Punishment के अनुपात की जांच अदालतें तभी कर सकती हैं जब वह अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बिना परमिशन के बहुविवाह करने वाले फौजी को राहत देने से किया इंकार, याचिका खारिज

कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि Punishment के अनुपात की जांच अदालतें तभी कर सकती हैं जब वह अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दे और चौंकाने वाले हद तक अनुपातहीन हो या जब वह नियमों के तहत स्वीकार्य न हो. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की बेंच ने कानूनी प्रावधानों का जिक्र करते हुए सीआरपीएफ के जवान को बहुविवाह में Punishment के तौर पर सेवा से बर्खास्त किये जाने के विभागीय आदेश को बरकरार रखा है और फौजी को कोई राहत देने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है.
यह याचिका उस Punishment आदेश को रद्द करने की मांग में दाखिल की गयी थी जिसके तहत याचिकाकर्ता को सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स एक्ट, 1949 की धारा 11(1) के तहत सेवा से हटा दिया गया था. यह Punishment एक से अधिक शादियाँ करने के कथित कदाचार के कारण की गई थी जो सेंट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स रूल्स, 1955 के नियम 15 के तहत प्रतिबंधित है. Punishment के खिलाफ याचिकाकर्ता की अपील और रिवीजन को भी खारिज कर दिया गया तो उसने राहत की मांग में हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की.
तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता प्रभू सिंह को सीआरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था. संबंधित विभाग से बिना किसी औपचारिक अनुमति के पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने के आरोपों पर याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की. इसके तहत जारी किये गये आरोप पत्र के जवाब में याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि उसने 1976 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उर्मिला देवी से शादी की थी.
1988 में CRPF में उसका चयन और नियुक्ति हुई. 1989 में उसकी पहली पत्नी उर्मिला देवी बच्चों के साथ वैवाहिक घर छोड़कर चली गई और काफी खोजने के बावजूद वह उन्हें ढूंढ नहीं पाया. इसके बाद, 1992 में उसने दूसरी शादी की. दूसरी पत्नी का ही नाम उसने सर्विस बुक में पत्नी के तौर पर दर्ज कराया.
Punishment के तौर पर नौकरी से हटाने का आदेश दिया
याचिकाकर्ता ने अपनी दूसरी शादी के बारे में यह भी माना कि न तो उसने विभाग से कोई इजाजत ली और न ही विभाग को अपनी दूसरी शादी के बारे में जानकारी दी. सबूतों के आधार पर अनुशासनात्मक अधिकारी ने CRPF एक्ट की धारा 11 और CRPF नियम, 1955 के नियम 15 के तहत याचिकाकर्ता को Punishment के तौर पर नौकरी से हटाने का आदेश दिया. वकील ने कहा कि दूसरी पत्नी को नॉमिनी के तौर पर दर्ज कराकर याचिकाकर्ता ने विभाग को अपनी दूसरी शादी के बारे में विधिवत जानकारी दी थी.
इसके बावजूद, काफी समय तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. 2011 में याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई और Punishment के तौर पर उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. वकील ने यह भी कहा कि भले ही याचिकाकर्ता पर दूसरी शादी का आरोप साबित हो जाए तो भी इस मामले में मामूली Punishment ही दी जा सकती है, उन्हें नौकरी से नहीं हटाया जा सकता था. याचिकाकर्ता को दी गई Punishment जरूरत से ज्यादा और अनुचित है.
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रेस्पोंडेंट्स के वकील ने कहा कि CRPF रूल्स, 1955 का रूल 15 दूसरी शादी करने पर साफ तौर पर रोक लगाता है. दूसरी शादी पर्सनल लॉ के तहत जहाँ भी इजाजत हो, की जा सकती है, लेकिन वह भी डिपार्टमेंट की पहले से इजाजत लेकर, वरना नहीं. फोर्स का कोई भी मेंबर अपनी पिछली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करता है, तो वह CRPF जैसी फोर्स का मेंबर बने रहने की अपनी योग्यता खो देता है. फोर्स के किसी भी मेंबर का दूसरी शादी करना उसे फोर्स का मेंबर बनने के लिए डिसक्वालिफाई करता है.
कहा कि फोर्स के किसी सदस्य द्वारा पिछली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करना मिसकंडक्ट माना जाता है, जो CRPF एक्ट के सेक्शन 11 के तहत Punishment के लायक है. दोनों पक्षों के वकील की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को परखा. इसके बाद कहा कि इस मामले में यह बिना किसी शक के मानी हुई है कि पिटीशनर साल 1988 में फोर्स का मेंबर बना, उससे पहले उसकी पहली पत्नी उर्मिला देवी थी, जिनसे उसने साल 1976 में शादी की थी और जिनसे उसके बच्चे भी थे.
इसके बाद, साल 1992 में, उसने डिपार्टमेंट से कोई परमिशन लिए बिना प्रतिमा देवी से दूसरी शादी कर ली. यह सच है कि पिटीशनर ने अपनी दूसरी शादी के बाद प्रतिमा देवी का नाम अपने सर्विस रिकॉर्ड में नॉमिनी के तौर पर दर्ज कराया है. CRPF नियमों के नियम 15 और CCS आचरण नियमों के नियम 21 को मिलाकर पढ़ने से यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सरकारी कर्मचारी या CRPF के सदस्य को सेवा के दौरान दूसरी शादी करने की मनाही है.
कोर्ट ने फैसले में यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम गुलाम मोहम्मद भट, (2005) 13 SCC 228 मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने CRPF एक्ट 1949 के सेक्शन 11 (1) के मतलब और दायरे पर विचार को भी दर्ज कराया:
“सेक्शन 11 को देखने से पता चलता है कि इसमें पिछले सेक्शन में बताई गई बड़ी सजाओं (Punishment) की तुलना में छोटी सजाओं (Punishment) के बारे में बताया गया है. इसमें यह बताया गया है कि कमांडेंट या कोई अन्य अधिकारी, जैसा कि तय किया गया हो, इस एक्ट के तहत बने नियमों के अधीन रहते हुए, फोर्स के किसी भी सदस्य को – जो आदेश न मानने, ड्यूटी में लापरवाही, ड्यूटी निभाने में कोताही या फोर्स के सदस्य के तौर पर किसी अन्य गलत व्यवहार का दोषी पाया जाता है – इनमें से कोई एक या ज्यादा Punishment दे सकता है.
कोर्ट ने कहा कि फैसलों और कानूनों को देखते हुए यह साफ है कि CRPF जैसे फोर्स के किसी सदस्य द्वारा पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करना CRPF नियमों के तहत साफ तौर पर मना है और यह एक कदाचार है. सुप्रीम कोर्ट ने ‘गुलाम मोहम्मद भट’ मामले में कहा है, धारा 11(1) के क्लॉज (a) से (e) के तहत दी जाने वाली सजा, सस्पेंशन या नौकरी से निकालने की सजा (Punishment) के अलावा या उसकी जगह पर दी जा सकती है.
इसलिए, किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि एक्ट की धारा 11 के तहत नौकरी से निकालने की सजा (Punishment) नहीं दी जा सकती, जबकि CRPF एक्ट की धारा 11(1) में साफ तौर पर इसका प्रावधान है. याचिकाकर्ता के खिलाफ बिगैमी का आरोप पूरी तरह साबित हो गया है और इसी के अनुसार, CRPF एक्ट की धारा 11(1) के तहत उसे नौकरी से निकालने की सजा (Punishment) का आदेश दिया गया है, जो कि दी जा सकने वाली एक मान्य सजा है.
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