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ट्रायल कोर्ट सुनिश्चित करें कि 125 CrPc के तहत Maintenance allowance पाने के लिए बार-बार ‘एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन’ देने की जरूरत ही न रहे

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी फैमिली कोर्ट और ग्राम न्यायालयों के लिए जारी किया निर्देश, रिवीजन याचिका मंजूर

ट्रायल कोर्ट सुनिश्चित करें कि 125 CrPc के तहत Maintenance allowance पाने के लिए बार-बार 'एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन' देने की जरूरत ही न रहे

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि CrPC की धारा 125 के तहत Maintenance allowance देना एक लगातार चलने वाली जिम्मेदारी है. हर महीने Maintenance allowance पाने के लिए बार-बार एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन दाखिल करने की नौबत नहीं आने देना चाहिए. बेहतर होगा कि ट्रायल कोर्ट इस व्यवस्था पर प्रभावी तरीके से अमल कराने के लिए सीधे बैंक में पैसे जमा करने या सैलरी से कटौती करने का तरीका अपनाएं.

इस कमेंट के साथ जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की बेंच ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पति द्वारा सिर्फ एक महीने का बकाया पैसा जमा करने पर ही अमल की कार्यवाही बंद कर दी गई थी. Maintenance allowance के रेग्युलर भुगतान के लिए यह रिविजन याचिका जौनपुर जिले की रहने वाली माला कुमारी की तरफ से दाखिल की गयी थी.

महिला का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता ने क्रिमिनल रिविजन को मंजूरी देने की मांग करते हुए जौनपुर की फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज-I द्वारा मिसलेनियस केस नंबर 641/2025 (माला कुमारी बनाम आनंद कुंवर) में 06.12.2025 और 27.01.2026 को दिए गए फैसले और आदेश को रद्द करने की मांग की थी. यह केस B.N.S.S. की धारा 147 के तहत दायर किया गया था, जिसमें जौनपुर की फैमिली कोर्ट-I के एडिशनल प्रिंसिपल जज ने केस को खारिज कर दिया था.

याचिका में यह मांग भी की गयी थी कि कोर्ट पति को निर्देश दे कि वह अप्रैल 2025 से हर महीने फैमिली कोर्ट से निर्धारित 5,000 रुपये Maintenance allowance कराना सुनिश्चित करे. यह आदेश जौनपुर की फैमिली कोर्ट-I के एडिशनल प्रिंसिपल जज द्वारा केस नंबर 416/2018 (माला कुमारी बनाम आनंद कुंवर) में 04.03.2023 को दिया गया था. बेंच ने कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत Maintenance allowance का आदेश एक लगातार चलने वाली कानूनी जिम्मेदारी बनाता है.

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पत्नियों को हर बार भुगतान न होने पर कोर्ट में ‘एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन’ दायर करने की जरूरत नहीं है. हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी फैमिली कोर्ट और ग्राम न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि Maintenance allowance सीधे दावेदार के वेरिफाइड बैंक खाते में भेजा जाए. एम्प्लॉयर सैलरी पाने वाले जीवनसाथी की सैलरी से सीधे बकाया राशि काटें, और चेतावनी दी गई कि भुगतान न करने पर संपत्ति जब्त की जा सकती है, साधारण जेल हो सकती है और नियमों का पालन न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ़ अनुशासनात्मक या अवमानना की कार्रवाई हो सकती है.

यूपी के सभी फैमिली कोर्ट और ग्राम न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों को Maintenance allowance को लेकर दिया निर्देश :

  • (i) ट्रायल कोर्ट को माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘शांता उर्फ उषादेवी’ (supra) मामले में तय किए गए कानून का पालन करना चाहिए, जिसके अनुसार हर महीने गुजारा-भत्ता पाने के लिए बार-बार ‘एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन’ दायर करने की जरूरत नहीं है.
  • (ii) ट्रायल कोर्ट को ‘पूनगोडी’ (supra) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून का भी पालन करना चाहिए, जिसके अनुसार CrPC की धारा 125(3) / B.N.S.S. की धारा 144(3) का पहला प्रावधान दावेदार के एक साल से ज्यादा समय के Maintenance allowance का बकाया वसूलने के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगाता या असर नहीं डालता है.”

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तथ्यों के अनुसार पत्नी ने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 125 के तहत अपने पति से Maintenance allowance पाने के लिए अर्जी दायर की. फैमिली कोर्ट ने अर्जी मंज़ूर कर ली और पति को पत्नी को हर महीने गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया. इसके बाद, पत्नी ने Cr.P.C. की धारा 128 के तहत आदेश के पालन (एग्जीक्यूशन) की कार्यवाही शुरू की, पति द्वारा उस समय तक का बकाया चुका देने पर यह कार्यवाही समाप्त हो गई. इसके बाद, पत्नी ने भविष्य के मासिक गुजारा-भत्ते और बीच के उन महीनों के बकाये के लिए, जिनका भुगतान नहीं हुआ तो दूसरी एग्जीक्यूशन अर्जी दायर की.

शुरुआत में फैमिली कोर्ट ने रिकवरी वारंट जारी किया था, लेकिन पति द्वारा एक महीने का बकाया जमा करने के बाद उसे वापस ले लिया. आखिरकार, फैमिली कोर्ट ने Cr.P.C. की धारा 125(3) के प्रावधान के तहत पत्नी की एग्जीक्यूशन एप्लीकेशन को खारिज कर दिया और मामले को रिकॉर्ड रूम में भेज दिया. कोर्ट ने कहा कि आगे कोई रिकवरी नहीं की जा सकती और भविष्य के Maintenance allowance के मासिक भुगतान के लिए रिकवरी वारंट जारी नहीं किए जा सकते, जो अभी देय नहीं हैं. इस आदेश से नाराज पत्नी ने यह क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की.

रिवीजन करने वाली/पत्नी ने कहा कि मूल Maintenance allowance आदेश वैध और लागू था और किसी भी सक्षम अदालत ने इसे कभी वापस नहीं लिया या रद्द नहीं किया. तर्क दिया गया कि फैमिली कोर्ट ने केवल इसलिए एग्जीक्यूशन एप्लीकेशन खारिज करके गलती की क्योंकि पति ने एक महीने का बकाया जमा कर दिया था, जिससे Maintenance allowance आदेश का निरंतर प्रभाव व्यावहारिक रूप से खत्म हो गया.

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आग्रह किया गया कि Cr.P.C. की धारा 125(3) का प्रावधान केवल समय-सीमा के बाद रिकवरी वारंट जारी करने की प्रक्रिया को सीमित करता है, लेकिन Maintenance allowance के लिए पत्नी के मूल अधिकार को खत्म नहीं करता और न ही इसे लागू करने के उपायों को रोकता है. तर्क दिया गया कि हर चूक के लिए पत्नी से बार-बार एग्जीक्यूशन एप्लीकेशन दाखिल करवाना अनुचित और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है. राज्य ने इस बात का समर्थन किया कि Maintenance allowance आदेश पति पर तब तक निरंतर कानूनी दायित्व बनाता है जब तक वह लागू रहता है.

कोर्ट ने कहा कि Cr.P.C. की धारा 125 के तहत पारित Maintenance allowance आदेश एक निरंतर दायित्व बनाता है. फैमिली कोर्ट ने आंशिक जमा राशि पर एग्जीक्यूशन की कार्यवाही समाप्त करके गलती की, क्योंकि पति पर मासिक Maintenance allowance देने का निरंतर कानूनी दायित्व बना हुआ था. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि पत्नियों को हर मासिक चूक के लिए नई, लगातार एग्जीक्यूशन एप्लीकेशन दाखिल करने की आवश्यकता नहीं है.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Cr.P.C. की धारा 125(3) के प्रावधान के तहत एक साल की समय-सीमा केवल रिकवरी वारंट जारी करने या हिरासत का आदेश देने की विशिष्ट प्रक्रिया को सीमित करती है, लेकिन बकाया गुजारा-भत्ते का दावा करने के पत्नी के अधिकार को खत्म नहीं करती है.

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बार-बार मुकदमेबाजी को रोकने के लिए, कोर्ट ने निर्देश दिया कि Maintenance allowance की राशि सीधे दावेदार के सत्यापित बैंक खाते में जमा की जाए. जिन मामलों में पति नौकरी करता है, वहां निचली अदालतों को निर्देश दिया गया कि वे नियोक्ता को आदेश दें कि वह पति की सैलरी से सीधे गुजारा-भत्ता (Maintenance allowance) काट ले.

बेंच ने कहा कि अगर Maintenance allowance देने से इनकार किया जाता है या पैसे की कमी के कारण भुगतान नहीं हो पाता है, तो निचली अदालत कानून के अनुसार गुजारा-भत्ता देने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की संपत्ति को कुर्क करके रकम वसूल करेगी. अगर कुर्क की गई संपत्ति बकाया गुजारा-भत्ता चुकाने के लिए काफी नहीं है, तो Cr.P.C. की धारा 125(3) / B.N.S.S. की धारा 144(3) और सुप्रीम कोर्ट के ‘रजनीश बनाम नेहा; (2021) 2 SCC 324’ मामले में तय कानून के अनुसार, हर महीने के डिफॉल्ट के लिए एक महीने तक की साधारण कैद का आदेश दिया जा सकता है या भुगतान होने तक (जो भी पहले हो) कैद का आदेश दिया जा सकता है.

बेंच ने राज्य की सभी फैमिली कोर्ट और ग्राम न्यायालयों को इन लागू करने के तरीकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि गुजारा-भत्ता के आदेशों को अक्षरशः और उनकी मूल भावना के अनुसार लागू न करने पर अनुशासनात्मक और अवमानना की कार्रवाई की जाएगी.

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