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आदेश में था नियमानुसार ब्याज देय होगा, टाइप कापी में Foul play कर लिखा पहले वर्ष 9 % और उसके बाद 15% वार्षिक ब्याज देय होगा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना ही फैसला पलटा, भुगतान की गई राशि की वसूली का आदेश, दो वकीलों के लाइसेंस निरस्त करने की कार्रवाई का निर्देश

आदेश में था नियमानुसार ब्याज देय होगा, टाइप कापी में Foul play कर लिखा पहले वर्ष 9 % और उसके बाद 15% वार्षिक ब्याज देय होगा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धोखाधड़ी (Foul play) करके मुआवजे की बढ़ी हुई राशि का भुगतान कराने के लिए कोर्ट से आदेश प्राप्त लेने को गंभीर मामला माना है और झूठी सूचना देने वाले दो अधिवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि जिन लोगों को कोर्ट के आदेश के बाद अधिक मुआवजे का भुगतान ​कर दिया गया है उनसे इस राशि की वसूली राजस्व प्रक्रिया से की जाय.

कोर्ट ने Foul play के जिम्मेदार दोनों वकीलों का लाइसेंस रद करने की कार्रवाई शुरू करने का भी आदेश दिया है. हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच बरेली विकास प्राधिकरण की एक पुनर्विलोकन अर्जी की सुनवाई के दौरान विपक्षी वकीलों द्वारा अदालत के साथ धोखाधड़ी (Foul play) करने का खुलासा हुआ. जिस पर कोर्ट ने कड़ा रूख अपनाते हुए वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.

यह मामला बरेली के दोहनिया गांव की भूमि (खसरा नं. 135) के अधिग्रहण से जुड़ा है, जो बरेली विकास प्राधिकरण ने  विकास कार्य के लिए अधिग्रहीत की थी. भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत शुरू हुई प्रक्रिया का अवार्ड 26 अप्रैल 2016 को नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत घोषित हुआ. रामपाल व अन्य विपक्षियों ने  भुगतान में देरी के लिए ब्याज के लिए याचिका दाखिल की थी.

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इसके साथ संलग्न किये गये दस्तावेज में धोखाधड़ी (Foul play) करके चेंज कर दिया. मूल अवार्ड में केवल “नियमानुसार ब्याज देय होगा” लिखा गया था, जबकि याचिका के साथ संलग्न टाइप की गई प्रति में जानबूझकर जोड़ दिया गया (Foul play) कि पहले वर्ष 9 फीसदी और उसके बाद 15 फीसदी वार्षिक ब्याज देय होगा. इसी छेड़छाड़ (Foul play) की गई प्रति पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने 24 मई 2024 को प्राधिकरण को इस ब्याज दर से भुगतान करने का आदेश दे दिया.

कोर्ट का आदेश होने के बाद प्राधिकरण ने अपने आदेश को परखा तो पता चला कि उसमें हेराफेरी (Foul play) की गयी है. मूल आदेश और रिट याचिका के साथ दाखिल की गयी उसी आदेश की टाइप कापी में बड़ा अंतर है. इसके बाद प्राधिकरण की तरफ से आदेश के पुनर्विलोकन के लिए अर्जी दाखिल की. यह अर्जी कोर्ट में विचाराधीन थी. इस पर कोई फैसला सुनाया नहीं गया था.

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इसी बीच मुआवजे की बढ़ी हुई राशि का भुगतान करने के लिए कोर्ट की तरफ से निर्धारित समय बीत गया. इस दौरान तक राशि का भुगतान न होने पर याचिकाकर्ताओं की ओर से अवमानना याचिका दाखिल कर दी गयी. चूंकि पुनर्विलोकन याचिका में कोई अंतरिम राहत प्रदान नहीं की गयी थी. इसी के चलते प्राधिकरण पर दबाव बना और उसने विवादित दर पर याचिकाकर्ताओं को बकाया राशि का भुगतान कर दिया.

Foul play का मामला सामने रखा गया तो अधिवक्ताओं ने इसे टाइपिंग मिस्टेक बताते हुए माफी मांगी

पुनर्विलोकन याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश में हेराफेरी (Foul play) का मामला सामने रखा गया तो अधिवक्ताओं ने इसे टाइपिंग मिस्टेक बताते हुए माफी मांगी. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने वकीलों के द्वारा मांगी गई माफी को ठुकराते हुए कहा कि यह टाइपिंग की गलती नहीं बल्कि जानबूझकर की गई बेईमानी थी.

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कोर्ट ने कहा कि सच्चा पश्चाताप अलग चीज है और पकड़े जाने के डर से मांगी गई माफी अलग. यह माफी केवल इसलिए आई क्योंकि झूठ पकड़ा गया. अदालत ने वकालत के पेशे की गरिमा पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि आम नागरिक मजबूरी में वकीलों के पास जाता है और उन पर पूरा भरोसा करता है ऐसे में यदि दोषियों को हल्के में छोड़ा गया तो बार में गलत संदेश जाएगा.

नए फैसले में कोर्ट ने 24 मई 2024 का अपना आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि वह धोखाधड़ी (Foul play) से हासिल किया गया था. प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि जिन लाभार्थियों को गलत दर पर भुगतान हुआ, उनसे यह राशि राजस्व बकाया के रूप में वसूल करने की कार्रवाई तुरंत शुरू करे. रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया कि वे धारा 340 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जांच कर संबंधित मजिस्ट्रेट कोर्ट में भारतीय दंड संहिता क धारा 199 (झूठा साक्ष्य गढ़ना, धारा 193 के तहत दंडनीय) के तहत शिकायत दर्ज कराएं.

कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को यह भी निर्देश दिया गया कि वे बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश स्टेट बार काउंसिल में इन वकीलों (शिव कांत मिश्रा व कृष्ण कांत मिश्रा) का लाइसेंस रद्द करने के लिए शिकायत भेजें. जिन अन्य मामलों में इस रद्द किए गए आदेश का हवाला दिया गया है, वहां भी यह निर्णय संबंधित कोर्ट के समक्ष रखा जाएगा. 66 दिन की देरी से दाखिल समीक्षा याचिका को भी कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए स्वीकार कर लिया.

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