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Non-cognizable अपराधों में पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान आदेश अवैध, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया रद्द

Non-cognizable अपराधों में पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान आदेश अवैध, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि Non-cognizable अपराधों से जुड़े मामलों में पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट को राज्य सरकार के मुकदमे के बजाय शिकायत मामले के रूप में माना जाय, ऐसा न करना अवैध होगा. कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के Non-cognizable अपराध में संज्ञान आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है और नियमानुसार कार्यवाही करने की छूट दी है. यह आदेश जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने शिव नरेश की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है.

कौशाम्बी जिले के थाना संदीपनघाट क्षेत्र से जुड़े केस में आरोपी शिव नरेश के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 351(2) और 352 (Non-cognizable) के तहत मामला दर्ज हुआ था. इन धाराओं में 29 दिसंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल हुई और ग्राम न्यायालय चायल के न्यायाधिकारी ने 19 फरवरी 2026 को Non-cognizable अपराध में चार्जशीट संज्ञान लेते हुए आरोपी को सम्मन जारी किया था.

नागरिक सुरक्षा संहिता  की धारा 2(1)(एच) के स्पष्टीकरण के अनुसार Non-cognizable अपराध में पुलिस की चार्जशीट को पुलिस रिपोर्ट नहीं बल्कि शिकायत

आरोपी की ओर से अधिवक्ता अमित सिंह परिहार ने को Non-cognizable अपराध में चार्जशीट को संज्ञान लेने पर हाईकोर्ट में इस कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए दलील दी गई कि उपरोक्त धाराएं Non-cognizable प्रकृति की हैं, इसलिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता  की धारा 2(1)(एच) के स्पष्टीकरण के अनुसार Non-cognizable अपराध में पुलिस की चार्जशीट को पुलिस रिपोर्ट नहीं बल्कि शिकायत माना जाना चाहिए था.

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एकलपीठ ने आवेदक के तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि धारा 2(1)(एच ) के स्पष्टीकरण के अनुसार, जब जांच के बाद किसी Non-cognizable अपराध का खुलासा होने वाली पुलिस रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो उसे शिकायत माना जाएगा और संबंधित जांच अधिकारी को शिकायतकर्ता माना जाएगा.

कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने Non-cognizable अपराध में चार्जशीट को राज्य का मामला मानकर संज्ञान लेने में विधिक भूल की. इस आधार पर 19 फरवरी 2026 का संज्ञान आदेश रद्द कर दिया गया. हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश संबंधित अदालत को आवश्यकता पड़ने पर इस मामले को कानून के अनुसार शिकायत मामले के रूप में आगे बढ़ाने से नहीं रोकेगा. इस तरह याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई.

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जब दो संभावनाएं बनती हों, तो आरोपी के पक्ष वाली संभावना को अपनाया जाना चाहिए: हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 40 साल पुराने एक आपराधिक मामले में तीन बुजुर्ग अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है. यह फैसला न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने सुनाया. यह मामला 23 अक्टूबर 1982 का है, जब जसराना थाना क्षेत्र (जिला मैनपुरी) में रोशन लाल नामक व्यक्ति सब्जी मंडी से घर लौट रहे थे. आरोप था कि आशर्फी, मर्दन, राम बहादुर और रघुबीर नामक चार व्यक्तियों ने लाठियों से हमला कर उनकी हत्या का प्रयास किया.

घटना का कारण एक दिन पहले जानवरों को चराने को लेकर हुआ विवाद बताया गया. मैनपुरी की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत ने 10 सितंबर 1986 को इन सभी चारों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 307/34 के तहत दोषी करार देते हुए दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास और 200-200 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.

इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी. सुनवाई के दौरान एक अपीलकर्ता मर्दन की मृत्यु हो जाने से उसके विरुद्ध अपील निष्प्रभावी हो गई. शेष तीन अपीलकर्ता आशर्फी लाल, राम बहादुर और रघुबीर  जो लगभग 70 वर्ष के हैं और वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं, उनकी ओर से मामले की सुनवाई जारी रही.

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बचाव पक्ष के वकील सुनील कुमार यादव ने दलील दी कि घटना के समय मौके पर मौजूद बताए गए भीड़ में से किसी स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया गया, केवल पिता-पुत्र (शिकायतकर्ता और उसका बेटा) ही गवाह थे.दोनों गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे. घायल की जांच करने वाले डॉक्टर को भी अदालत में पेश नहीं किया गया. चोटें सामान्य प्रकृति की थीं

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपियों की हत्या करने की मंशा या ज्ञान था, जो धारा 307 के तहत दोषसिद्धि के लिए आवश्यक है. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पंकज बनाम राजस्थान राज्य (2016) तथा नत्थू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब दो संभावनाएं बनती हों, तो आरोपी के पक्ष वाली संभावना को अपनाया जाना चाहिए.

इन सभी आधारों पर हाईकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए निचली अदालत के 1986 के फैसले को रद्द कर दिया और आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया. अदालत ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड सहित फैसले की प्रति संबंधित अदालत को अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिया.

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