जब Death का कारण ही साबित नहीं हो सका तो हत्या कैसे मानी जाएगी, ट्रायल कोर्ट से दोषी ठहराये गये 3 आरोपित बरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, संदेह से परे साक्ष्य पेश नहीं कर सका अभियोजन पक्ष, कोर्ट ने विवेचना में खामियां गिनायीं

जब Death का कारण ही साबित नहीं हो सका तो कारतूस और बैलिस्टिक रिपोर्ट का कोई खास मूल्य नहीं रह जाता. Death व्यक्ति के कंकाल की बरामदगी सार्वजनिक स्थान से हुई थी, इसलिए महज आरोपियों के इशारे पर बरामदगी को दोष सिद्ध करने का आधार नहीं बनाया जा सकता. अभियोजन प्रस्तुत साक्ष्यों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा और इसका लाभ आरोपितों को मिलना चाहिए.
इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने झाँसी के प्रेमनगर थाना क्षेत्र से जुड़े एक बहुचर्चित हत्याकांड (Death) में सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए तीनों दोषियों अनूप दुबे, कपिल शर्मा और आकाश उर्फ अक्कू को बरी कर दिया है.
तथ्यों के अनुसार वर्ष 2013 में देवेंद्र उर्फ दीपक तोमर नामक व्यक्ति 14 मई को लापता हो गया था. काफी खोजबीन के बाद भी उसका कुछ पता नहीं चला. इस संबंध में थाने को सूचना भी दी गयी थी. कोर्ट में रखे गये तथ्यों के अनुसार एक Death व्यक्ति का शव 17 मई 2013 को सड़ी गली हालत में बरामद किया गया. इस शव (Death Person) की पहचान कथित तौर पर देवेन्द्र उर्फ दीपक तोमर के रूप में हुई. पुलिस ने बॉडी (Death Person ) को पोस्टमार्टम के लिए भेजा लेकिन मौत का कारण नहीं पता चला. उधर, इस मामले में थाने में हत्या समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज करा दी गयी.
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की विवेचना की और साक्ष्य जुटाये. इसके बाद कोर्ट में Death का मर्डर का मामला बताते हुए चार लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गयी. ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य के रूप में पेश किये गये तथ्यों को परखा और फिर पत्रावली पर उपलब्ध सुबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर चार आरोपियों को धारा 302/34, 201/34 और 506 आईपीसी के तहत दोषी करार दिया. इनमें से एक आरोपी गौरव झा की फैसले के तुरंत बाद Death हो गई थी.

सजा पाने वाले जिंदा बचे बाकी तीन आरोपितों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी. आरोपितों की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता का कहना था कि पोस्टमार्टम होने के बाद भी Death का कारण नहीं पता चला. आरोपियों के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं थे, इसके बाद भी ट्रायल कोर्ट ने उन्हें सजा सुनायी है जो कानून के खिलाफ है.
दोनों पक्षों की तरफ से पेश साक्ष्य और रिकॉर्ड पर उपलब्ध गवाहों के बयानों को परखने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कई अहम खामियां गिनाईं. कहा कि शव (Death Person) इतनी सड़ी-गली अवस्था में मिला था कि केवल कंकाल बचा था. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हो सका था. Death Person के कंकाल की कोई डीएनए जांच भी नहीं कराई गई, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि वह देवेंद्र का ही शव था.
घटनास्थल पर Death Person को आखिरी बार आरोपियों के साथ देखे जाने के दोनों गवाह अदालत में मुकर गए
घटनास्थल पर Death Person को आखिरी बार आरोपियों के साथ देखे जाने के दोनों गवाह अदालत में मुकर गए थे. घटनास्थल से बरामद खोखा कारतूस के जब्ती ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले स्वतंत्र गवाहों से भी पूछताछ नहीं कराई गई थी. सभी आरोपियों का धारा 27 साक्ष्य अधिनियम के तहत एक ही साझा ज्ञापन तैयार किया गया था, जबकि प्रत्येक आरोपी का अलग-अलग होना चाहिए था.
कोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहा और सभी तीन अपीलों को स्वीकार करते हुए दोषियों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया.