IT Act की धारा 148 के तहत मृत व्यक्ति को जारी Re-assessment notice शुरू से ही अमान्य, हाई कोर्ट ने नोटिस और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियां रद की

हाई कोर्ट ने आगे कहा कि इनकम टैक्स विभाग मृत करदाता के कानूनी प्रतिनिधि के खिलाफ धारा 159 के तहत कार्यवाही तभी कर सकता है जब करदाता के जीवित रहते हुए उसके खिलाफ वैध रूप से कार्यवाही शुरू की गई हो, या धारा 149 के तहत तय समय-सीमा के भीतर सीधे कानूनी प्रतिनिधि के खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई हो.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धारा 148 के तहत जारी Re-assessment Notice और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों, आदेशों और मांगों को रद्द कर दिया. अपने आखिरी बयान में, कोर्ट ने कहा कि इस मामले से एक ऐसी कमी का पता चला है जिससे राजस्व को नुकसान हो सकता है, लेकिन कोर्ट टैक्स से जुड़े कानून को फिर से नहीं लिख सकता. कोर्ट ने संभावित कानूनी संशोधनों पर विचार करने के लिए इस फैसले को वित्त मंत्रालय को भेजने का निर्देश दिया.
याचिकाकर्ता श्रीमती आशा दुबे के पति संजय दुबे, यूपी में मुख्य प्रबंधन अधिकारी के पद पर कार्यरत थे. 15 अक्टूबर 2020 को याची के पति ने अपने पुत्र प्रखर नारायण के साथ मिलकर एक फ्लैट खरीदा. आयकर विभाग ने 1 अप्रैल, 2021 को अधिनियम की धारा 132 के अनुसार आरोप लगाया गया कि फ्लैट की खरीद में करीब 26 लाख रुपये का नकद लेन देन किया गया था.
7 जनवरी 2024 को याचिकाकर्ता के पति का निधन हो गया और अंतिम संस्कार पूरा करने के बाद आवश्यक औपचारिकताओं के बाद, याचिकाकर्ता संयुक्त राज्य अमेरिका में अपनी बेटी के साथ रहने के लिए चली गईं. कोर्ट मृत करदाता के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था. याचिका में धारा 148 के Re-assessment Notice, उसके बाद के धारा 142(1) नोटिस, शुरुआती आपत्तियों को खारिज करने, असेसमेंट ऑर्डर और डिमांड को चुनौती दी गई थी.
Re-assessment कार्यवाही ऐसे व्यक्ति के नाम पर शुरू और जारी रखी गई थी जिसकी पहले ही मौत हो चुकी थी
याचिका का आधार यह था कि Re-assessment कार्यवाही ऐसे व्यक्ति के नाम पर शुरू और जारी रखी गई थी जिसकी पहले ही मौत हो चुकी थी. जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा कि पिछले वर्षों के असेसमेंट को फिर से खोलने के लिए धारा 148 के तहत नोटिस एक अधिकार-क्षेत्र वाला नोटिस है, जिसे सही व्यक्ति के नाम पर जारी किया जाना चाहिए, न कि मृत व्यक्ति के खिलाफ. मृत व्यक्ति के खिलाफ ऐसा Re-assessment नोटिस जारी करना शुरू से ही अमान्य है, जिससे उसके बाद की सभी कार्यवाही शून्य और अमान्य हो जाती हैं.
बेंच ने कहा कि विभाग मृतक करदाता के कानूनी प्रतिनिधि के खिलाफ धारा 159 का इस्तेमाल करके Re-assessment की कार्यवाही जारी रख सकता है, अगर नोटिस सबसे पहले करदाता को तब जारी किया गया था जब वह जीवित था. धारा 148 के तहत नोटिस जारी होने से पहले ही करदाता की मृत्यु हो गई थी.
उनकी मृत्यु के बाद, इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन के जरिए उनके नाम पर इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल किया गया था. जब कानूनी वारिस ने यह आपत्ति जताई कि कार्यवाही अमान्य है, तो विभाग ने आपत्ति को खारिज कर दिया. विभाग का मुख्य तर्क यह था कि उन्हें मृत्यु के बारे में सूचित नहीं किया गया था और मृतक करदाता के नाम पर रिटर्न दाखिल करना गलत जानकारी देने के बराबर था.
इसके बाद डिपार्टमेंट ने कानूनी वारिस का नाम शामिल किया और असेसमेंट ऑर्डर और डिमांड जारी करने की प्रक्रिया शुरू की. इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई. कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 147 के तहत Re-assessment के अधिकार क्षेत्र का आधार सेक्शन 148 के तहत एक वैध नोटिस है. कोर्ट ने कहा कि किसी मृत व्यक्ति को भेजा गया नोटिस केवल प्रक्रियात्मक गलती नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कमी है.
अलमेलु वीरप्पन (सुप्रा), सविता कपिला (सुप्रा), वनिता गोपाल शेट्टी (सुप्रा) के साथ-साथ स्पाइस इन्फोटेनमेंट (सुप्रा) और भूपेंद्र भिकलाल (सुप्रा) में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ एक्ट के सेक्शन 148 के तहत जारी Re-assessment Notice शुरुआत से ही अमान्य है, जिससे इसके बाद की सभी कार्यवाही भी अमान्य हो जाती है.
बेंच ने आगे कहा कि सेक्शन 159 के तहत कानूनी वारिस के खिलाफ कार्यवाही तब तक जारी नहीं रखी जा सकती जब तक कि कार्यवाही की शुरुआत ही मृत व्यक्ति के खिलाफ न हुई हो. बेंच ने कहा कि मृतक के कानूनी प्रतिनिधि के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए, सेक्शन 148 के तहत Re-assessment नोटिस शुरू में ही मृतक असेसी (करदाता) के कानूनी प्रतिनिधियों को समय-सीमा के भीतर जारी किया जाना चाहिए था. चूंकि कानून में डिपार्टमेंट को मृतक की मृत्यु की सूचना देने का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए मृत्यु की जानकारी देने की जिम्मेदारी कानूनी प्रतिनिधि पर नहीं डाली जा सकती.
डिपार्टमेंट ने तर्क दिया कि इस कमी को सेक्शन 292B के तहत ठीक किया जा सकता है. इसे खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान केवल उन तकनीकी गलतियों को ठीक करने की अनुमति देता है जहाँ Re-assessment नोटिस असल में एक्ट के अनुरूप हो.

कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 292B जारी किए गए Re-assessment नोटिस की कमी को ठीक करने का प्रावधान करता है, बशर्ते नोटिस असल में एक्ट के मकसद और उद्देश्य के अनुरूप हो. निस्संदेह, किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ नोटिस जारी करना असल में सेक्शन 148 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है, जो असेसमेंट को फिर से खोलने का आधार है; और अधिकार क्षेत्र तभी प्राप्त किया जा सकता है जब Re-assessment नोटिस सही व्यक्ति को जारी किया जाए.
किसी मृत व्यक्ति को Re-assessment नोटिस जारी करना केवल प्रक्रियात्मक गलती नहीं है, बल्कि अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती है जो पूरी कार्यवाही को अमान्य बना देती है. कोर्ट ने कहा कि रेवेन्यू विभाग सेक्शन 292B का इस्तेमाल करके किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ सेक्शन 148 के तहत जारी नोटिस को वैध नहीं ठहरा सकता, क्योंकि यह केवल प्रक्रिया से जुड़ी कोई मामूली कमी नहीं है.
इसलिए, किसी मृत करदाता के खिलाफ जारी Re-assessment नोटिस शुरू से ही अमान्य होता है और सेक्शन 292B का सहारा लेकर इसे ठीक नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कानूनी उत्तराधिकारी के शामिल होने या जवाब दाखिल करने से सेक्शन 292BB के तहत आई कमी को ठीक किया जा सकता है.
बेंच ने कहा कि इस मामले में सेक्शन 292BB लागू करने की मुख्य शर्त मौजूद नहीं है. सेक्शन 292BB उन स्थितियों के लिए है जहाँ करदाता को कार्यवाही शुरू होने का नोटिस दिया जाता है. कोर्ट ने माना कि जहाँ कानून अधिकार क्षेत्र नहीं देता, वहाँ अधिकार छोड़ने सहमति देने या मंजूरी देने से अधिकार क्षेत्र नहीं बन सकता. कोर्ट ने डिपार्टमेंट की इस दलील को खारिज कर दिया कि सरकारी राजस्व की सुरक्षा के लिए Re-assessment को बरकरार रखा जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि टैक्स कानूनों की व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए.
“इक्विटी (न्याय/निष्पक्षता) और टैक्स का आपस में कोई लेना-देना नहीं है. अगर टैक्स कानून के तहत किसी खास आय पर टैक्स लगता है, तो व्यक्ति पर टैक्स लगाया जा सकता है, और अगर नहीं लगता, तो नहीं लगाया जा सकता.”
कोर्ट ने कहा
कोर्ट ने यह भी माना कि कानूनी कमी को पूरा करने या बिना अधिकार क्षेत्र के शुरू की गई कार्यवाही को सही ठहराने के लिए इक्विटी से जुड़े विचारों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. डिपार्टमेंट ने यह भी तर्क दिया कि अगर Re-assessment notice रद्द कर दिया जाता है, तो सेक्शन 150 का इस्तेमाल करके कानूनी प्रतिनिधि को नया नोटिस जारी किया जा सकता है.
कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सेक्शन 148 के तहत अमान्य Re-assessment नोटिस को रद्द करने का आदेश सेक्शन 150(1) के तहत कोई निष्कर्ष या निर्देश नहीं माना जा सकता. जहाँ सेक्शन 148 के तहत नोटिस जारी करने के लिए सेक्शन 149 में तय समय सीमा खत्म हो चुकी है, वहाँ डिपार्टमेंट सिर्फ इक्विटी के आधार पर या सेक्शन 150(1) का सहारा लेकर समय-सीमा खत्म हो चुकी कार्यवाही को फिर से शुरू नहीं कर सकता.
अगर सेक्शन 149 के तहत तय समय सीमा खत्म हो गई है, तो कानूनी प्रतिनिधि को नया नोटिस जारी करना कानूनन गलत है और Re-assessment की कार्यवाही समय-सीमा खत्म होने के कारण नहीं की जा सकती.
कोर्ट ने डिपार्टमेंट द्वारा मामले को संभालने के तरीके की आलोचना की और कहा कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, जिसके पास सरकार का बड़ा तंत्र है और जिस पर एक जटिल वित्तीय कानून को लागू करने की अहम जिम्मेदारी है, उसने एक मृत व्यक्ति के खिलाफ Re-assessment की कार्यवाही शुरू की, आगे बढ़ाई और पूरी की. उसने व्यक्ति की मौत की साफ जानकारी मिलने के बावजूद ऐसा किया और जाहिर तौर पर उस बुनियादी कानूनी सिद्धांत को नजरअंदाज किया कि एक मृत व्यक्ति कानूनी इकाई नहीं होता और उस पर Re-assessment की कार्यवाही नहीं की जा सकती.
“मरे हुए व्यक्ति पर टैक्स लगाना, बुनियादी तौर पर, शब्दों का विरोधाभास है, क्योंकि टैक्स लगाना संप्रभु शक्ति का कानूनी इस्तेमाल है, जो ऐसे जीवित लोगों पर लागू होता है जिनके पास कानूनी पहचान, जवाब देने की क्षमता और कार्यवाही में भाग लेने की काबिलियत होती है. एक मृत व्यक्ति इनमें से कोई भी काम नहीं कर सकता.”
कोर्ट ने जजमेंट में कोट कराया
WRIT TAX No. – 571 of 2026; Smt. Asha Dubey Vs Union of India Thru. Secy. Ministry of Finance Deptt.