प्रतियोगी परीक्षा में 25% से ज्यादा Question गलत पाये जाने पर उन सवालों के मार्क्स को बाकी सवालों में बांट देना स्थायी समाधान नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी शिक्षा सेवा चयन आयोग की परीक्षा में 33 Question गलत मिलने पर मांगा स्पष्टीकरण, आयोग के सचिव व परीक्षा नियंत्रक तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रतियोगी परीक्षा में 25% से ज्यादा Question गलत पाये जाने पर उन Question के मार्क्स को बाकी सवालों में बांट देना स्थायी समाधान नहीं हो सकता है. यह खुलासा आदित्य कुमार सिंह व 17 अन्य मामले में सुनवाई के दौरान हुआ तो जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने इसे गंभीर मामला बताया और उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के सचिव व परीक्षा नियंत्रक को व्यक्तिगत हलफनामा मांगते हुए उन्हें कोर्ट में तलब कर लिया है.
प्रकरण की सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा में कुल 125 प्रश्नों में से 33 Question गलत पाए गए हैं. शुरुआत में 29 Question पाठ्यक्रम से बाहर पाए गए थे. अब विशेषज्ञों ने यह भी निष्कर्ष निकाला है कि बाकी 4 Question भी गलत थे. इस तरह कुल 33 Question गलत निकले, जो पूरे पेपर के 125 Question का 25 फीसदी से अधिक बैठता है.
आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता के शाही ने अदालत को बताया कि आयोग ने इन गलत Question के अंक बाकी प्रश्नों में बांट दिए हैं और इसके आधार पर एक नई संशोधित चयन सूची तैयार की गई है, जिसमें 42 और अभ्यर्थियों को चयन सूची में जगह मिली है. कोर्ट ने आयोग के इस समाधान से असंतोष जताया.
Question paper तैयार करने की पूरी प्रक्रिया की जांच करना जरूरी
अदालत ने कहा कि जब 25 फीसदी से ज्यादा Question ही गलत निकल रहे हैं, तो सिर्फ अंक बांट देना कोई स्थायी हल नहीं हो सकता. कोर्ट ने कहा कि Question paper तैयार करने की पूरी प्रक्रिया की जांच करना जरूरी है, भले ही यह आयोग की अपनी जिम्मेदारी हो कि वह अपनी प्रक्रिया पर आत्मनिरीक्षण करे.
कोर्ट ने आदेश दिया कि आयोग के सचिव और परीक्षा नियंत्रक कल यानी 5 अगस्त 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर हलफनामे पर पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करें कि Question कैसे तैयार किए जाते हैं और परीक्षा कैसे आयोजित की जाती है. मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 को दोपहर 2 बजे संबंधित याचिकाओं के साथ तय की गई है. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आरके ओझा और अधिवक्ता शिवेंदु ओझा, उमंग चंद्र गुप्त ने बहस की.
आपराधिक मामला लंबित होने मात्र से चरित्र प्रमाण पत्र देने से इन्कार नहीं किया जा सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से इन्कार नहीं किया जा सकता. जस्टिस प्रकाश पाड़िया और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323, 504 और 506 के तहत दर्ज मामले का लंबित होना अपने आप में चरित्र प्रमाण पत्र की मांग खारिज करने का आधार नहीं बन सकता.
जिला मजिस्ट्रेट जालौन, उरई ने आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण-पत्र जारी करने का आवेदन अस्वीकार कर दिया था. याचिकाकर्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए मांग की थी कि आदेश रद्द किया जाए और उसके चरित्र प्रमाण पत्र के आवेदन पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया जाए. कहा गया कि आपराधिक मामले के लंबित रहने के दौरान ही आवेदन खारिज कर दिया गया, जबकि बाद में आपराधिक अदालत ने उसे बरी कर दिया.
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए सिद्धांतों का भी हवाला दिया गया, जिसमें दोषसिद्धि, बरी होने और आपराधिक मामलों के लंबित रहने के प्रभाव को स्पष्ट किया गया. हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई नहीं थी और संबंधित कानूनी सिद्धांतों पर कोई विवाद नहीं है.
कोर्ट ने पाया कि केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र देने से इन्कार करना उचित नहीं था. इसके बाद हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को निर्धारित प्रारूप में चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया जाए. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर लिया.