+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि Relative को झूठा गवाह माना जाए, 42 साल पुराने केस में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया आरोपित को कोर्ट में सरेंडर करने का आरोप, सरेंडर न करने पर गैर जमानती वारंट जारी करके की जाए गिरफ्तारी

कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि Relative को झूठा गवाह माना जाए, 42 साल पुराने केस में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील खारिज

कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि Relative को झूठा गवाह माना जाए. इसके उलट जब पक्षपात का आरोप लगाया जाता है तो यह साबित करने के लिए कारण बताना जरूरी होता है कि गवाहों के पास असली अपराधी को बचाने और आरोपी को झूठा फंसाने की कोई वजह थी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘हरबंस कौर और अन्य बनाम हरियाणा राज्य’ (2005) 9 SCC 195 मामले में सुनाये गये फैसले को आधार बनाकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने हमीरपुर की सेशंस कोर्ट के आरोपित को उम्र कैद की सजा सुनाने के फैसले को सही ठहराते हुए आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है.

कोर्ट ने आपराधिक अपील दाखिल करने वाले आरोपित को कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया है और कहा है कि ऐसा न करने पर उसके खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी करके गिरफ्तार करके जेल भेजा जायेगा जहां वह आगे की सजा पूरी करेगा. दो जजों की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि सूचनाकर्ता बारी बहू मृतक रामोला की मां (Relative) है, और परसादी मृतक के चाचा के साथ-साथ अपीलकर्ता के चाचा (Relative) भी हैं.

राम चरण (अब मृतक), दोनों हल्लू के बेटे (Relative) हैं. गवाह संबंधित परिवार के सदस्य हैं. केवल इस आधार पर कि चश्मदीद गवाह मृतक से संबंधित हैं, उनके साक्ष्य पर संदेह नहीं किया जा सकता है. यह भी एक स्वाभाविक मानवीय आचरण है कि पीड़ित के परिवार का कोई सदस्य किसी निर्दोष व्यक्ति, खासकर अपने परिवार (Relative) के किसी सदस्य को हत्या जैसे जघन्य अपराध में झूठा नहीं फंसाएगा.

इसे भी पढ़ें….CrPC की धारा 125 के तहत Maintenance तय करने की याचिका पर क्रूरता का पक्का सुबूत मांगना उचित नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट

यह आपराधिक अपील गयासी और राम चरण की तरफ से दाखिल की गयी थी. अपील में सेशंस ट्रायल नंबर 48/1986, स्टेट बनाम गयासी और अन्य (केस क्राइम नंबर 52/1984 से शुरू), सेक्शन 302/34 IPC, पुलिस स्टेशन कुलपहाड़, जिला हमीरपुर में 10.04.1987 को दिए गए फैसले और सजा के आदेश को चुनौती दी गयी थी. सेशंस कोर्ट ने अपील करने वालों को सेक्शन 302/34 IPC के तहत सजा के लायक जुर्म के लिए दोषी ठहराते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

तथ्यों के अनुसार बारी बहू ने 11.07.1984 को थाना कुलपहाड़, जनपद हमीरपुर में नामजद रिपोर्ट दर्ज करायी. जिसमें कहा गया कि उसका बेटा रमोला (Relative) गाँव जैतपुर हार में स्थित अपने खेत में मूंगफली की फसल बो रहा था. वह दोपहर को उसे खाना लाने के लिए वहाँ गई थी. बेटे ने अपना काम समाप्त किया, स्नान किया और एक बरगद के पेड़ की छाया में खाना खाया. वह वहीं बैठी थी, जबकि उसका बेटा अपनी साफी पर सो रहा था. परसादी और छदामी भी वहीं पेड़ की छाया में बैठे थे.

इसे भी पढ़ें….विधानसभाओं के लिए आरक्षण रोटेशन का मामला विधायी अधिकार क्षेत्र में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा

दोपहर में उसके ही परिवार/वंश से गयासी, रामचरण (Relative) भाला और फरसा से लैस होकर पेड़ के नीचे पहुँचे और बिना कुछ बोले गयासी ने रमोला पर फरसा और रामचरण ने भाले से हमला करके उसे मार डाला. मृतक और गयासी के बीच खेत और रामचरण के साथ महुआ के पेड़ों को लेकर पुरानी दुश्मनी चल रही है. हत्या उसी के चलते की गयी है.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने विवेचना के दौरान बयान दर्ज किये और साक्ष्य जुटाये. इसके बाद चार्जशीट ट्रायल कोर्ट में दाखिल की. कोर्ट ने चार्जशीट में दिये गये गवाहों और साक्ष्यों का परीक्षण किया और उसके बाद दोनों आरोपितों को दोषी करार देते हुए उन्हें उम्र कैद की सजा सुनायी. इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी. संयोग से इसी दौरान एक आरोपित राम चरण की मृत्यु हो गयी. इसके बाद उसका नाम केस की कार्रवाई से हटा दिया गया. हाई कोर्ट की बेंच सिर्फ गयासी की अपील पर सुनवाई कर रही थी. 

ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से मुखबिर बारी बहू (Relative) के सबूतों पर भरोसा किया

अपीलकर्ता गयासी के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से मुखबिर बारी बहू (Relative) के सबूतों पर भरोसा किया, जो मृतक रमोला की माँ और दूसरे अपीलकर्ता राम चरण (अब मृत) की सौतेली माँ (Relative) हैं. आरोप है कि उन्होंने खुद को एक संबंधित गवाह बताते हुए इस मामले में आरोपी-अपीलकर्ताओं को झूठे और जानबूझकर फंसाया है.

इसे भी पढ़ें….जमानत मंजूर करने और दोषसिद्धि व सजा पर रोक के आदेश पर रोक लगाने के लिए पीआईएल दाखिल करवाने वाले पर हाई कोर्ट ने लगाया 50000 रुपये जुर्माना

परसादी राम चरण के सगे चाचा (Relative) हैं. सभी गवाह मृतक रामोला और अपीलकर्ता नंबर 2 राम चरण (जो अब जीवित नहीं हैं) के करीबी Relative हैं. अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी की पुष्टि करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह नहीं है. तर्क दिया गया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष के गवाह मृतक के परिवार के सदस्य (Relative) होने के कारण उससे बहुत करीबी तौर पर जुड़े हुए हैं, और कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी स्वतंत्र पुष्टि के बिना ऐसे करीबी Relative या मामले में रुचि रखने वाले लोगों की गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.

ट्रायल कोर्ट ने अपने निष्कर्षों में इस पहलू पर विचार नहीं किया. कहा गया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए निष्कर्ष और तर्क कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत हैं और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए. अपीलकर्ता के वकील ने दलीलों के आधार पर तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपना मामला साबित करने में विफल रहा. इसलिए दोषसिद्धि और सजा के विवादित फैसले और आदेश को रद्द किया जाना चाहिए.

इसके विपरीत अतिरिक्त सरकारी वकील ने तर्क दिया है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज निष्कर्ष और तर्क अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही पर आधारित हैं, जिन्होंने घटना को अपनी आँखों से देखा है. अभियोजन पक्ष के गवाह घटना स्थल पर मौजूद थे और उन्होंने आरोपी-अपीलकर्ताओं द्वारा कथित अपराध करते हुए देखा था. यह भी कहा गया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों, यानी सूचना देने वाली बारी बहू (Relative) और परसादी के मौखिक सबूतों को मेडिकल सबूतों से समर्थन और पुष्टि मिलती है जिसमें डॉक्टर का बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी शामिल है.

इसे भी पढ़ें…. उत्तर प्रदेश में प्रधानों को रिसीवर तैनात करने का 25, 26 मई 2026 का आदेश असंवैधानिक करार, प्रमुख सचिव पंचायत राज बताएं पंचायत चुनाव की तैयारी की डिटेल

उन्होंने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के मौखिक सबूतों की मेडिकल सबूतों से पूरी तरह पुष्टि होती है. इसलिए, ट्रायल कोर्ट ने कानून के अनुसार अभियोजन पक्ष के सभी सबूतों का उचित मूल्यांकन करने के बाद आरोपी-अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराया. आगे यह कहा गया कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष और तर्क प्रत्यक्षदर्शी और मेडिकल सबूतों दोनों पर आधारित हैं, जो एक-दूसरे का समर्थन और पुष्टि करते हैं. ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए निष्कर्षों या तर्कों में कोई गड़बड़ी या गैर-कानूनी बात नहीं है. इसलिए आपराधिक अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए.

दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि सूचनाकर्ता (Relative) की गवाही से हमें पता चलता है कि वह एक अनपढ़ महिला हैं, जिन्होंने अपनी लिखित रिपोर्ट और गवाही पर अंगूठे का निशान लगाया है. अनपढ़ होने के बावजूद, उन्होंने कथित घटना का वर्णन सरल और सीधे तरीके से किया है, बिना किसी बढ़ा-चढ़ाकर या बनावटी बात के.

इसे भी पढ़ें… सेवानिवृत्तिक लाभ प्रोविडेंट फंड, पेंशन और बीमा सुरक्षित अधिकार, MV Act 1988 के तहत मुआवजे की गणना करते समय कटौती या बहिष्करण के लिए उत्तरदायी “आर्थिक लाभ” नहीं माना जा सकता

उन्होंने जो देखा, वही बात उन्होंने कोर्ट के सामने बताई है. कोर्ट ने कहा कि हमें लगता है कि शिकायतकर्ता (Relative) बारी बहू के बयान में कोई ऐसी जरूरी या बड़ी विरोधाभासी बात नहीं है जिससे उनके सबूत पर यकीन न किया जा सके या उसे अविश्वसनीय माना जाए.

दूसरे शब्दों में, उन्होंने बिना किसी बनावट या मनगढ़ंत कहानी के, सीधी और स्वाभाविक भाषा में तथ्य पेश किए हैं. उनके सबूत में ऐसी कोई विरोधाभासी बात नहीं है जिससे उसकी विश्वसनीयता पर शक किया जा सके. सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता, बारी बहू मृतक रामोला की माँ (Relative) हैं, कोर्ट इस गवाह के बयान की विश्वसनीयता और भरोसेमंदता को खारिज नहीं कर सकता. इसलिए, हमारी राय है कि इस गवाह का बयान पूरी तरह भरोसेमंद है.

इसे भी पढ़ें…APO Preliminary Examination का मकसद सिर्फ स्क्रीनिंग, इसके अंक फाइनल रिजल्ट में नहीं जुड़ते, यूपी आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 3(6) का लाभ अंतिम चरण में मिलता है

बेंच ने कहा कि गवाहों के बयानों में हमेशा सामान्य कमियां होती हैं, चाहे वे कितने भी ईमानदार और सच्चे क्यों न हों. ये कमियां देखने में सामान्य गलतियों, समय बीतने के कारण याददाश्त की सामान्य गलतियों, घटना के समय सदमे और डर जैसी मानसिक स्थिति, और ऐसी ही अन्य वजहों से होती हैं. महत्वपूर्ण कमियां वे होती हैं जो सामान्य नहीं होतीं और जिनसे किसी सामान्य व्यक्ति से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती. मृतक की मां (Relative) के बयान में कोर्ट को ऐसी कोई कमी नहीं मिली.

इसे भी पढ़ें… Select कहार, कश्यप, मल्लाह, निषाद और बिंद जातियों को मझवार caste की sub caste, पर्यायवाची या सामान्य रूप मानकर संविधान (SC) आदेश, 1950 में मझवार जाति के साथ शामिल नहीं किया जा सकता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *