Bail granted करने और दोषसिद्धि व सजा पर रोक के आदेश पर रोक लगाने के लिए पीआईएल दाखिल करवाने वाले पर हाई कोर्ट ने लगाया 50000 रुपये जुर्माना

क्रिमिनल अपील में दो जजों की बेंच द्वारा आरोपित की Bail granted किये जाने, दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने की मांग के साथ कि क्रिमिनल केस को सुनवाई के लिए एमपी एमएलए कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग में दाखिल की गयी आपराधिक जनहित याचिका को जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने बेतुका करार देते हुए खारिज कर दिया है. कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण कमेंट किये साथ ही याचिकाकर्ता पर 50000 रुपये का हर्जाना लगा दिया.
कोर्ट ने कहा कि हर्जाने की रकम याचिकाकर्ता से वसूली जाएगी और उसे पंद्रह दिनों के भीतर इस कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा करनी होगी. हर्जाना जमा नहीं किया जाता है, तो रजिस्ट्रार जनरल इसे जमीन के लगान की बकाया राशि की तरह वसूलने के लिए तुरंत कदम उठाएंगे. हर्जाना मिलने के बाद, उसे बिना किसी देरी के हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को भेज दिया जाएगा. कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस आदेश को ऑफिस द्वारा 29.06.2026 तक रजिस्ट्रार जनरल के सामने पेश किया जाए.
मामला आजमगढ़ जनपद से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ता लाल चंद यादव की तरफ से दाखिल की गयी पीआईएल पर सुनवाई के बाद दो जजों की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जो राहत मांगी है, वह बेहद चौंकाने वाली और अनुचित है. फिर भी, कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह अपने सामने लाए गए किसी भी मामले पर विचार करे, चाहे मामले का कारण कुछ भी हो और मांगी गई राहत कुछ भी हो.
granted Bail रद्द करने के बारे में सोचने का कोई भी आधार हो

कोर्ट ने कहा कि यहाँ हम पाते हैं कि भले ही याचिकाकर्ता के पास प्रतिवादी को granted Bail रद्द करने के बारे में सोचने का कोई भी आधार हो, लेकिन जिस तरह का अधिकार क्षेत्र उसने अपनाया है और जो राहत मांगी है, उसे देखते हुए हम मामले के मेरिट्स पर विचार नहीं कर सकते.
इस कोर्ट की डिवीजन बेंच ने क्रिमिनल अपील नंबर 7280/2022 में 13.08.2025 के आदेश के जरिए प्रतिवादी नंबर 5 को Bail granted की थी. यह सेशंस कोर्ट द्वारा IPC की धारा 302 के तहत दर्ज दोषसिद्धि के आदेश के खिलाफ एक क्रिमिनल अपील है. इसके बाद 27.08.2025 को एक और आदेश पारित किया गया जिसे याचिकाकर्ता वापस करवाना चाहता है और यह आदेश भी उसी डिवीजन बेंच ने दिया था. इस आदेश के जरिए, पहले दिए गए साधारण जमानत के आदेश में बदलाव करते हुए, अपील लंबित रहने के दौरान प्रतिवादी नंबर 5 की सज़ा को स्थगित (सस्पेंड) कर दिया गया था.
बेंच ने कहा कि अब याचिकाकर्ता लाल चंद यादव चाहता है कि हम उत्तर प्रदेश राज्य, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आजमगढ़ और संबंधित थानाध्यक्ष जिसके द्वारा शाहगंज, जिला जौनपुर और थानाध्यक्ष, थाना फूलपुर, जिला आजमगढ़ को निर्देश दें के लिए कि वे इस कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा क्रिमिनल अपील में Bail granted और सजा पर रोक लगाने के आदेश को वापस लें.
हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ विज्ञान के विषयों के आने से लोगों की जागरूकता और सामान्य ज्ञान पर उनका असर बढ़ा है और कानूनों की जानकारी कम हो गई है. कानून की समझ अब तक के सबसे निचले स्तर पर है.
लोग दूसरे विषयों में इतने व्यस्त हैं कि कोर्ट के बाहर ऐसी बातें कही और की जाती हैं जो कानून की जानकारी रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अजीब या गलत होती हैं. यहाँ समस्या यह है कि यह याचिका एक वकील के जरिए दायर की गई है, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि उन्हें बताई गई कच्ची जानकारियों को वे कोर्ट के सामने कानूनी रूप से सही मामले के तौर पर पेश करेंगे.
बेंच ने किया कमेंट
हमारी पिछली टिप्पणियों का कारण यह है कि अगर सामान्य जागरूकता हो, तो यह समझने के लिए कानून की गहरी ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है कि इस तरह का निर्देश कितना बेतुका है और ऐसी प्रार्थना कभी भी लिखित रूप में नहीं की जानी चाहिए थी. चाहे जो भी कारण रहा हो वकील ने न केवल याचिका का मसौदा तैयार किया बल्कि वह प्रार्थना भी की. इसके कारण उन्हें ही बेहतर पता होंगे.
बेंच द्वारा सुनाये गये फैसले का अंश
याचिका का दूसरा हिस्सा यह है कि क्रिमिनल अपील नंबर 7280/2022, जिसमें डिवीजन बेंच ने अपील स्वीकार कर ली है और Bail granted के साथ सजा पर रोक भी लगा दी है, उसे सुनवाई के लिए MP/MLA कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में भेजा जाए. MP/MLA कोर्ट असल में सेशन कोर्ट के ही हिस्से हैं, जिन्हें खास तौर पर जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए नियुक्त और अधिसूचित किया गया है.
इस कोर्ट में क्रिमिनल अपील, सेशन कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के आदेश के खिलाफ की जाती है. ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे क्रिमिनल अपील को MP/MLA कोर्ट में भेजा जा सके, जो असल में एक सेशन कोर्ट ही है. इस कोर्ट के सामने रखी गई दोनों ही मांगें इतनी चौंकाने वाली हैं कि हमारी राय में ये कोर्ट की अवमानना के लायक भी नहीं हैं.
फिर भी, चूँकि याचिकाकर्ता की ओर से इस तरह की मांग की गई है और ऐसा लगता है कि उसने अपने दो वकीलों को इसे कोर्ट के सामने लाने के लिए मना लिया था इसलिए हम उसे बिना किसी सजा या हर्जाने के जाने नहीं दे सकते. इसलिए इस याचिका को 50,000 रुपये के हर्जाने के साथ खारिज किया जाता है.