Welfare scheme के तहत घर मिल जाने से धारा 125 के तहत मेंटेनेंस पाने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि Welfare scheme के तहत रिहायशी घर मिलना आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता. ऐसी किसी Welfare scheme का लाभ मिल जाने मात्र से पत्नी का गुजारा-भत्ता पाने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता है. यह फैसला जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट द्वारा श्रीमती तबस्सुम उर्फ तनून बनाम मन्नान केस में सुनाये गये फैसले के खिलाफ दाखिल रिवीजन याचिका पर सुनाया है. कोर्ट ने इसी के आधार पर पति की याचिका खारिज कर दी है.
इस याचिका में रिविजनिस्ट ने बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज द्वारा मेंटेनेंस केस नंबर 242/2018 (श्रीमती तबस्सुम उर्फ तनून बनाम मन्नान) में Cr.P.C. की धारा 125 के तहत 01.09.2023 को दिए गए फैसले और आदेश को चुनौती दी थी. इस आदेश में कोर्ट ने पत्नी की अर्जी मंजूर करते हुए रिविजनिस्ट को कार्यवाही शुरू होने की तारीख से ₹4,000 प्रति माह और आदेश की तारीख से ₹5,000 प्रति माह की दर से मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया था.
रिविजनिस्ट के वकील ने तर्क दिया कि विवादित आदेश रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के उलट है. इसमें जरूरी तथ्यों को गलत तरीके से समझा गया है. तर्क दिया गया है कि रिविजनिस्ट एक अनपढ़ व्यक्ति है जो ड्राइवर के तौर पर काम करता था और लगभग ₹5,000 प्रति माह कमाता था और अभी वह बेरोजगार है.
कहा गया कि पत्नी सिलाई-कढ़ाई के काम से कमाई कर रही है और उसे Welfare scheme प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर भी मिला
यह भी कहा गया कि पत्नी सिलाई-कढ़ाई के काम से कमाई कर रही है और उसे Welfare scheme प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर भी मिला है. रिविजनिस्ट के अनुसार, उसने कभी अपनी पत्नी की अनदेखी नहीं की और सुलह की कोशिशें की थीं. इसके आधार पर तर्क दिया गया कि फैमिली कोर्ट ने रिविजनिस्ट की आर्थिक क्षमता से ज्यादा मेंटेनेंस तय करके गलती की है.
फैमिली कोर्ट के सामने पत्नी का पक्ष यह था कि उसकी शादी 03.12.2016 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी. आरोप लगाया गया था कि शादी के बाद उसे अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर क्रूरता और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा और आखिरकार उसे ससुराल छोड़कर अपने मायके में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह भी आरोप लगाया गया कि पर्याप्त साधन होने के बावजूद पति ने उसकी देखभाल करने में लापरवाही बरती और मना कर दिया. इन दावों के आधार पर ₹20,000 प्रति माह के भरण-पोषण की मांग की गई थी.

रिविजनिस्ट ने फैमिली कोर्ट में आपत्तियां दाखिल करके कार्यवाही का विरोध किया. वैवाहिक संबंध को स्वीकार करते हुए उसने पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों से इनकार किया और कहा कि वह अपनी मर्जी से वैवाहिक घर छोड़कर गई थी. यह भी कहा गया कि पत्नी सिलाई और कढ़ाई के काम से कमाई कर रही थी और अपना भरण-पोषण करने में सक्षम थी. पति ने आगे कहा कि वह सीमित आय के साथ केवल एक ड्राइवर के रूप में काम कर रहा था और मांगी गई राशि का भुगतान करने में आर्थिक रूप से अक्षम था.
पक्षों द्वारा पेश किए गए सबूतों पर विचार करने के बाद फैमिली कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पत्नी रिविजनिस्ट की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है और वह पर्याप्त कारण से अलग रह रही थी. फैमिली कोर्ट ने यह भी पाया कि ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी के पास अपना भरण-पोषण करने के लिए आय का कोई स्वतंत्र स्रोत था. कोर्ट ने यह भी पाया कि वैवाहिक संबंध बने रहने के बावजूद रिविजनिस्ट अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने में विफल रहा और तदनुसार उसके पक्ष में भरण-पोषण का आदेश दिया.
पक्षों के वकीलों की दलीलों पर विचार करने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद हाई कोर्ट की बेंच ने पाया कि पक्षों के बीच पति-पत्नी का रिश्ता माना गया है. रिविजनिस्ट का मुख्य विवाद पत्नी के गुजारा-भत्ता पाने के अधिकार और फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि से जुड़ा है.
बेंच ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 का मकसद बेबसी और दर-दर भटकने की हालत को रोकना और ऐसी पत्नी को तुरंत और असरदार उपाय देना है जो अपना खर्च उठाने में असमर्थ है. यह प्रावधान सामाजिक न्याय का एक उपाय है जिसका मकसद महिलाओं को नजरअंदाजी और छोड़े जाने से बचाना है.
चतुर्भुज बनाम सीता बाई, (2008) 2 SCC 316 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी है कि धारा 125 का मकसद दर-दर भटकने और बेबसी की हालत को रोकना है और “अपना खर्च उठाने में असमर्थ” होने का मतलब यह नहीं है कि गुजारा-भत्ता मांगने से पहले पत्नी का पूरी तरह से बेसहारा होना जरूरी है.
इसी तरह, भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2015) 6 SCC 353 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजारा-भत्ता की कार्यवाही का मकसद यह पक्का करना है कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके और उसे आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े. यही सिद्धांत शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान (2015) 5 SCC 705 मामले में भी दोहराया गया, जिसमें कहा गया कि शारीरिक रूप से सक्षम पति अपनी पत्नी का खर्च उठाने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता.
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में रिविजनिस्ट ने यह तर्क दिया है कि पत्नी सिलाई और कढ़ाई के काम से कमा रही है और इसलिए वह गुजारा-भत्ता पाने की हकदार नहीं है. हालाँकि ऐसा कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी के पास आय का कोई नियमित और पर्याप्त जरिया है जिससे वह अपना खर्च उठा सके.
सिर्फ दावों को बिना संतोषजनक सबूत के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का सबूत नहीं माना जा सकता. इसी तरह किसी Welfare scheme के तहत रिहायशी घर मिलने को आजीविका का जरिया नहीं माना जा सकता जिससे पत्नी गुजारा-भत्ता मांगने की हकदार न रहे.
कोर्ट ने माना कि रिविजनिस्ट की आर्थिक अक्षमता के बारे में दी गई दलील भी उतनी ही कमजोर है. फैमिली कोर्ट ने पाया है कि याचिकाकर्ता एक कुशल ड्राइवर और शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति है जो कमाने में समर्थ है. यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि कोई पति केवल यह कहकर अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह बेरोजगार है या उसकी आय बहुत कम है.
कोर्ट यह भी पाता है कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय किया गया भरण-पोषण – यानी कार्यवाही शुरू होने की तारीख से ₹4,000 प्रति माह और आदेश की तारीख से ₹5,000 प्रति माह – न तो बहुत ज्यादा है और न ही अनुचित. जीवन-यापन की मौजूदा लागत और धारा 125 के मकसद को ध्यान में रखते हुए तय की गई राशि उचित और सही है.
यह बात भी अच्छी तरह से तय है कि रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय, यह कोर्ट अपील कोर्ट की तरह सबूतों का दोबारा मूल्यांकन या उन पर फिर से विचार नहीं करता, सिर्फ इसलिए कि कोई दूसरा नजरिया भी हो सकता है. दखल तभी जरूरी है जब निष्कर्षों में साफ तौर पर कोई गैर-कानूनी बात, मनमानी या ऐसी बड़ी अनियमितता हो जिससे न्याय में गड़बड़ी हुई हो. इस मामले में ऐसी कोई कमी नहीं दिखाई गई है.
तथ्यों और हालात पर कुल मिलाकर विचार करने के बाद इस कोर्ट की राय है कि विद्वान फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के सही मूल्यांकन पर आधारित हैं और उनमें ऐसी कोई गैर-कानूनी बात, मनमानी या अधिकार क्षेत्र की गलती नहीं है जिसके लिए इस कोर्ट को दखल देने की जरूरत हो.