Appellate Decision के खिलाफ सजा निलंबित करना न्यायिक अनुशासनहीनता: इलाहाबाद हाई कोर्ट
कुशीनगर की इंचार्ज न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्रशिक्षण के लिए न्यायिक प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान से संबद्ध करने का आदेश दिया

अधीनस्थ अदालत ने 25 सितंबर 2025 को नागा को दोषी ठहराया था. इसके खिलाफ सत्र अदालत में आपराधिक अपील दाखिल की गई. Appellate Court ने 18 मार्च 2026 को Decision में यह दोषसिद्धि बरकरार रखी और अपील खारिज कर दी. इसी दिन इंचार्ज न्यायिक मजिस्ट्रेट, कुशीनगर ने दोषी की सजा 16 अप्रैल 2026 तक निलंबित कर दी, ताकि वह आगे अपील दायर कर सके. उस आदेश में खुद Appellate Decision खारिज होने का जिक्र था.
Appellate Court ने 18 मार्च 2026 को Decision में दोषसिद्धि बरकरार रखी और अपील खारिज कर दी
जेल में बंद दोषी की ओर से अधिवक्ता कुंजेश कुमार दुबे ने मामला कोर्ट के संज्ञान में लाया. 17 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया पाया कि मजिस्ट्रेट का Appellate Decision के खिलाफ सजा निलंबित करना अधिकार क्षेत्र से बाहर था, क्योंकि अपील पहले ही खारिज हो चुकी थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 430(3) के तहत Appellate Decision की सजा निलंबित करने का अधिकार तब ट्रायल कोर्ट के पास होता है, जब वह संतुष्ट हो कि दोषी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करना चाहता है. इसके बाद मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा गया.
27 जुलाई 2026 को दाखिल स्पष्टीकरण में न्यायिक अधिकारी ने स्वीकार किया कि सजा निलंबन का आदेश अपीलीय अदालत (Appellate Decision) के फैसले की अवहेलना में पारित हुआ. उन्होंने कहा कि संबंधित लिपिक ने मामले की फाइलें और दस्तावेज उनके सामने नहीं रखे, जिससे सहायता के अभाव में आदेश गलती से पारित हो गया.
हाई कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्टीकरण दरअसल अधिकारी की “कानून की बुनियादी अवधारणा की समझ के अभाव” को उजागर करता है. चूंकि अधिकारी अपने करियर के शुरुआती चरण में हैं, इसलिए फिलहाल उन्हें भविष्य में सावधान रहने की चेतावनी दी गई. कोर्ट ने कहा कि उनके कौशल को बेहतर बनाना भी जरूरी है.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारी को एक सप्ताह के लिए जेटीआरआई, लखनऊ से संबद्ध किया जाए, जहां वे न्यायिक पदानुक्रम, अनुशासन और कानून के प्रयोग के बुनियादी मानदंडों को समझेंगी. रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश का तत्काल पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है.
PIL दायर कर जज के विरूद्ध की अपमानजक टिप्पणी, अवमानना कार्यवाही का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनहित याचिका में याची ब्रह्मदेव उपाध्याय द्वारा एक न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध इस्तेमाल की गई भाषा को गंभीर मानते हुए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही करने का निर्देश दिया है. चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया.
याची ने रजिस्ट्रार जनरल, हाईकोर्ट इलाहाबाद और दो अन्य को प्रतिवादी बनाते हुए याचिका दायर की थी. इसमें उन्होंने 4 अप्रैल 2026 के उस आदेश (Decision) को रद्द करने की मांग की थी, जिसमें एक न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध उनकी शिकायत पर वरिष्ठ रजिस्ट्रार ने उन्हें सूचित किया था कि वे चाहें तो विधि के अनुसार उचित कानूनी उपाय अपना सकते हैं.
शिकायत कमलावती नाम की महिला के खिलाफ याची द्वारा दायर एक आपराधिक मामले से जुड़ी थी, जिसका फैसला (Decision) 10 जुलाई 2025 को हुआ था. पीठ ने कहा कि याचिका में न्यायिक अधिकारी के संबंध में जिस भाषा का प्रयोग किया गया और जिस तरह आरोप लगाए गए, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि इस्तेमाल की गई भाषा “मूलतः आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती है.” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस मामले में याची स्वयं पक्षकार रहे हों, उसमें जनहित याचिका के रूप में दायर याचिका पोषणीय नहीं है. अवमानना याचिका व जनहित याचिका की सुनवाई अन्य पीठ करेगी.