Investigating Officer केवल बयान दर्ज करने वाला क्लर्क नहीं, उसका कर्तव्य है कि वह चीजों को देखे और उनसे निष्कर्ष निकाले
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंजूर की महिला की जमानत, डीजीपी के लिए जारी किया निर्देश

उसे स्थानीय अपराधियों के काम करने के तरीकों का अध्ययन करना चाहिए ताकि उनके काम करने के तरीके को पहचाना जा सके, और उसे गवाहों और शिकायतकर्ताओं के शक को मानने में सावधानी बरतनी चाहिए जब वे तथ्यों से निकले स्पष्ट निष्कर्षों के खिलाफ हों. उसे याद रखना चाहिए कि उसका कर्तव्य सच का पता लगाना है, न कि सिर्फ सजा दिलवाना.
Investigating Officer को किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में तथ्यों के बारे में किसी राय पर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए. उसे बचाव पक्ष के लिए सबूत खोजने के लिए अपनी सीमा से बाहर जाने की जरूरत नहीं है, जब उसे यकीन हो कि आरोपी दोषी है, फिर भी उसे हमेशा आरोपी को अपने सामने बचाव के सबूत पेश करने का मौका देना चाहिए, और अगर ऐसे सबूत पेश किए जाएं तो उन पर ध्यान से विचार करना चाहिए. सेंधमारी की जांच इस विषय पर जारी विशेष आदेशों के अनुसार की जानी चाहिए.
यूपी पुलिस रेगुलेशन के पैरा 107 में Investigating Officer के लिए तय की गयी इस व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने बहू की संदिग्ध हालात में मौत होने पर दर्ज किये गये दहेज के लिए उत्पीड़न के मामले में जेल भेजी गयी सास श्रीमती चंद्रकांता को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है. फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने यूपी के डीजीपी को निर्देश दिया है कि वह Investigating Officer के लिए तय की गयी गाइड लाइन का पालन अनिवार्य रूप से कराना सुनिश्चित करें.
यह जमानत अर्जी केस क्राइम नंबर 17/2026 (थाना बसाउनी जनपद आगरा) में ट्रायल के दौरान आवेदक को जमानत पर रिहा करने की मांग के साथ दायर की गई थी. यह केस BNS की धाराओं 85, 80(2), 352, 115(2), 351(3) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दर्ज है. कोर्ट के आदेश के अनुपालन में केस के Investigating Officer असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस आगरा अनिल कुमार पेश हुए. उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने BNSS की धारा 180 के तहत शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करते समय ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की थी.

कोर्ट ने उन्हें DGP के सर्कुलर नंबर 24/2025 (दिनांक 21.07.2025) और सर्कुलर नंबर 39/2026 (दिनांक 04.08.2026) के बारे में बताया – जिनमें साफ कहा गया है कि BNSS की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान दर्ज करते समय ऑडियो-वीडियो भी तैयार किया जा सकता है – तो वे बिना शर्त माफी मांगने के अलावा कोई जवाब नहीं दे पाए.
केस के गुण-दोष पर आते हुए आवेदक के वकील ने कहा कि आवेदक मृतक महिला की सास है. जिसने घर के मामलों को लेकर हुए मामूली झगड़े के बाद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. FIR में शिकायतकर्ता की कहानी, BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज उसके बयान से अलग है.
आवेदक को सिर्फ मृतक की सास होने के कारण झूठे मामले में फंसाया गया है, जबकि उसके खिलाफ ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उसने मौत से पहले दहेज की मांग पूरी न होने पर मृतक को परेशान किया था. आवेदक को परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाकर झूठे मामले में फंसाया गया है.
कहा गया कि शादी के 7 साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होने पर ‘दहेज हत्या’ की धारणा लागू करने के लिए, यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत होने चाहिए कि मौत से ठीक पहले मृतक के साथ क्रूरता की गई थी, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है. आखिर में यह कहा गया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और एक महिला होने के नाते, वह BNSS की धारा 480 के तहत जमानत पर रिहा होने की हकदार है.
एजीए ने जमानत की अर्जी का विरोध किया लेकिन दिये गये तर्कों को गलत नहीं ठहरा सके. कोर्ट ने कपिल वधावन बनाम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (2025 SCC Online SC 3038) केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और माया तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में इस कोर्ट की गाइडलाइन को ध्यान में रखते हुए 2024 SCC Online All 6765 में जमानत देने के संबंध में दी गई जानकारी पर आवेदक जमानत पर रिहा होने का हकदार है.
कोर्ट ने जारी किये निर्देश जिनका पालन Investigating Officer के लिए करना अनिवार्य होगा:-
i. संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने के तुरंत बाद, Investigating Officer को घटनास्थल पर पहुंचना चाहिए और बिना किसी देरी के सबसे पहले सूचना देने वाले और अन्य गवाहों के बयान दर्ज करने चाहिए. बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जानी चाहिए (बेहतर होगा कि इसके लिए ‘ई-साक्ष्य’ ऐप का इस्तेमाल हो) और संबंधित अदालत द्वारा मांगे जाने पर इसे उपलब्ध कराया जाना चाहिए.
ii. Investigating Officer को न केवल शिकायतकर्ता, पीड़ित और उनसे जुड़े अन्य लोगों के बयान दर्ज करने चाहिए, बल्कि घटना के बारे में सच्चाई का पता लगाने के लिए स्वतंत्र गवाहों के बयान भी दर्ज करने की कोशिश करनी चाहिए.
iii. बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में, पीड़ित का बयान उसके घर पर या उसकी सुविधा के अनुसार महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए. ऐसे मामलों में, अपराध की जानकारी मिलने के 24 घंटे के भीतर पीड़ित की सहमति से उसे मेडिकल जांच के लिए रजिस्टर्ड डॉक्टर के पास भेजा जाना चाहिए.
iii. अगर अपराध के लिए 10 साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान है, तो पुलिस अधिकारी को गवाहों को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने उनके बयान दर्ज कराने के लिए पेश करना चाहिए. रेप या यौन उत्पीड़न के मामले में, अपराध की जानकारी पुलिस को मिलते ही पीड़िता को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करके उसका बयान दर्ज कराना चाहिए. ऐसे मामलों में बेवजह देरी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कभी-कभी देरी के कारण परिवार के सदस्य पीड़िता को गलत बातें सिखा सकते हैं.
iv. अगर यौन उत्पीड़न के मामले में अश्लील वीडियो बनाने का आरोप है, तो Investigating Officer को आरोपी का मोबाइल फोन जब्त करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर डेटा निकालने के लिए उसे FSL भेजना चाहिए. अगर पीड़िता का अश्लील वीडियो वायरल करने का आरोप है, तो ऐसे मामलों में साइबर सेल और FSL की मदद भी लेनी चाहिए.
v. अगर आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति की लोकेशन और किसी दूसरे व्यक्ति के साथ बातचीत अहम है, तो सच्चाई का पता लगाने के लिए उस व्यक्ति के मोबाइल फोन की CDR भी हासिल करनी चाहिए.
vi. अगर पीड़िता आरोपी को जानती नहीं है, बल्कि सिर्फ पहचानती है, तो ऐसे मामलों में यूपी पुलिस रेगुलेशन के पैरा 116 में बताई गई प्रक्रिया के अनुसार ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ जरूर करानी चाहिए.
vii. जब संदिग्ध व्यक्ति से बरामद की गई कथित चोरी की संपत्ति की पहचान जरूरी हो, तो ऐसी स्थिति में संपत्ति की पहचान यूपी पुलिस रेगुलेशन के पैरा 117 में बताई गई प्रक्रिया के अनुसार की जानी चाहिए, यानी संपत्ति की पहचान कराने से पहले बरामद संपत्ति को उसी तरह की दूसरी चीजो के साथ मिला दिया जाए.
कोर्ट ने यूपी के डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाने पर विचार करें, ताकि जांच ज्यादा पारदर्शी और निष्पक्ष हो सके और जमानत अर्जी व अन्य न्यायिक कार्यवाही पर फैसला करते समय कोर्ट को भी मदद मिले. कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को यह भी निर्देश दिया है कि वे सभी जांच अधिकारियों को इन दिशानिर्देशों के बारे में बताएं ताकि असली अपराधी को सजा मिले और किसी बेगुनाह व्यक्ति को गलत जांच के कारण परेशान न होना पड़े.