Surcharge लगाने की एकमात्र वैधानिक प्रक्रिया उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 27 तथा उत्तर प्रदेश पंचायत राज नियमावली, 1947 के नियम 256 और 257 में ही निहित
हाई कोर्ट ने पूर्व ग्राम प्रधान से Surcharge वसूली आदेश रद किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी, प्रयागराज द्वारा एक पूर्व ग्राम प्रधान के खिलाफ पारित Surcharge (वसूली) आदेश को रद्द कर दिया है. जस्टिस अजित कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह फैसला शिवपूजन तिवारी की याचिका पर यह आदेश दिया है. याची शिवपूजन तिवारी 2010-2015 के दौरान ग्राम पंचायत के निर्वाचित प्रधान रहे थे. कार्यकाल समाप्त होने के बाद, 28 मई 2016 को दया शंकर तिवारी ने उनके खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत दर्ज कराई.
इस शिकायत के आधार पर जिलाधिकारी ने जिला प्रोबेशन अधिकारी और कनिष्ठ अभियंता (ग्रामीण अभियंत्रण) की एक जांच समिति गठित की, जिसने 18 अगस्त 2017 को अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी हुआ और अंततः 22 मई 2018 को जिलाधिकारी ने आदेश पारित कर पूर्व प्रधान और ग्राम पंचायत सचिव को संयुक्त रूप से 29,69,021 रुपये के नुकसान के लिए उत्तरदायी ठहराया. याचिकाकर्ता पर इसमें से 14,84,510 रुपये Surcharge (आधा हिस्सा) वसूलने का आदेश दिया गया.
याची के वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार त्रिपाठी ने तर्क दिया कि Surcharge लगाने की एकमात्र वैधानिक प्रक्रिया उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 27 तथा उत्तर प्रदेश पंचायत राज नियमावली, 1947 के नियम 256 और 257 (अध्याय XIII सरचार्ज नियम) में निहित है. इन नियमों के अनुसार Surcharge लगाने की जांच केवल मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितियां एवं पंचायत ही कर सकते हैं. लेकिन इस मामले में जांच जिला प्रोबेशन अधिकारी और कनिष्ठ अभियंता द्वारा की गई, जो कि वैधानिक रूप से अधिकृत अधिकारी नहीं थे.
2015 में ही प्रधान पद से हट चुका था ,इसलिए उनके खिलाफ Surcharge कार्यवाही नहीं की जा सकती
यह भी तर्क दिया गया कि याची 2015 में ही प्रधान पद से हट चुका था ,इसलिए उनके खिलाफ Surcharge कार्यवाही नहीं की जा सकती. साथ ही, निजी शिकायत को Surcharge कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जा सकता. राज्य की ओर से स्थायी अधिवक्ता प्रदीप सिंह ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने ग्राम पंचायत सचिव के साथ मिलकर बड़ी मात्रा में सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया. 56 कार्यों में से 51 कार्य त्रुटिपूर्ण पाए गए. यह भी कहा गया कि धारा 27(3) के तहत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के कारण याचिका खारिज होनी चाहिए.
कोर्ट ने वैकल्पिक उपाय (अपील) की आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि जब Surcharge लगाने का आदेश मूल रूप से अधिकार-क्षेत्र से बाहर हो, तो वैकल्पिक उपाय का अभाव याचिका पर सुनवाई में बाधा नहीं बनता. कोर्ट ने कहा कि यह याचिका 2018 से लंबित है और पक्षकारों के बीच पूरी बहस हो चुकी है, इसलिए अब इसे वैकल्पिक उपाय के आधार पर खारिज करना उचित नहीं होगा.
कोर्ट ने कहा कि नियम 256 और 257 स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जांच केवल मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितियां एवं पंचायत द्वारा ही की जा सकती है. इस मामले में जिला प्रोबेशन अधिकारी और कनिष्ठ अभियंता की समिति को यह अधिकार नहीं था. कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रियागत चूक जांच को अधिकार-क्षेत्र से बाहर बनाती है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कानून किसी कार्य को करने का एक विशेष तरीका बताता है, तो वह कार्य उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा नही. चूंकि मूल आदेश ही दोषपूर्ण था, इसलिए लैटिन सिद्धांत यदि नींव ही हट जाए, तो पूरी इमारत गिर जाती है, के अनुसार पूरी कार्यवाही रद्द हो गई.

हालांकि कोर्ट ने याची की इस दलील को खारिज कर दिया कि पूर्व प्रधान के खिलाफ Surcharge कार्यवाही नहीं हो सकती. कोर्ट ने कहा कि धारा 27 में प्रयुक्त शब्द (जब वह प्रधान थे) से स्पष्ट है कि विधायिका की मंशा पद छोड़ने के बाद भी दायित्व बनाए रखने की थी. बशर्ते यह नियम 257 में निर्धारित तीन वर्ष की समय-सीमा के भीतर हो.
कोर्ट ने कहा कि निजी शिकायत Surcharge कार्यवाही की शुरुआत का आधार बन सकती है, बशर्ते जिलाधिकारी उसे गंभीरता से जांचने के बाद मामला मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी को भेजें, जो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ऑडिट कर रिपोर्ट दें. इस मामले में ऐसा नहीं हुआ, इसलिए प्रक्रिया दोषपूर्ण रही.
कोर्ट ने कहा कि याची को मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी की ओर से कभी कोई नोटिस नहीं मिला, न ही ऐसी कोई रिपोर्ट जिलाधिकारी के पास भेजी गई. इस आधार पर 22 मई 2018 का Surcharge वसूली आदेश रद्द कर दिया. प्राधिकारियों को कानून के अनुसार, विशेष रूप से नियमावली 1947 के अध्याय XIII में निर्धारित परिसीमा अवधि के अधीन, नए सिरे से कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी गई है.