गोद लिया गया था, ताकि वह अनुकंपा के आधार पर Job के लिए पात्र हो सके. इसलिए, ट्रिब्यूनल ने आवेदन को खारिज कर दिया. इस आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी.

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याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया है कि हाई स्कूल की मार्क शीट और बर्थ सर्टिफिकेट से लेकर राशन कार्ड यहां तक कि जाति प्रमाण पत्र में याचिकाकर्ता को स्व. अनवर अली का बेटा दिखाया गया है. इसके आधार पर तर्क दिया गया कि ट्रिब्यूनल का फैसला सही नहीं था.

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी है कि याचिकाकर्ता की माँ ने Job के लिए अपनी पहली अर्जी में कहा था कि उनके पति को ट्रेन में दो दिन का एक लड़का मिला था. वह और उनके पति बच्चे को घर ले आए थे. बेंच ने कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता का नाम कई दस्तावेजों में स्व. अनवर अली के बेटे के तौर पर दर्ज है. कोर्ट ने प्रतिवादियों के वकील से पूछा कि क्या सर्विस बुक में भी याचिकाकर्ता का नाम कर्मचारी के बेटे के तौर पर दर्ज है, तो उन्होंने हाँ में जवाब दिया.

बेंच ने कहा कि यह कोर्ट अनुकंपा के आधार पर Job के कई मामलों को देख चुका है और शायद यह पहला मामला है जिसमें विभाग ने इस तरह की जाँच की है. हमारे सामने ऐसे मामले आते हैं जिनमें गोद लिए गए बेटे के लिए अनुकंपा के आधार पर Job की मांग की जाती है और विभाग रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजी सबूतों के आधार पर गोद लेने की वैधता की जाँच करते हैं, लेकिन यह मामला गोद लेने का नहीं है.

जब रिकॉर्ड में बहुत सारे दस्तावेजी सबूत मौजूद हों जिनसे पता चलता हो कि याचिकाकर्ता का नाम मृतक कर्मचारी के बेटे के तौर पर दर्ज था, तो गोद लेने की वैधता पर चर्चा करके विभाग द्वारा उसके मामले को खारिज करना स्वीकार नहीं किया जा सकता.

स्व. अनवर अली के सर्विस रिकॉर्ड में भी याचिकाकर्ता का नाम मृतक के बेटे के तौर पर दर्ज है, इसलिए इस मामले में मृतक और याचिकाकर्ता के रिश्ते के बारे में किसी जांच की जरूरत नहीं थी. ट्रिब्यूनल फैसला करते समय विभाग द्वारा की गई जांच से प्रभावित दिखा और उसने पाया कि ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता को सही तरीके से गोद लिया गया था.

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए सिर्फ सगे बेटे पर ही विचार किया जा सकता है, लेकिन कोर्ट को ऐसी कोई पॉलिसी नहीं दिखाई गई. विभाग का कहना सिर्फ यह है कि मृतक कर्मचारी की पत्नी ने बयान दिया था कि उनके पति को याचिकाकर्ता ट्रेन में 1-2 दिन की उम्र में मिला था.

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चूंकि उस बयान और आवेदन पर पत्नी का अंगूठे का निशान था, इसलिए यह साबित नहीं हुआ कि याचिकाकर्ता मृतक और उनकी पत्नी की शादी से पैदा हुआ बेटा था. बेंच ने कहा कि प्रतिवादियों की इस अपील में कोई दम नहीं दिखता. इसलिए इस फैसले को खारिज किया जाना चाहिए.

ऐसा लगता है कि मृतक की विधवा और याचिकाकर्ता 2014 से ही दया के आधार पर Job की मांग कर रहे हैं और उन्हें अपनी शिकायतों के लिए दो बार ट्रिब्यूनल जाना पड़ा. पहली O.A. में ट्रिब्यूनल के आदेश के बावजूद, उस पर अमल नहीं किया गया, जिससे याचिकाकर्ता को दूसरी O.A. दाखिल करनी पड़ी. इसे बेतुके आधारों पर खारिज कर दिया गया और अब इस रिट याचिका में भी याचिकाकर्ता के दावे का विरोध किया जा रहा है.

तर्क बेबुनियाद हैं और प्रतिवादियों के अड़ियल रवैये को दिखाते हैं. हमें लगता है कि यह एक ऐसा मामला है जिसमें प्रतिवादियों को याचिकाकर्ता (जो एक गरीब सफाईकर्मी का उत्तराधिकारी है) को 12 साल से ज्यादा समय तक परेशान करने के लिए मुआवजा देना चाहिए. इसी के आधार पर 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया जाता है.
बेंच ने कमेंट कोट कराया

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