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Evidence की अनदेखी करने पर फिर से आदेश के लिए मामला वापस

Evidence की अनदेखी करने पर फिर से आदेश के लिए मामला वापस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Evidence पैरवी की रसीद की अनदेखी कर अर्जी खारिज करने के अधीनस्थ अदालत के आदेश को रद कर फिर से आदेश पारित करने के लिए केस वापस भेज दिया है. यह आदेश जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने हरिमोहन सैनी की याचिका पर अधिवक्ता धर्मेंद्र सिंह को सुनकर दिया है.

याची हरिमोहन सैनी की भूमि पर मुकेश अदलखा, तेजपाल अग्रवाल एवं कमल द्वारा अवैध निर्माण कराया जा रहा था. जिस पर स्थाई निषेधाज्ञा हेतु सिविल जज मथुरा अदालत में वाद दायर किया गया. जिस पर न्यायालय द्वारा 14 मई 25 को उभयपक्ष की उपस्थिति में वादी को  अंतरिम राहत का आदेश किया. 19 जनवरी 26 द्वारा प्रस्तुत सर्वे रिपोर्ट को निरस्त करते हुए आदेशित किया की वादी द्वारा पुनः स्टेप्स लेने पर सर्वे कमिशन रिपोर्ट प्रस्तुत हो.

कोर्ट ने आवेदन 57 सी (Evidence) पर पुनः विचार करने के लिए मामले को निचली अदालत में वापस भेजा

याचिका करता द्वारा 19 फरवरी  2026 को रुपए 1500  जमा कर पुनः सर्वे रिपोर्ट (Evidence) हेतु पैरवी  की गई. जिसे संबंधित न्यायालय द्वारा अनदेखी कर प्रार्थना-पत्र 57 सी को 29 मई 26 को निरस्त कर दिया गया. जिसे चुनौती दी गई थी. कोर्ट ने आवेदन 57 सी (Evidence) पर पुनः विचार करने के लिए मामले को निचली अदालत में वापस भेजा एवं  कहा दो हफ्ते में निर्णय लिया जाय.

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हाईकोर्ट पार्किंग नियमावली की चुनौती याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट की मल्टी-लेवल पार्किंग एवं अधिवक्ता  (आवंटन एवं अधिभोग) नियमावली, 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है.  याची विजय प्रताप सिंह, जो स्वयं इलाहाबाद हाईकोर्ट में पंजीकृत अधिवक्ता  हैं, ने अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल कर नियमावली, 2026 को चुनौती दी थी.

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याचिका में नियमावली की वैधता, उसकी प्रयोज्यता और उसे बनाने के हाईकोर्ट के अधिकार पर सवाल उठाया गया था. जस्टिस अजित कुमार और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ  के समक्ष याची अधिवक्ता अरुण मिश्रा और  हाईकोर्ट की ओर से अधिवक्ता राहुल श्रीवास्तव ने पक्ष रखा.

कोर्ट ने पाया कि याचिका के आधार खंड में इस तरह की किसी संवैधानिक या वैधानिक कमी का उल्लेख ही नहीं था. याचिका में यह भी नहीं बताया गया था कि नियमावली किस अनुच्छेद के विपरीत  है. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ बयानों के आधार पर कानूनी दलील पर्याप्त नहीं होती अगर याचिका में वैधता को चुनौती देने का ठोस आधार ही मौजूद न हो. कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ठोस आधारों पर दुबारा याचिका दायर करने की छूट दी है.

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