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Lack of funds को आधार बनाकर बकाए का भुगतान नहीं रोका जा सकता, बकाया भुगतान का आदेश, 6% की दर से ब्याज भी देना होगा

हाई कोर्ट ने स्वीकार की पूर्व सैनिक सिक्योरिटी सर्विस की याचिका

Lack of funds को आधार बनाकर बकाए का भुगतान नहीं रोका जा सकता, बकाया भुगतान का आदेश, 6% की दर से ब्याज भी देना होगा

राज्य सरकार या उसके संस्थान केवल “lack of funds” या वित्तीय संकट का हवाला देकर किसी वेंडर या ठेकेदार के स्वीकृत संविदात्मक बकाए को रोक नहीं सकते हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि जब कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका हो और देनदारी स्वीकार कर ली गई हो, तो lack of funds बताकर भुगतान से इनकार करना मनमाना और कानूनन अस्वीकार्य है. यह फैसला जस्टिस  प्रकाश पाडिया और जस्टिस इन्द्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने मेसर्स पूर्व सैनिक सिक्योरिटी सर्विस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में सुनवाई करते हुए सुनाया है.

याचिकाकर्ता फर्म, ‘मेसर्स पूर्व सैनिक सिक्योरिटी सर्विस’, ने फिरोजाबाद दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड के अधीन विभिन्न इकाइयों में सुरक्षा सेवाएं प्रदान करने के लिए टेंडर प्राप्त किया था. यह अनुबंध 1 अक्टूबर 2018 से 31 मई 2021 तक प्रभावी रहा. फर्म द्वारा निर्धारित समयावधि तक अपनी सेवाएं सफलतापूर्वक प्रदान किए जाने के बावजूद, उन्हें कुल 18,59,197.02 रुपये के संविदात्मक बकाए funds और 20,000 रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में सुरक्षा funds का भुगतान नहीं किया गया.

प्रादेशिक कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद जब lack of funds बताकर भुगतान नहीं किया गया

बार-बार पत्राचार करने और प्रादेशिक कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद जब lack of funds बताकर भुगतान नहीं किया गया, तो फर्म ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की.

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सुनवाई के दौरान प्रतिवादी सहकारी संघ ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता का पैसा बकाया है, लेकिन उन्होंने अपने बचाव में केवल “वित्तीय कठिनाइयों और lack of funds” का तर्क दिया. अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर प्रकाश डाला.

कोर्ट ने ‘गोदरेज सारा ली लिमिटेड’ और ‘एबीएल इंटरनेशनल’ मामलों के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब संविदात्मक बकाया पूरी तरह से स्वीकार्य हो और उसमें तथ्यों के विवाद की जटिल गुंजाइश न हो, तो अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पूरी तरह से पोषणीय और विचारणीय है.

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक लोक कल्याणकारी राज्य या उसके संस्थान अपने वैधानिक और संविदात्मक दायित्वों से वित्तीय तंगी या lack of funds का बहाना बनाकर मुंह नहीं मोड़ सकते. नागरिकों को उनके श्रम और सेवाओं का प्रतिफल न देना सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और आजीविका के अधिकार) का हनन है.

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कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यदि कोई संस्था किसी व्यक्ति या फर्म की सेवाओं का उपयोग करती है, और उसके बदले में lack of funds का बहाना बनाकर भुगतान नहीं करती, तो यह अनुचित संवर्धन के समान है. राज्य के उपक्रमों को नागरिकों की कीमत पर अनुचित लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती.

कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए फिरोजाबाद दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड को सख्त निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता के कुल बकाया मूलधन पर बिना किसी देरी के, अधिकतम तीन महीने की अवधि के भीतर पूरा भुगतान किया जाए. भुगतान होने तक संपूर्ण देय राशि पर 6% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज भी दे होगा, जिसे प्रतिवादियों द्वारा वहन किया जाएगा. फैसले की प्रति अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, आगरा के माध्यम से संबंधित सहकारी संघ को भेजी जाएगी.

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‘अनुचित लाभ’ का सिद्धांत इस निष्पक्ष विचार पर आधारित है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई लाभ अपने पास रखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जिसे मामले की परिस्थितियों में अपने पास रखना उसके लिए अनुचित या अन्यायपूर्ण हो. ‘रेस्टिट्यूशन’ या नुकसान की भरपाई का उपाय, कॉन्ट्रैक्ट या टॉर्टसे जुड़े उपायों से अलग है और यह ‘क्वासी-कॉन्ट्रैक्चुअल’ दायित्वों की व्यापक श्रेणी में आता है.

इसलिए, जब किसी व्यक्ति को किसी दूसरे के खर्च पर कोई आर्थिक या अन्य लाभ मिला हो, तो कोर्ट परिस्थितियों के आधार पर राहत का तरीका इस तरह तय कर सकता है जिससे अनुचित लाभ को रोका जा सके और दोनों पक्षों को, जहाँ तक संभव हो, उस स्थिति में वापस लाया जा सके जिसकी न्याय मांग करता है.
दो जजों की बेंच ने किया कमेंट

WRIT – C No. – 28222 of 2022 M/s Purv Sainik Security Service V/s State of U.P. and 4 others

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