+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

‘Code on Social Security’, 2020′ यूपी फाइनेंशियल हैंडबुक की दूसरी मैटरनिटी लीव पर दो साल की रोक से ऊपर माना जाएगा

'Code on Social Security', 2020' यूपी फाइनेंशियल हैंडबुक की दूसरी मैटरनिटी लीव पर दो साल की रोक से ऊपर माना जाएगा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि ‘Code on Social Security’, 2020′ किसी भी एग्जीक्यूटिव निर्देश (जिसमें यूपी फाइनेंशियल हैंडबुक का नियम 153(1) भी शामिल है) से ऊपर है. कोर्ट ने ‘Code on Social Security’को सर्वोपरि रखते हुए उन आदेशों को रद्द कर दिया जिसके तहत यूपी फाइनेंशियल हैंडबुक के नियम 153(1) का हवाला देकर स्टाफ नर्सों की मैटरनिटी लीव के आवेदन को खारिज कर दिया गया था. आदेश में कहा गया था कि पहली और दूसरी मैटरनिटी लीव के बीच कम से कम दो साल का अंतर होना चाहिए जो नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि 8 दिसंबर 2008 के सरकारी आदेश और फाइनेंशियल हैंडबुक के नियम 153(1) में दी गई शर्त को ‘Social Security’ code’ के तहत मिलने वाले फायदों को खत्म करने या कम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती, क्योंकि ‘Social Security’ code’ की धारा 161 इसे किसी भी ऐसे कानून पर प्राथमिकता देती है जो इसके लागू होने से पहले या बाद में बना हो. यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने सुनाया है.

यह रिट याचिका 09.01.2026 के विवादित आदेश और प्रतिवादी द्वारा जारी 06/01/2026 के विवादित आदेश को रद्द किये जाने की मांग की गयी थी जिसके तहत याचिकाकर्ता की मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) की अर्जी खारिज कर दी गई थी. इसके अलावा दोनो याचिकाकर्ताओं के लिए 180 दिन की मैटरनिटी लीव मंजूर करने के साथ ही उन्हें कानून के तहत मिलने वाले सभी संबंधित सर्विस बेनिफिट्स प्रदान किये जाने का आदेश देने की मांग की थी.

मैटरनिटी लीव की मांग को खारिज कर दिया गया, जो ‘Social Security’ code’, 2020′ के प्रावधानों के खिलाफ

याचिकाकर्ताओं के वकील का कहना था कि याचिकाकर्ताओं की मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) की मांग को 08.12.2008 के सरकारी आदेश के आधार पर खारिज कर दिया गया है, जो ‘Social Security’ code’, 2020′ के प्रावधानों के खिलाफ है. उनका यह भी कहना था कि उस सरकारी आदेश के आधार पर दावा खारिज करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है, जिसमें कहा गया है कि पिछली मैटरनिटी लीव लेने की तारीख से दो साल के भीतर दूसरी बार मैटरनिटी लीव नहीं दी जा सकती.

इसे भी पढ़ें…. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामपुर के कैमरी में Firing के आरोपी को दी जमानत, 15 महीने से बंद था जेल में

चूंकि ‘Social Security’ code’ 2020′ के लागू होने और याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए आधार का सवाल पूरी तरह से कानूनी प्रकृति का है, इसलिए एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल ने तर्क दिया कि वे कोई जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं करना चाहते और कानूनी मुद्दे पर बहस करने के लिए तैयार हैं. पहली याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश सरकार के चिकित्सा शिक्षा विभाग के तहत नियमित रूप से नियुक्त स्टाफ नर्स/नर्सिंग ऑफिसर के तौर पर काम कर रही हैं. उन्हें पहले 12.02.2024 के ऑफिस ऑर्डर के जरिए 29.01.2024 से 27.07.2024 तक 180 दिनों की मैटरनिटी लीव दी गई थी.

इसके बाद, वह फिर से गर्भवती हुईं और उनके दूसरे बेटे की डिलीवरी की संभावित तारीख 12.01.2026 थी. इसके अनुसार, उन्होंने 05.01.2026 को एक आवेदन दिया, जिसमें 19.01.2026 से 17.07.2026 (180 दिन) तक मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) देने की मांग की गई थी. यह आवेदन खारिज कर दिया गया. इसका एकमात्र आधार यह था कि पिछली बार ली गई मैटरनिटी लीव के बाद से दो साल पूरे नहीं हुए थे. यह निर्णय 08.12.2008 के सरकारी आदेश और चिकित्सा शिक्षा विभाग पर लागू U.P. फाइनेंशियल हैंडबुक के नियम 153(1) के आधार पर लिया गया था.

इसे भी पढ़ें…. पति शब्द का अर्थ है एक विवाहित पुरुष जिसकी कानूनी पत्नी जीवित हो, पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी अवैध, लागू नहीं हो सकते BNS की धारा 80 और 85 के प्रावधान

बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ‘Social Security’ code’, 2020′ की पूरी स्कीम में पहले और दूसरे बच्चे के जन्म के बीच समय के अंतर के बारे में कोई शर्त नहीं है, जैसा कि फाइनेंशियल हैंडबुक के नियम 153(1) में दिया गया है. स्टेट की तरफ से ‘रेणु चौधरी बनाम यूपी राज्य’ मामले में एक कोऑर्डिनेट बेंच के फैसले का हवाला दिया गया, लेकिन इस मामले को उससे अलग बताया क्योंकि वह यूपी बेसिक एजुकेशन बोर्ड के एक कर्मचारी से जुड़ा था, जिस पर पुराना मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 लागू नहीं होता था.

संविधान के आर्टिकल 38, 39, 42, 43 और 15(3) की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने कहा, “…भारत के संविधान का आर्टिकल 39 कहता है कि नागरिकों – पुरुषों और महिलाओं – को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन पाने का अधिकार है.

इसे भी पढ़ें….इसमें कोई विवाद नहीं कि राज्य सरकार के पास वेतनमान तय करने और कर्मचारियों के बीच कैडर वर्गीकरण करने की शक्ति है

इस मुद्दे पर विचार करते हुए कि क्या एग्जीक्यूटिव निर्देशों से मैटरनिटी राहत को कम किया जा सकता है या इसे लिस्ट III की एंट्री 24 के तहत संसदीय कानून के अधीन होना चाहिए, कोर्ट ने कहा कि ‘Social Security’ code’ 2020 को ओवरराइड करने वाले किसी भी राज्य कानून के लिए आर्टिकल 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं ली गई थी और वैसे भी ऐसा कोई विरोधाभासी राज्य कानून मौजूद नहीं था.

Writ-A No. 9299 of 2026; Shikha Yadav and Another v. State of U.P. and 2 Others

इसे भी पढ़ें…. 2019-20 के दौरान गाजियाबाद में न्यायिक अधिकारी की Questionable Integrity की टिप्पणी रद्द

इसे भी पढ़ें…. हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(a) के तहत, Minor children की कस्टडी आम तौर पर माँ के पास होती है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *