+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

12वीं के Fake certificate पर चयनित होने वाली शिक्षिका की चार्जशीट रद्द करने की मांग में दाखिल याचिका हाई कोर्ट ने खारिज की

12वीं के Fake certificate पर चयनित होने वाली शिक्षिका की चार्जशीट रद्द करने की मांग में दाखिल याचिका हाई कोर्ट ने खारिज की
Tej-Pratap-Tiwari J.

12वी की परीक्षा के Fake certificate इस्तेमाल करके बेसिक शिक्षा विभाग में नौकरी पाने वाली महिला अध्यापिका के खिलाफ चल रही केस कार्रवाई में कोई राहत देने से इंकार कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि Fake certificate पर उसे नौकरी मिली या नहीं, यह प्रापर ट्रायल से ही पता चल सकता है, इसलिए केस की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है.

यह रिट याचिका रायबरेली की एक प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका श्रीमती सुमन शुक्ला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में दाखिल की थी. जस्टिस तेज प्रताप तिवारी ने 17 जुलाई 2026 को रिजर्व किया गया फैसला सुनाते हुए यह आदेश दिया है.

अभियोजन के अनुसार, सुमन की नियुक्ति 15 मार्च 1995 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, रायबरेली के आदेश से सहायक अध्यापिका के रूप में हुई थी. उन्होंने 20 मार्च 1995 को कार्यभार ग्रहण किया. वर्तमान में वे चौहानिया गांव (विकास क्षेत्र हरचंदपुर) के प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका हैं.. आरोप है कि उन्होंने वर्ष 1982 की इंटरमीडिएट परीक्षा में फेल होने के बावजूद कूटरचित अंकपत्र और Fake certificate के सहारे स्वयं को योग्य दर्शाया.

इसे भी पढ़ें… नीट-यूजी की आंसर की पर अकेले उम्मीदवार की आपत्ति से विशेषज्ञ राय जरूरी नहीं : इलाहाबाद हाई कोर्ट

यह भी आरोप है कि बीटीसी सत्र 1988-89 की चयन सूची में नाम न होने पर भी उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से प्रशिक्षण प्राप्त किया. शिकायतकर्ता के आवेदन पर Fake certificate इस्तेमाल करके नौकरी पाने पर धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत थाना हरचंदपुर में मुकदमा दर्ज हुआ. जांच के बाद पुलिस ने 26 जून 2015 को आरोप पत्र दाखिल किया. एसीजेएम-प्रथम, रायबरेली ने 9 अप्रैल 2015 के आदेश से संज्ञान लेकर उन्हें तलब किया.

Fake certificate के सहारे स्वयं को योग्य दर्शाने का कोई साक्ष्य नहीं

सुमन के अधिवक्ता ने कहा कि वे निर्दोष हैं और उनके विरुद्ध और Fake certificate के सहारे स्वयं को योग्य दर्शाने का कोई साक्ष्य नहीं है. बताया गया कि जांच के दौरान बेसिक शिक्षा अधिकारी के पत्र में कहा गया था कि माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव और परीक्षा विभाग के रजिस्ट्रार ने अंकपत्र व दो वर्षीय बीटीसी प्रशिक्षण के अभिलेखों को सत्यापित कर असली पाया है.

दलील यह भी दी गई कि 1982 में उन्होंने श्री गांधी विद्यालय इंटर कॉलेज से परीक्षा दी थी, इतिहास विषय में अनुत्तीर्ण होने पर पूरक परीक्षा दी और उत्तीर्ण हुईं. पूरक परीक्षा का केंद्र राजकीय बालिका इंटर कॉलेज था, इसलिए अंकपत्र पर उसका नाम है, जिसे Fake certificate नहीं माना जा सकता.

इसे भी पढ़ें… सूचना के अभाव में कार्रवाई न करने को लापरवाही नहीं कहा जा सकता, केवल इसके आधार पर किसी पुलिस अधिकारी को कोई दण्ड नहीं दिया जा सकता

सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि जांच में certificate में गंभीर विसंगतियां मिलीं. संबंधित अभिलेखों में उस क्रम संख्या का प्रामाणिक रिकॉर्ड शुरू में नहीं मिला, जबकि उसी परीक्षा में बैठे अन्य छात्रों का रिकॉर्ड उपलब्ध था. क्रम संख्या, संस्था के विवरण और certificate तैयार करने के तरीके में भी अंतर पाया गया. यह भी बताया गया कि जिस पूर्व प्राचार्य जेपी मिश्रा के पत्र पर आवेदिका ने भरोसा किया, उन्होंने लिखित रूप में कहा कि पत्र में कुछ शब्द बाद में जोड़े गए थे. 27 अप्रैल 2013 के सत्यापन पत्र का डिस्पैच रजिस्टर में इंद्राज भी नहीं मिला.

हाईकोर्ट ने कहा कि विवाद मूलतः certificate की वास्तविकता और कथित जालसाजी से जुड़ा है. ऐसे विवादित तथ्यों का निर्धारण दस्तावेजों और साक्ष्यों के सम्यक मूल्यांकन से ही संभव है, जो इस चरण पर नहीं किया जा सकता. प्रथम दृष्टया आवेदिका के विरुद्ध पर्याप्त सामग्री मौजूद है. कोर्ट ने कहा कि धारा 482 के तहत अदालत को ‘मिनी ट्रायल’ नहीं करना होता. यह शक्ति संयमपूर्वक और केवल दुर्लभ मामलों में प्रयोग की जानी चाहिए, खासकर तब जब गहन जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल हो चुका हो.

इसे भी पढ़ें… अस्थायी सेवा को पेंशन-अर्हता की गणना में गिना जाना चाहिए, भले ही पेंशन की वास्तविक राशि केवल नियमित सेवा के आधार पर तय हो

कोर्ट ने कहा कि Fake certificate के आरोपों को साबित करना अभियोजन का काम है, जो ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होगा. इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है और आवेदन खारिज किया जाता है. अब मामले की सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी.

इसे भी पढ़ें…भर्ती के समय Recruit के मानसिक विकारों का पता नहीं लगाया जा सकता, बाद में पता चलने पर दिव्यांगता पेंशन का हक नहीं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *