White-collar crime व्यापक और नुकसानदेह, उनसे निपटने के लिए सख्त और बिना किसी समझौते के सख्ती ही एकमात्र तरीका
पैसा और रुतबा’ से न्याय नहीं मिल सकता, 126 करोड़ के पीएमएलए मामले में बिल्डर की जमानत अर्जी खारिज

White-collar crime इतने “व्यापक और नुकसानदेह” हो गए हैं कि उनसे निपटने के लिए “सख्त और बिना किसी समझौते के सख्ती” ही एकमात्र तरीका है. ऐसे White-collar crime से “सख्ती” से निपटने पर यह धारणा खत्म हो जाएगी कि “पैसा और रुतबा होने पर नरम न्याय मिलता है”. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘उन्नति फॉर्च्यून होल्डिंग्स लिमिटेड’ के मुख्य प्रमोटर और बिल्डर अनिल मिठास की जमानत अर्जी खारिज कर दिया है. उन पर घर खरीदारों के 126.30 करोड़ के कथित हेरफेर को लेकर प्रीवेंशन आफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं.
जस्टिस कृष्ण पहल की कोर्ट ने अनिल मिठास को राहत देने से इनकार कर दिया. बेंच ने कहा कि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट से यह साबित हुआ है कि अलग-अलग आवंटियों से लिए गए 126.30 करोड़ का हेरफेर किया गया था. कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के वकील ट्रायल में देरी कर रहे थे. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि उसकी White-collar crime को लेकर टिप्पणियां जमानत अर्जी पर फैसला करने के लिए उसके सामने मौजूद तथ्यों तक ही सीमित हैं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा.
ऑडिट रिपोर्ट में 107 करोड़ के हेरफेर (White-collar crime) का पता चला
मामले के अनुसार एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने 23 दिसंबर, 2024 को लखनऊ में एक एनफोर्समेंट केस इंनफार्मेशन रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की. पुलिस स्टेशन प्रवर्तन निदेशालय, गाजियाबाद में भी एफआईआर दर्ज थी. इसमें आरोप लगाया गया कि मिठास ने ‘अरण्य प्रोजेक्ट’ में 1,468 यूनिट्स के लिए घर खरीदारों से 522.90 करोड़ जमा किए, लेकिन सिर्फ 35 घर खरीदारों को कब्जा सौंपा. खबरों के मुताबिक, एक ऑडिट रिपोर्ट में 107 करोड़ के हेरफेर (White-collar crime) का पता चला.
इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया कि उसकी जांच में 126.30 करोड़ को अपराध (White-collar crime) से हुई कमाई के तौर पर पहचाना गया. आरोप है कि इस रकम का हेरफेर इक्विटी निवेश, डिबेंचर, बॉन्ड, प्रेफरेंस शेयर और सहयोगी कंपनियों को दिए गए लोन और एडवांस जैसे कई वित्तीय तरीकों से किया गया. एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि 88 करोड़ एडवांस के तौर पर दिए गए और अकाउंट की किताबों में इसे ‘वसूली न हो पाने वाली रकम’ के तौर पर दिखाया गया.
अभियोजन पक्ष के मामले को चुनौती देते हुए मिठास के वकील ने कहा कि जिन रकमों के हेरफेर का आरोप लगाया गया, वे असल में प्रमोटर का योगदान, इंटर-कॉर्पोरेट लोन, संस्थागत उधार या सिक्योरिटी डिपॉजिट थीं. यह भी बताया गया कि कंपनी को घर खरीदारों से लगभग 500 करोड़ (White-collar crime) मिले थे, लेकिन उसने करीब 670 करोड़ खर्च किए. इस वजह से कंपनी गंभीर आर्थिक संकट में फंस गई.
आवेदक ने तर्क दिया कि इस आर्थिक स्थिति से पता चलता है कि मनी लॉन्ड्रिंग (White-collar crime) या गलत तरीके से लाभ कमाने जैसी कोई बात नहीं थी. ईडी का रुख जमानत अर्जी का विरोध करते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपों का समर्थन किया और कहा कि याचिकाकर्ता की अचल संपत्तियों को जब्त कर लिया गया है और अगर उसे रिहा किया जाता है तो उसके और अपराध करने की संभावना है. ईडी ने यह भी आरोप लगाया कि उसके भागने का जोखिम है और उसका आपराधिक इतिहास रहा है, जिसमें नौ मामले शामिल हैं.

जमानत अर्जी पर विचार करते हुए कोर्ट ने White-collar crime के बारे में विस्तार से टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा White-collar crime इतने व्यापक और महंगे हो गए हैं कि उनसे निपटने के लिए सख़्त और बिना किसी समझौते के प्रवर्तन की जरूरत है”. कोर्ट ने कहा कि कॉर्पोरेट धोखाधड़ी, गबन, इनसाइडर ट्रेडिंग और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी अक्सर पेंशन, बचत और आजीविका को ऐसे पैमाने पर बर्बाद कर देती है जो, कोर्ट के शब्दों में, “कई सड़क-छाप अपराधों से होने वाले नुकसान को भी छोटा साबित कर देता है”.
कोर्ट ने यह भी देखा कि White-collar crime के अपराधियों को अक्सर अपेक्षाकृत हल्की सजा मिलती है, या ऐसे जुर्माने लगते हैं, जिन्हें उनकी कंपनियां कारोबार की लागत के तौर पर आसानी से चुका सकती हैं, या फिर ऐसी ‘प्ली-डील्स’ (समझौते) होती हैं जिनसे “असली जवाबदेही” से बचा जा सके.
कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों (White-collar crime) से “सख्ती” से निपटने के लिए अनिवार्य जेल की सजा, कॉर्पोरेट सुरक्षा के बावजूद अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही, संपत्ति जब्ती और सख्त मुकदमे जैसे उपाय किए जाने चाहिए. इससे इस धारणा को दूर करने में मदद मिलेगी कि “दौलत और रुतबे से नरम न्याय खरीदा जा सकता है”.
कोर्ट ने कहा कि White-collar crime cases में “सख्त रुख” अपनाने से एक “साफ संदेश” जाएगा कि आर्थिक अपराधों से होने वाला नुकसान अक्सर “अदृश्य और फैला हुआ” होता है, इसलिए उन्हें हथियारों से किए गए अपराधों से कम गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी.
रिपोर्ट से पता चला कि याचिकाकर्ता कई तारीखों पर मौजूद था, जबकि उसके वकील कई मौकों पर अनुपस्थित रहे. रिपोर्ट में यह भी पता चला कि आरोप तय करने के लिए याचिकाकर्ता की ओर से बहस 30 जुलाई, 2026 को पूरी हो गई और मामले में संज्ञान लेने के आदेश के लिए 24 अगस्त, 2026 की तारीख तय की गई.
कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता पर विभिन्न आवंटियों से 126.30 करोड़ का गबन (White-collar crime) करने का आरोप है और जमानत के चरण में, कोर्ट ने पाया कि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट से यह राशि साबित हो गई. ट्रायल की कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता के वकील के आचरण के बारे में कोर्ट की इन बातों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस पहल ने माना कि यह जमानत के लिए उपयुक्त मामला नहीं है.
इसके बाद जमानत की अर्जी खारिज कर दी गई. फिर भी कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर कोई कानूनी अड़चन न हो तो ट्रायल कोर्ट में लंबित मामले का निपटारा तेजी से और कानून के अनुसार किया जाए, और किसी भी पक्ष को अनावश्यक रूप से सुनवाई टालने की अनुमति न दी जाए. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत की अर्जी पर फैसला करते समय की गई टिप्पणियों का ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा.