Application की हार्ड कापी जमा करने की लास्ट डेट थी 14 जुलाई, फार्म पहुंचा 16 को, आयोग ने आवेदन किया खारिज, हाई कोर्ट ने आयोग के फैसले पर लगाई मुहर

मेंस परीक्षा में शामिल होने के लिए Online Application filing के बाद उसकी हार्ड कापी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग तक पहुंचने की लास्ट डेट 14 जुलाई तय थी लेकिन Application पत्र आयोग के कार्यालय में रिसीव हुआ 16 जुलाई 2026 को. आयोग के Application की हार्ड कापी देर से पहुंचने के आधार पर मेंस परीक्षा में बैठने की अनुमति न दिये जाने के फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सही ठहराते हुए अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी है. मेंस परीक्षा में बैठने की अनुमति देने की मांग में यह याचिका मोहम्मद फहीम की तरफ से दाखिल की गयी थी.
उसने सहायक अध्यापक (प्रशिक्षित स्नातक श्रेणी) प्री की परीक्षा क्वालीफाई करने के बाद मुख्य परीक्षा-2025 के लिए आनलाइन Application समय से फिल कर दिये जाने का तर्क देते हुए परीक्षा में बैठने की अनुमति देने की मांग में याचिका दाखिल की थी. याची ने यूपीपीएससी के विज्ञापन 28 जुलाई 2025 के तहत Application किया था. Application करने के बाद उसे लिखित परीक्षा में शामिल होने के लिए एडमिट कार्ड जारी हुआ. वह परीक्षा में शामिल हुआ और प्रारंभिक परीक्षा 05 अप्रैल 2026 पास कर ली थी.
ऑनलाइन Application 06 जुलाई 2026 को किया
मेंस परीक्षा में शामिल होने के लिए उसने ऑनलाइन Application 06 जुलाई 2026 को किया और तय शर्तों के मुताबिक उसकी हार्ड कॉपी स्पीड पोस्ट से 07 जुलाई 2026 को यूपीपीएससी को भेजी. मेंस के लिए आनलाइन Application की कापी प्रिंट कराकर हार्ड कापी यूपीपीएससी को भेजी जानी थी. इसके लिए आयोग ने 14 जुलाई 2026 लास्ट डेट निर्धारित की थी. डाक विभाग की लापरवाही के चलते हार्ड कापी वाला लिफाफा आयोग को लास्ट डेट बीतने के दो दिन बाद यानी 16 जुलाई 2026 को पहुंचा. इसके चलते आयोग ने Application को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और अभ्यर्थी को परीक्षा में बैठने की अनुमति नही दी.
इसे रिट याचिका के माध्यम से हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया था. यानी की तरफ से पक्ष रखते हुए उसके अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के आशुतोष अग्निहोत्री और सदफ इमरान जैसे फैसलों तथा हाईकोर्ट के कुछ अन्य आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि डाक विलंब के लिए अभ्यर्थी को दंडित नहीं किया जा सकता और उसे परीक्षा में अनंतिम रूप से बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए.
यूपीपीएससी की ओर से अधिवक्ता अगम नारायण राय ने इस कोर्ट की फुल बेंच के फैसले राजेंद्र पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला दिया गया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि यदि आयोग ने निर्धारित तिथि तक Application की हार्ड कॉपी जमा करने की शर्त रखी है और अभ्यर्थी को इसकी सूचना दी गई है, तो निर्धारित तिथि के बाद प्राप्त Application अमान्य माना जाएगा भले ही देरी डाक विभाग की वजह से हो.
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कोर्ट ने कहा कि फुल बेंच का फैसला आज भी बाध्यकारी विधि है और किसी बड़ी अदालत ने इसे पलटा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के जिन फैसलों का हवाला याची ने दिया वे विशेष परिस्थितियों में पारित आदेश हैं न कि कोई सामान्य विधिक सिद्धांत. इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया.
हडसन मेमोरियल गर्ल्स स्कूल की याचिका खारिज, कर्मचारी को राहत बरकरार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेसर्स हडसन मेमोरियल गर्ल्स हाई स्कूल की याचिका निस्तारित करते हुए श्रम न्यायालय (चतुर्थ), कानपुर के 25 अप्रैल 2018 के अवार्ड को बरकरार रखा है. श्रम न्यायालय ने 1 जुलाई 2011 को कर्मचारी शिव प्रकाश की सेवा समाप्ति को गैरकानूनी ठहराते हुए उसे 1 जुलाई 2011 से 25 अप्रैल 2018 तक की अवधि का 50% बकाया वेतन देने का आदेश दिया था. स्कूल प्रबंधन ने इस अवार्ड को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. याचिका पर अधिवक्ता सुभाष घोष ने बहस की.
हाईकोर्ट के पहले के अंतरिम आदेश के तहत स्कूल को कर्मचारी को तुरंत बहाल करने और अवार्ड की पूरी बकाया राशि दो महीने के भीतर जमा करने का निर्देश दिया गया था. इसका पालन करते हुए कर्मचारी को बहाल कर दिया गया और वह वर्तमान में राज्य द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन 12,356 रूपये प्रतिमाह पर काम कर रहा है. यह राशि अब पक्षकारों की सहमति से प्रतिवादी-कर्मचारी को जारी करने का आदेश दिया गया है.
प्रतिवादी कर्मचारी ने दावा किया कि समान पद के अन्य कर्मचारियों को 16,000 से 25,000 रूपये तक वेतन मिल रहा है, लेकिन इसका कोई सबूत पेश नहीं किया गया. कोर्ट ने कहा कि चूंकि यह याचिका नियोक्ता की ओर से दाखिल है, कर्मचारी की ओर से नहीं, इसलिए कोर्ट श्रम न्यायालय द्वारा न दी गई राहत नहीं दे सकता.
साथ ही कहा कि अंतरिम आदेश के उल्लंघन का कोई उपाय अपनाया ही नहीं गया. जस्टिय सौरभ श्याम शमशेरी ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह आदेश कर्मचारी को भविष्य में वेतन संबंधी दावा करने से नहीं रोकेगा और नियोक्ता उसके सामान्य कामकाज में विधि-सम्मत प्रक्रिया के अलावा हस्तक्षेप नहीं करेगा.
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