Food safety laboratories में ‘जूनियर एनालिस्ट’ और ‘फूड एनालिस्ट’ के पद अलग-अलग, राज्य सरकार के नियम वैध, 10 प्रतियोगियों की याचिकाएं इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग (Food Safety and Drug Administration Department) में नियुक्तियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में स्पष्ट किया है कि खाद्य सुरक्षा प्रयोगशालाओं (Food safety laboratories) में संवर्ग (cadre) के तहत आने वाला ‘जूनियर एनालिस्ट (खाद्य)’ का पद केंद्रीय कानून के तहत आने वाले ‘फूड एनालिस्ट’ पद से पूरी तरह भिन्न और अलग है. कोर्ट ने अपने इस निर्णय के साथ उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग एनालिस्ट (खाद्य एवं औषधि प्रयोगशाला) सेवा नियम, 2017 (प्रथम संशोधन नियम, 2020 द्वारा संशोधित) के नियम 8(2) को पूरी तरह वैध करार देते हुए खारिज करने से इनकार कर दिया है.
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने पंकज कुमार व अन्य की ओर से दायर रिट याचिका (रिट-ए संख्या- 3307/2026) पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. कोर्ट के इस निर्णय से राज्य में विज्ञापनों और भर्तियों का रास्ता साफ हो गया है, साथ ही केंद्र और राज्य के कानूनों के बीच क्षेत्राधिकार की सीमाएं भी स्पष्ट हो गई हैं.
Food safety laboratories में ‘जूनियर एनालिस्ट’ और ‘फूड एनालिस्ट’ के पद मामले की पृष्ठभूमि और दलीलें
यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) द्वारा जारी विज्ञापन संख्या-4/2024 से जुड़ा है, जिसके तहत ‘जूनियर एनालिस्ट (Food safety)’ के 417 पदों पर सीधी भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए थे. विज्ञापन के पैरा-6 और संशोधित सेवा नियमावली, 2020 के तहत इसके लिए रसायन विज्ञान, जैव रसायन, सूक्ष्म जीव विज्ञान, डेयरी केमिस्ट्री, फूड टेक्नोलॉजी और पोषण में मास्टर डिग्री या पशु चिकित्सा विज्ञान की डिग्री को अनिवार्य शैक्षिक योग्यता बनाया गया था.
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील:
केंद्रीय नियमों से भिन्नता: खाद्य सुरक्षा और मानक नियम, 2011 (FSS Rules, 2011) के नियम 2.1.4 के तहत ‘एनालिस्ट’ (Food safety) के लिए जो योग्यताएं तय की गई हैं, उनमें फूड टेक्नोलॉजी, डेयरी टेक्नोलॉजी, ऑयल टेक्नोलॉजी और बायोटेक्नोलॉजी आदि में स्नातक (B.Tech) डिग्रीधारक भी पात्र हैं. राज्य सरकार केंद्रीय नियमों से इतर जाकर केवल मास्टर डिग्री धारकों को पात्रता दे रही है और बी.टेक धारकों को बाहर कर रही है, जो कि गलत है.
संविधान के अनुच्छेद 254 का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि खाद्य सुरक्षा (Food safety) और मानक अधिनियम, 2006 (FSS Act, 2006) एक केंद्रीय कानून है, इसलिए राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियम इसके विपरीत नहीं हो सकते और यह अनुच्छेद 254 के तहत असंवैधानिक हैं.
राज्य सरकार का पक्ष और कानूनी तर्क
राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी कौंसिल ने इसका विरोध किया. उन्होंने दलील दी कि:
• जूनियर एनालिस्ट (Food safety) और सीनियर एनालिस्ट (फूड) के पद राज्य की पुरानी प्रयोगशाला सेवा नियमावली, 2006 से चले आ रहे हैं, जो अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए थे.
• ‘जूनियर एनालिस्ट’ (Food safety) सीधे तौर पर अधिनियम, 2006 की धारा 45 के अंतर्गत आने वाला ‘फूड एनालिस्ट’ नहीं है, बल्कि यह राज्य कैडर का एक अलग प्रारंभिक पद है.
• केवल वही जूनियर एनालिस्ट खाद्य विश्लेषण (Food safety) की अंतिम रिपोर्ट तैयार करने या फूड एनालिस्ट के रूप में कार्य करने के लिए अधिकृत होते हैं, जो भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा गठित बोर्ड की परीक्षा पास कर प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेते हैं.
अदालत द्वारा उपयोग किए गए प्रमुख Case References और कानूनी सिद्धांत
इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलों और संविधान के प्रावधानों को परखने के लिए अदालत ने कई शीर्ष अदालतों के ऐतिहासिक फैसलों और दृष्टांतों का गहन विश्लेषण किया:
1. चंद्र शेखर सिंह एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य (2025) में सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले का हवाला देते हुए राज्य की शक्तियों के दायरे पर बात की गई. अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां केंद्र कानून के तहत विशिष्ट मानक तय करता है, वहीं राज्य लोक सेवा के ढांचे, कैडर नियमों और भर्ती की योग्यताओं को तय करने के लिए अपने संवैधानिक दायरे (अनुच्छेद 309) के भीतर स्वतंत्र हैं, जब तक कि कोई प्रत्यक्ष टकराव न हो.
2. आशीष त्यागी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2026/2021) में याचिकाकर्ताओं ने ड्रग इंस्पेक्टर (Food safety) की नियुक्तियों से जुड़े ‘आशीष त्यागी’ मामले (विशेष अपील संख्या-163/2021) का हवाला दिया था. किंतु इस मामले में अंतर को स्पष्ट करते हुए न्यायालय ने बताया कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के विपरीत वहां स्थिति अलग थी, जबकि यहां जूनियर एनालिस्ट और फूड एनालिस्ट के कार्यक्षेत्र और विधिक पहचान बिल्कुल अलग हैं.
3. वेस्ट यूपी शुगर एसोसिएशन एंड अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020) में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का उपयोग ‘Repugnancy’ (विरोधभास) के सिद्धांत को समझाने के लिए किया गया. उच्चतम न्यायालय ने माना था कि केंद्र और राज्य के कानून तभी टकराते हैं जब दोनों का एक ही क्षेत्र में पालन करना असंभव हो जाए. यदि दोनों कानून सामंजस्यपूर्ण तरीके से (Harmonious construction) साथ चल सकते हैं, तो राज्य के नियम अमान्य नहीं ठहराए जा सकते.
4. मो. फिरोज मंसूरी बनाम बिहार राज्य (2026) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि लोक सेवा के क्षेत्र में कैडर नियम राज्य की नीतिगत पसंद को दर्शाते हैं. जब तक राज्य का कोई नियम किसी न्यूनतम तकनीकी योग्यता के विरुद्ध न हो और दोनों कानून अलग-अलग डोमेन (जैसे पेशेवर नियमन बनाम सार्वजनिक रोजगार) में काम कर रहे हों, तब तक कोई टकराव या विरोध उत्पन्न नहीं होता.
5. बी. सुधर्मा बनाम केरल राज्य (2021) में केरल उच्च न्यायालय के इस निर्णय को उद्धृत करते हुए न्यायालय ने माना कि खाद्य सुरक्षा कमिश्नरेट के भीतर राज्य सरकार द्वारा अपने प्रशासनिक और प्रयोगशाला कार्यों के सुचारू संचालन के लिए पद सृजित करने की पूरी क्षमता और अधिकारिता है.
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अदालत ने अपने विस्तृत निर्णय में निम्नलिखित मुख्य बिंदु स्पष्ट किए:

1. पद की भिन्नता: जूनियर एनालिस्ट (Food safety) और फूड एनालिस्ट दोनों कानूनी रूप से एक ही पद नहीं हैं. जूनियर एनालिस्ट राज्य कैडर का पद है, जबकि फूड एनालिस्ट FSS Act की धारा 45 के अंतर्गत एक विशिष्ट सांविधिक पद है.
2. सामंजस्यपूर्ण संचालन (Harmonious Construction): केंद्रीय नियम (FSS Rules, 2011) के नियम 2.1.4 के तहत न्यूनतम योग्यताओं का जो दायरा दिया गया है, राज्य सरकार ने मास्टर डिग्री के प्रावधान को उसी न्यूनतम पात्रता के अनुरूप अपने यहाँ अपनाया है. इसलिए इसे केंद्रीय कानून के विरुद्ध या ‘Repugnant’ नहीं कहा जा सकता.
3. रोजगार नीति में न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित: अदालत ने दोहराया कि किसी पद के लिए कौन सी शैक्षिक योग्यता सबसे उपयुक्त है, इसका निर्धारण करना नियोक्ता (राज्य सरकार) का नीतिगत अधिकार है. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के तहत अदालतें खुद से नई डिग्रियों या तकनीकी योग्यताओं को नियमों में नहीं जोड़ सकतीं.
इन सभी कानूनी तर्कों, मामलों के संदर्भों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की मांग को खारिज कर दिया और उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा (Food safety) विभाग के नियमों को पूरी तरह संवैधानिक व वैध करार दिया.