Law के पेपर में मिले ‘0’ नंबर, छात्र का कापी पर लिखा जवाब पढ़कर कोर्ट दंग, याचिका खारिज, बार काउंसिल और Law Commission को भेजी Answer Booklet

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Law Education के गिरते स्तर पर गहरी चिंता जताते हुए एक बीए एलएलबी छात्र की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने बायोडायवर्सिटी प्रोटेक्शन Law विषय में मिले शून्य अंकों के पुनर्मूल्यांकन की मांग की थी. कोर्ट ने छात्र की उत्तर पुस्तिका को पूरी तरह अस्पष्ट और अर्थहीन पाया और मामले को बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा Law कमीशन ऑफ इंडिया को भेजने का आदेश दिया है. फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कमेंट कोट कराया कि कमी जितनी छात्र के उत्तरों में है, उतनी ही संस्थान की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की जिम्मेदारी निभाने में विफलता में भी है.
यह मामला प्रयागराज स्थित प्रयाग Law महाविद्यालय, मवैया, नैनी के छात्र विंध्य वासिनी प्रसाद पांडेय से जुड़ा है. यह संस्थान प्रो. राजेंद्र सिंह (राज्जू भैया) विश्वविद्यालय, प्रयागराज से संबद्ध है. याचिकाकर्ता ने पांच वर्षीय बीए एलएल.बी. पाठ्यक्रम के नौवें सेमेस्टर (सत्र 2025-26) की परीक्षा में “बायोडायवर्सिटी प्रोटेक्शन Law” विषय की परीक्षा दी थी. 18 मार्च 2026 को परिणाम घोषित हुआ, जिसमें छात्र को इस विषय के सभी प्रश्नों में शून्य अंक दिए गए. छात्र का दावा था कि उसने सभी प्रश्नों के उत्तर लिखे थे और उसे 50 से अधिक अंक मिलने की उम्मीद थी.
पिछली सुनवाई में विश्वविद्यालय को प्रश्नपत्र और Law student की मूल उत्तर पुस्तिका पेश करने का निर्देश दिया था
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिका की प्रति मांगने पर उसे पता चला कि किसी भी उत्तर पर कोई अंक नहीं दिया गया. विश्वविद्यालय से पुनर्मूल्यांकन की मांग के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद छात्र ने हाईकोर्ट का रुख किया. याचिकाकर्ता ने बताया कि वह एलएलएम प्रवेश परीक्षा पास कर चुका है और काउंसलिंग प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है. जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने पिछली सुनवाई में विश्वविद्यालय को प्रश्नपत्र और Law student की मूल उत्तर पुस्तिका पेश करने का निर्देश दिया था.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य के स्थायी अधिवक्ता को बायोडायवर्सिटी प्रोटेक्शन Law के प्रश्न संख्या 3(सी) का उत्तर पढ़कर सुनाने को कहा. प्रश्न था “जैव विविधता संरक्षण से संबंधित राष्ट्रीय कानूनों (Law) का वर्णन करें.” कोर्ट के आदेश में दर्ज उत्तर में कोई तार्किक अनुक्रम, तथ्यात्मक जानकारी या कानूनी अवधारणा नहीं मिली.
जवाब में असंबद्ध वाक्यांशों और घुमावदार शब्दजाल का इस्तेमाल किया गया था, जिसका विषय से कोई सीधा संबंध नहीं बनता. उत्तर में केवल दो अधिनियमों, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1973 और जैव विविधता अधिनियम 1996 का नाम भर लिया गया था, बाकी विवरण असंगत रहा.
पढ़ने के बाद स्वयं स्थायी अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि वे उत्तर का कोई अर्थ नहीं निकाल पाए. कोर्ट ने भी उत्तर पुस्तिका का स्वयं परीक्षण कर यही निष्कर्ष निकाला कि इसमें विषय की कोई कानूनी (Law) समझ नहीं झलकती, और परीक्षक द्वारा शून्य अंक देने में कोई त्रुटि नहीं पाई. कोर्ट ने कहा कि शेष उत्तरों की स्थिति भी लगभग वैसी ही है.
कोर्ट ने दोहराया कि अकादमिक मूल्यांकन के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित होता है. जब तक मनमानी, दुर्भावना, वैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन या मूल्यांकन प्रक्रिया में स्पष्ट त्रुटि साबित न हो, अदालत हस्तक्षेप नहीं करती. रिकॉर्ड की जांच में कोर्ट को ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह कहा जा सके कि परीक्षक ने मनमाने ढंग से काम किया या Law Student को कोई नुकसान पहुंचाया.
कोर्ट ने व्यक्तिगत मामले से आगे बढ़कर संस्थागत शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि Law education न्याय व्यवस्था की नींव है, और संस्थागत स्तर पर अकादमिक मानकों में गिरावट सीधे न्याय प्रशासन को प्रभावित करती है. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस तरह के मामले अदालत के सामने चिंताजनक रूप से बार-बार आ रहे हैं यह कोई अकेला मामला नहीं है.
कोर्ट ने यह संभावना भी जताई कि यदि Law Student को परीक्षा से पहले उचित मार्गदर्शन, ओरिएंटेशन और पर्यवेक्षण मिला होता, तो शायद उत्तर इस तरह न लिखे गए होते. कोर्ट के अनुसार, कमी जितनी छात्र के उत्तरों में है, उतनी ही संस्थान की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की जिम्मेदारी निभाने में विफलता में भी है.
कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका की प्रति (छात्र की पहचान संबंधी विवरण नाम, रोल नंबर, एनरोलमेंट नंबर आदि हटाकर) भेजी जाए, ताकि वह संबंधित संस्थान द्वारा निर्धारित अकादमिक व अवसंरचनात्मक मानकों की पूर्ति की जांच कर सके. Law कमीशन ऑफ इंडिया के सदस्य सचिव को भी इसी तरह संपादित प्रति भेजी जाए, ताकि आयोग देश में विधि शिक्षा के व्यापक मानकों पर विचार कर सके और आवश्यक हो तो सुधार हेतु रिपोर्ट तैयार कर सके.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल संबंधित निकायों का ध्यान एक सामान्य चिंता के विषय की ओर आकर्षित करने के लिए हैं, और इन्हें संस्थान या किसी शिक्षक/परीक्षक के खिलाफ निष्कर्ष के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि वे इस मामले में पक्षकार नहीं हैं. कोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार न पाते हुए याचिका खारिज कर दी. मूल प्रश्नपत्र और मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका प्रतिवादी को सुरक्षित रखने हेतु वापस लौटाने का निर्देश दिया गया.