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इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां के पास रहेगी child’s custody, दादी की अपील खारिज, ट्रायल कोर्ट का फैसला खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां के पास रहेगी child's custody, दादी की अपील खारिज, ट्रायल कोर्ट का फैसला खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने child’s custody से जुड़े एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में स्पष्ट किया है कि कानूनन मां child’s की प्राकृतिक संरक्षक (Natural Guardian) होती है, और कम उम्र के child’s का कल्याण उसकी मां के साथ ही सबसे सुरक्षित रहता है. हाईकोर्ट ने आगरा की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें child’s custody उसकी दादी को सौंप दी गई थी. इसके साथ ही, अदालत ने child’s custody तत्काल उसकी मां सुधा तोमर को सौंपने का निर्देश दिया है.

यह मामला फर्स्ट अपील संख्या 798/2026 से जुड़ा है. अपीलकर्ता सुधा तोमर का विवाह 4 दिसंबर 2017 को सौरभ तोमर के साथ हुआ था. 19 जनवरी 2020 को उनके बेटे श्रेयांश तोमर का जन्म हुआ. दुर्भाग्यवश, 22 सितंबर 2020 को बच्चे के पिता का निधन हो गया, उस समय child’s की उम्र महज आठ महीने थी. मां का आरोप है कि नवंबर 2020 में बीमा क्लेम के कागजात पर दस्तखत कराने के बहाने उनके हस्ताक्षर एक सादे कागज पर करवा लिए गए.

बाद में उसी कागज का दुरुपयोग कर एक कथित समझौता तैयार कर लिया गया, जिसके तहत child’s custody दादी शकुंतला देवी के पास रखने की बात कही गई. इसके बाद मां को उनके अपने ही child’s से मिलने से रोक दिया गया. इसके खिलाफ मां ने फैमिली कोर्ट में गुहार लगाई थी, जहां से निराशा मिलने के बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

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जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने child’s custody मामले की सुनवाई करते हुए कई अहम कानूनी बिंदुओं पर प्रकाश डाला:

मां का प्राथमिकता अधिकार: अदालत ने दोहराया कि कम उम्र के child’s की देखभाल के लिए प्रकृति ने मां को सबसे योग्य बनाया है. यदि मां किसी अजनबी से पुनर्विवाह नहीं करती है या उसका आचरण अनैतिक नहीं है, तो बच्चे की कस्टडी पर उसका नैसर्गिक और कानूनी अधिकार सर्वोपरि है.

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समझौते और वसीयत को नकारा: अदालत ने कहा कि जबरन या धोखे से लिए गए हस्ताक्षरों के आधार पर बने तथाकथित समझौतों या पिता द्वारा बनाई गई वसीयत के जरिए मां को उसके नैसर्गिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. बच्चे के कल्याण (Welfare of the child’s) के सामने ऐसे समझौतों का कोई कानूनी आधार नहीं है.

बच्चे की उम्र और समझ: सुनवाई के दौरान बच्चे द्वारा दादी के साथ रहने की इच्छा जताए जाने पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छह वर्ष की अल्पायु का child’s यह समझने में असमर्थ होता है कि उसके वास्तविक कल्याण के लिए क्या बेहतर है. पिछले पांच वर्षों से मां से दूर रहने के कारण बच्चे का ऐसा बयान देना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है.

अदालत ने यह भी माना कि बच्चा पिछले कई वर्षों से अपनी दादी के पास रह रहा है, इसलिए उनके साथ उसका एक भावनात्मक जुड़ाव बन गया है. इस महत्वपूर्ण फैसले के साथ ही उच्च न्यायालय ने पारिवारिक विवादों में मां के अधिकारों और बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देते हुए निचली अदालत के आदेश को पलट दिया है.

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अलगाव को संतुलित करने और child’s के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:

तत्काल कस्टडी: बच्चे की कस्टडी तुरंत उसकी मां सुधा तोमर को सौंपी जाएगी.

साप्ताहिक मुलाकात: अगले छह महीनों तक दादी हर हफ्ते अपनी सुविधा के अनुसार एक पूरा दिन (सुबह 8:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक) मां के घर जाकर बच्चे से मिल सकेंगी.

सप्ताहांत मुलाकात: इसके बाद अगले छह महीनों तक दादी महीने के दूसरे सप्ताहांत (शनिवार या रविवार) पर बच्चे से मिल सकती हैं.

एक साल के बाद यदि आवश्यकता महसूस हुई, तो दोनों पक्ष विजिटिंग अधिकारों में संशोधन के लिए अदालत में आवेदन कर सकते हैं.

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