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किसी Legal Authority को कोई काम किसी खास तरीके से करना होता है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए या बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हमीरपुर के डीएम का मछली पकड़ने का पट्टा आवंटित न किये जाने के बाद भी बोली की रकम रोकने का आदेश रद किया

किसी Legal Authority को कोई काम किसी खास तरीके से करना होता है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए या बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए

यह अच्छी तरह से तय है कि जब किसी Legal Authority को कोई काम किसी खास तरीके से करना होता है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए या बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए. राज्य और अन्य Authority, जब उस एक्ट के तहत काम करती हैं, तो वे केवल कानून बनाने वाली होती हैं. उन्हें उस कानून के दायरे में ही काम करना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच द्वारा ‘भावनगर यूनिवर्सिटी बनाम पालीताना शुगर मिल प्राइवेट लिमिटेड और अन्य’ मामले में दिये गये इस फैसले पर अमल करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट से मंजूरी नहीं मिलने के कारण लीज के अधिकार पक्के नहीं हुए थे, इसलिए प्रतिवादियों को बोली की रकम रोकने का अधिकार नहीं है.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इन्द्रजीत शुक्ला की बेंच ने हमीरपुर के सब-डिविजनल ऑफिसर (Authority) द्वारा 15 दिसंबर, 2025 को जारी किया गया आदेश रद्द कर दिया है. रिट याचिका मंजूर करते हुए कोर्ट ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता को बोली की रकम तुरंत वापस की जाय.

याचिका हमीरपुर के सब-डिविजनल ऑफिसर (Authority) द्वारा पारित आदेश से असंतुष्ट होकर मत्स्य जीवी सहकारी समिति लि. की तरफ से दाखिल की गयी थी

कोर्ट ने साथ में यह भी जोड़ा कि अगर याचिकाकर्ता ने बिना किसी कानूनी अधिकार के मछली पकड़ने का काम किया है और इस बारे में ठोस सबूत हैं तो राज्य (Authority) के पास हमेशा कानून में बताए गए उचित उपाय करने की आजादी है. यह रिट याचिका हमीरपुर के सब-डिविजनल ऑफिसर (Authority) द्वारा पारित आदेश से असंतुष्ट होकर मत्स्य जीवी सहकारी समिति लिमिटेड मेरापुर, हमीरपुर की तरफ से दाखिल की गयी थी.

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याचिका में बोली की रकम वापस न किए जाने को चुनौती दी गयी थी. इस रिट याचिका से जुड़े निर्विवाद तथ्य यह थे कि याचिकाकर्ता की सोसाइटी ने नीलामी प्रक्रिया में हिस्सा लिया था. यह नीलामी हमीरपुर जिले की सदर तहसील में बहने वाली यमुना नदी के सेक्टर 9 में मछली पकड़ने के अधिकारों के लिए थी. याचिकाकर्ता सबसे ऊंची बोली लगाने वाला बना और उसने बोली की रकम जमा कर दी, लेकिन लीज के अधिकार एक औपचारिक लीज एग्रीमेंट का रूप नहीं ले सके.

10 जनवरी, 2019 के सरकारी आदेश के पैरा 8 के अनुसार, अगर मछली पकड़ने के अधिकारों का आवंटन तय नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार होता है, तो जिलाधिकारी (Authority) को अपनी मंजूरी देनी होती है. यमुना नदी के सेक्टर 9 में मछली पकड़ने के अधिकारों के लिए प्रकाशित विज्ञापन को चित्रकूट-बांदा डिवीजन के कमिश्नर (Authority) के समक्ष यूपी रेवेन्यू कोड की धारा 207 के तहत अपील संख्या 168/2025 में चुनौती दी गई.

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उक्त अपील स्वीकार कर ली गई और नीलामी नोटिस रद्द कर दिया. कमिश्नर (Authority) द्वारा जारी आदेश को रिट याचिका संख्या 10497/2025 के जरिए चुनौती दी गई और इस कोर्ट ने कमिश्नर द्वारा 21.03.2025 को जारी आदेश के अमल और कार्यान्वयन पर रोक लगा दी.

याचिकाकर्ता के वकील का तर्क था कि सबसे ज्यादा बोली लगाने वाला घोषित होने के बावजूद, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (Authority) की कानूनी मंजूरी न मिलने के कारण उन्हें मछली पकड़ने के अधिकारों का कानूनी रूप से इस्तेमाल करने से रोका गया. उक्त रिट याचिका का निपटारा 06.08.2025 के आदेश से किया गया, जिसमें तीसरे प्रतिवादी को याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया. रिट याचिका संख्या 23860/2025 में 06.08.2025 को पारित आदेश का पालन करते हुए, तीसरे प्रतिवादी (Authority) ने 15.12.2025 को विवादित आदेश पारित किया.

इसमें बोली की रकम वापस करने से इनकार कर दिया गया. इसका एकमात्र आधार यह था कि सबसे ज्यादा बोली लगाने वाला घोषित होने के बाद, याचिकाकर्ता ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (Authority) की औपचारिक मंजूरी का इंतजार किए बिना ही मछली पकड़ने के अधिकारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था.

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याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जब नीलामी नोटिस/विज्ञापन को रद्द करने वाले कमिश्नर (Authority) के आदेश पर रोक लगा दी गई थी, तो दूसरे प्रतिवादी/डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य था कि वे याचिकाकर्ता के पक्ष में पट्टे के अधिकारों को मंजूरी दें.

लेकिन एक तरफ तो याचिकाकर्ता को मछली पकड़ने की अनुमति नहीं दी गई और दूसरी तरफ राज्य अधिकारियों (Authority) ने गलत तरीके से उनकी बोली की रकम रोक रखी है. अधिवक्ता ने कहा कि 10 जनवरी, 2019 के सरकारी आदेश के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी के बिना मछली पकड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता. याचिकाकर्ता ने मछली पकड़ने का काम नहीं किया है, इसलिए वह अपनी बोली की रकम पाने का हकदार है.

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इसके विपरीत राज्य के वकील ने कहा कि यह पता लगाने के लिए जाँच की गई थी कि याचिकाकर्ता ने मछली पकड़ने के अधिकारों का इस्तेमाल किया था या नहीं. हमीरपुर के मत्स्य विभाग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Authority) की रिपोर्ट से यह साफ है कि सबसे ज्यादा बोली लगाने के आधार पर, याचिकाकर्ता ने परंपरा के अनुसार पूरी अवधि के दौरान मछली पकड़ने का काम किया.

याचिकाकर्ता की सोसाइटी के सचिव ने लीज को आगे किराए पर भी दे दिया था और वे सब-लेसी (किराएदार) को संबंधित नदी में मछली पकड़ते हुए पाए गए. राज्य के वकील का कहना है कि हमीरपुर जिले में सबसे ज्यादा बोली लगाने के बाद मछली पकड़ना एक परंपरा है. इसलिए, मछली पकड़ने के अधिकारों का इस्तेमाल करने के बाद, याचिकाकर्ता के लिए बोली की रकम वापस माँगना उचित नहीं है.

कोर्ट दोनों पक्षों के वकीलों की बात सुनने के बाद यह पता चलता है कि सबसे ज्यादा बोली लगाने वाला होने के बावजूद, मछली पकड़ने के अधिकारों के लिए याचिकाकर्ता के पक्ष में लीज को कभी मंजूरी नहीं दी गई, जो कि 10 जनवरी, 2019 के सरकारी आदेश के पैरा नंबर 8 के अनुसार मछली पकड़ने के अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए एक जरूरी शर्त है.

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सरकारी आदेश का पैरा नंबर 8 इस प्रकार है:
“यदि जिलाधिकारी (Authority) का समाधान हो जाता है कि मत्स्य आखेट क्षेत्र को आवंटित करने का निर्णय नियमों के उपबन्धों के अनुसार किया गया है तो जिलाधिकारी पट्टा/नीलामी की की स्वीकृति बिन्दु संख्या 12 में निर्धारित शर्तों के अधीन प्रदान कर देंगे.”

बेंच ने कहा कि हमें यह समझ नहीं आता कि 10 जनवरी, 2019 के सरकारी आदेश के तहत जरूरी मंजूरी न होने के बावजूद, अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को मछली पकड़ने के अधिकार का इस्तेमाल करने की इजाजत कैसे दी, खासकर तब जब जरूरी मंजूरी और औपचारिक लीज डीड ही नहीं थी. अगर याचिकाकर्ता ने मछली पकड़ी भी थी तो यह सरकारी संपत्ति की चोरी के अपराध से कम नहीं था.

अगर लीज के अधिकारों के बिना मछली पकड़ी गई थी और अधिकारियों (Authority) ने चोरी की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई, तो यह अधिकारियों (Authority) की याचिकाकर्ता के साथ मिलीभगत या उनकी लापरवाही को दिखाता है. दोनों ही स्थितियों में दोषी अधिकारियों (Authority) की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए थी.

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10 जनवरी, 2019 के सरकारी आदेश के पैरा 8 के तहत बताई गई मंजूरी कोई दिखावटी औपचारिकता नहीं है, बल्कि सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाले के पक्ष में कोई भी लागू करने योग्य अधिकार मिलने के लिए यह एक जरूरी शर्त है. जब तक ऐसी मंजूरी नहीं मिल जाती और लीज औपचारिक रूप से पूरी नहीं हो जाती, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता को कोई कानूनी अधिकार मिला है. जब सरकारी आदेश में लीज को एक खास तरीके से पूरा करने और मछली पकड़ने के अधिकारों के लिए इजाजत लेने की बात कही गई है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए.

WRIT – C No. – 3483 of 2026; Matsya Jivi Sahkari Samiti Limited Merapur Vs State of U.P. and 2 others

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