Disciplinary Authority द्वारा दर्ज की गई सहमति कारण बताओ नोटिस जारी करने का बुनियादी आधार होती है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देवरिया के आरक्षी को सेवा से बर्खास्त करने के फैसले को सही ठहराया, याचिका खारिज की

यह Disciplinary Authority के लिए एक पूर्व-शर्त भी है कि वह इस बात से संतुष्ट हो कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज निष्कर्ष सही हैं और रिकॉर्ड में उपलब्ध तार्किक सबूतों पर आधारित हैं. जब तक Disciplinary Authority द्वारा वह सहमति दर्ज नहीं की जाती तब तक वह कारण बताओ नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में आगे नहीं बढ़ सकती. Disciplinary Authority द्वारा दर्ज की गई सहमति याचिकाकर्ता के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने का एक बुनियादी आधार होती है.
कारण बताओ नोटिस जारी करते समय उस सजा का प्रस्ताव करना भी एक पूर्व-आवश्यकता है. Disciplinary Authority की रेकमेंडेशन के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी करने को अवैध नहीं ठहराया जा सकता है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की बेंच ने यह तर्क देने के साथ ही आरक्षी संत राम गौतम को सेवा से बर्खास्त किये जाने के फैसले को सही ठहराया और याचिका को खारिज कर दिया है.
संत राम गौतम की तरफ से यह रिट याचिका 2012 के उस आदेश को रद्द करने की मांग में दायर की गई थी जिसके तहत याचिकाकर्ता को पुलिस की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. इस आदेश के खिलाफ अफसरों के यहां दाखिल की गयी अपील और रिवीजन को भी खारिज कर दिया गया था.
तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता 2010 में देवरिया जिले की रिजर्व पुलिस लाइंस में कांस्टेबल के तौर पर काम कर रहा था. 06.08.2010 को पुलिस लाइंस देवरिया के ऑफिस से उसकी ड्यूटी NCC गार्ड के तौर पर लगाई गई थी. विभाग को बिना कोई सूचना दिए याचिकाकर्ता अपनी ड्यूटी से गायब हो गया और बाद में वह देवरिया के मछली हट्टा बाजार में देसी शराब की दुकान के पास पुलिस की वर्दी में नशे की हालत में पाया गया.
याचिकाकर्ता पर लगे आरोपों के लिए उसके खिलाफ Disciplinary कार्यवाही शुरू की गई और चार्जशीट जारी की गई. चार्जशीट की कॉपी याचिकाकर्ता को दी गई और उसने इसकी प्राप्ति स्वीकार की. चार्जशीट का जवाब देने के लिए समय मांगा. चूंकि याचिकाकर्ता की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया, इसलिए जांच अधिकारी ने जांच आगे बढ़ाई और गवाहों से पूछताछ के लिए तारीख तय की गई.
पुलिस अधीक्षक ने याचिकाकर्ता को Disciplinary Authority की जांच रिपोर्ट की कॉपी के साथ कारण बताओ नोटिस जारी किया
Disciplinary Authority द्वारा उचित सूचना देकर जांच की कार्यवाही पूरी करने के लिए कई तारीखें तय की गईं और याचिकाकर्ता कार्यवाही से अनुपस्थित रहा. इसके बाद, जांच पूरी की गई और जांच अधिकारी ने माना कि याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से साबित हो गए हैं. इसके बाद, देवरिया के पुलिस अधीक्षक ने याचिकाकर्ता को Disciplinary Authority की जांच रिपोर्ट की कॉपी के साथ कारण बताओ नोटिस जारी किया.
मौका दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ने अपना जवाब नहीं दिया इसलिए Disciplinary Authority ने 13.02.2012 का विवादित आदेश पारित किया, जिसके तहत याचिकाकर्ता को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. इससे असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया. पुनरीक्षण प्राधिकरण ने रिवीजन को खारिज कर दिया तो हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गयी.

वकील ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता को पर्याप्त मौका नहीं दिया गया और ‘शो कॉज नोटिस’ के जवाब में याचिकाकर्ता द्वारा दी गई सफाई पर Disciplinary Authority ने सजा का आदेश देते समय कोई विचार नहीं किया. यह तर्क भी दिया गया कि ‘शो कॉज नोटिस’ जारी करते समय ही जांच अधिकारी ने अपने निष्कर्ष दर्ज कर लिए थे और सजा की सिफारिश भी कर दी थी, जिस पर Disciplinary Authority पहले ही सहमत हो चुके थे. इसलिए सजा का यह आदेश दोषपूर्ण है.
अपनी बात के समर्थन में उन्होंने इस कोर्ट की डिवीन बेंच के 08.08.2019 के फैसले (जय मंगल राम बनाम यूपी राज्य और 4 अन्य; 2023 LawSuit (All) 1786; न्यूट्रल साइटेशन 2023:AHC:232617) का हवाला दिया. उन्होंने एक अन्य बेंच के 8.2.2019 के फैसले (रिट A नंबर 39792/2012, कृष्ण कुमार मिश्रा बनाम यूपी राज्य और अन्य) और 06.02.2018 के फैसले (रिट A नंबर 23660/2010, उमेश बाबू बनाम यूपी राज्य और अन्य) का भी सहारा लिया.
इसके उलट स्टैंडिंग काउंसिल ने कहा कि मौका दिए जाने के बावजूद शुरू में, पिटीशनर ने चार्जशीट पर अपना जवाब नहीं दिया, हालांकि वह Disciplinary Authority के सामने प्रोसिडिंग में पेश हुआ था फिर वह इन्क्वायरी प्रोसिडिंग से गायब हो गया. इसके बाद इन्क्वायरी एकतरफा पूरी कर ली गई और पिटीशनर पर लगाए गए आरोप साबित पाए गए.
Disciplinary Authority ने इन्क्वायरी ऑफिसर द्वारा रिकॉर्ड किए गए फाइंडिंग्स की पुष्टि की है, जिससे वह सहमत है. इसके बाद, सर्विस से बर्खास्तगी की सजा का प्रस्ताव देते हुए पिटीशनर को एक शो कॉज नोटिस जारी किया गया और पिटीशनर उस शो कॉज नोटिस का जवाब देने में फेल रहा, यहां तक कि पिटीशनर अपने रिक्वेस्ट पर दिए गए बढ़े हुए मौके के अंदर कोई एक्सप्लेनेशन फाइल करने में भी फेल रहा.
याचिकाकर्ता ने जिस शो कॉज नोटिस का जवाब दिया है, वह असल में 13.02.2011 के सजा के आदेश को पास करने से पहले कभी जमा नहीं किया गया था. बेंच ने तर्कों और तथ्यों को परखने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता Disciplinary Authority द्वारा सजा का आदेश पारित करने से पहले कारण बताओ नोटिस का जवाब जमा करने में विफल रहा.
इससे जांच अधिकारी और Disciplinary Authority द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ विवादित आदेश पारित करते समय अपनाई गई पूरी प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं है. बेंच ने यह भी कहा कि कारण बताओ नोटिस को देखने से यह स्पष्ट है कि Disciplinary Authority ने याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रस्तावित सजा पर कोई सहमति नहीं जताई है, बल्कि जांच अधिकारी द्वारा दर्ज निष्कर्षों पर अपनी सहमति जताई है.
यह Disciplinary Authority के लिए एक पूर्व-शर्त भी है कि वह इस बात से संतुष्ट हो कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज निष्कर्ष सही हैं और रिकॉर्ड में उपलब्ध तार्किक सबूतों पर आधारित हैं. जब तक अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा वह सहमति दर्ज नहीं की जाती, तब तक वह कारण बताओ नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में आगे नहीं बढ़ सकता.
इसलिए, अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा दर्ज की गई वह सहमति याचिकाकर्ता के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने का एक बुनियादी आधार थी. ऐसा कारण बताओ नोटिस जारी करते समय उस सजा का प्रस्ताव करना भी एक पूर्व-आवश्यकता है जो याचिकाकर्ता को दी जा सकती है.
याचिकाकर्ता को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस में कोई अवैधता नहीं थी. चूंकि याचिकाकर्ता उक्त कारण बताओ नोटिस का जवाब देने में विफल रहा, इसलिए Disciplinary Authority ने सही निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के पास जांच अधिकारी द्वारा दर्ज निष्कर्षों या उसे दी जाने वाली प्रस्तावित सजा के खिलाफ देने के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं है. इस स्थिति में, सजा के आदेश में कोई अवैधता नहीं है.
बेंच ने कहा कि जय मंगल राम के फैसले से साफ है कि कोर्ट ने 1991 के नियमों के नियम 14(1) के अपेंडिक्स I पर ध्यान नहीं दिया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि जांच अधिकारी सजा की सिफारिश कर सकता है. इस नजरिए से वह फसला इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होगा. याचिकाकर्ता के वकील ने जिन दूसरे फैसलों कृष्णा कुमार मिश्रा और उमेश बाबू का हवाला दिया है, वे भी इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होते हैं. इन आधारों पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है.
WRIT – A No. – 2081 of 2013; Sant Ram Gautam Constable Vs. State Of U.P.Thru Secy And Ors.