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वकील को अभियुक्त से मिली फीस अपराध की Income नहीं, हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा, 17 जुलाई को होगी सुनवाई

वकील को अभियुक्त से मिली फीस अपराध की Income नहीं, हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा, 17 जुलाई को होगी सुनवाई

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अभियुक्त द्वारा अपने वकील को पेशेवर सेवाओं के बदले दी गई फीस (Income) को केवल इस आधार पर अपराध की आय नहीं माना जा सकता कि भुगतान आरोपी ने किया है. जब तक अधिवक्ता स्वयं किसी आपराधिक कृत्य में शामिल न हो तब तक उसकी पेशेवर फीस (Income) को अपराध की आय नहीं कहा जा सकता.

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने उत्तर प्रदेश पुलिस की साइबर सेल द्वारा एक वकील का पूरा बैंक खाता फ्रीज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया. तथ्यों के अनुसार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कृष्णा नगर ब्रांच कानपुर के ब्रांच मैनेजर की तरफ से बताया गया कि उत्तर प्रदेश पुलिस के साइबर सेल नाम के एक विभाग ने कुछ धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन (Income) की वजह से याचिकाकर्ता का अकाउंट ​फ्रीज कर दिया है.

कोर्ट में तर्क दिया गया कि इस कोर्ट की दो डिवीजन बेंच के फैसलों (खालसा मेडिकल स्टोर बनाम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और अन्य, केस नंबर 2026:AHC-LKO:3701-DB और मारूफा बेगम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य, केस नंबर 2025:AHC:190289-DB) से तय हो चुकी है कि धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन (Income) की वजह से साइबर सेल पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज नहीं कर सकता, वह सिर्फ उस पैसे को रोक सकता है जो संदिग्ध ट्रांजैक्शन (Income) या किसी अपराध से आया हो.

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मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) से व्यक्तिगत शपथपत्र तलब किया है. अदालत ने पूछा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था करेगी कि पुलिस अधिकारी बैंक अकाउंट फ्रीज करने की अपनी शक्तियों का ऐसा उपयोग न करें, जिससे न्यायिक प्रक्रिया और अदालतों के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े.

खाते में जमा राशि उनके मुवक्किल से मिली पेशेवर फीस (Income) थी

मामले के अनुसार वकील आयुष बाजपेयी ने हाइकोर्ट का रुख करते हुए कहा कि साइबर सेल ने कथित फर्जी लेनदेन (Income) का हवाला देकर उनका बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिया है, जबकि खाते में जमा राशि उनके मुवक्किल से मिली पेशेवर फीस (Income) थी. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वकील को उसकी फीस सरकार भी दे सकती है, कोई सम्मानित नागरिक भी और कोई ऐसा व्यक्ति भी जिसके खिलाफ आपराधिक आरोप हों. ऐसे में फीस (Income) के स्रोत और वकील की पेशेवर आय के बीच अंतर करना आवश्यक है.

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अदालत ने कहा, “कोई वकील किसी बड़े घोटाले या धोखाधड़ी के आरोपी का भी बचाव कर सकता है, लेकिन यदि ऐसा आरोपी अपने वकील के अकाउंट में फीस (Income) जमा करता है, तो उस राशि (Income) को अपराध की आय (Income) नहीं कहा जा सकता.” हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह राशि अधिवक्ता की वैध पेशेवर आय (Income) है, जो उसे अपने विधिक दायित्व निभाने के बदले प्राप्त होती है.

बेंच ने कहा, “यदि किसी राशि (Income) के जमा होने पर वकील का बैंक अकाउंट यह कहकर फ्रीज कर दिया जाए कि वह साइबर धोखाधड़ी या किसी अन्य अपराध की आय (Income) है, तो वकीलों के लिए अपने पेशेवर दायित्व निभाना अत्यंत कठिन हो जाएगा. इससे अदालतों का कामकाज भी प्रभावित होगा.

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई वकील स्वयं किसी आपराधिक मामले में शामिल हो और उसके खाते में अपराध से अर्जित धन (Income) जमा हो, तो स्थिति अलग होगी. हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि किसी संदिग्ध या फर्जी लेनदेन (Income) के आधार पर साइबर सेल पूरे बैंक अकाउंट को फ्रीज नहीं कर सकती.

केवल संदिग्ध लेनदेन या अपराध से जुड़ी राशि (Income) पर ही कार्रवाई की जा सकती है. अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता अधिवक्ता के अकाउंट में 18 मार्च 2026 को 20 हजार रुपये और 23 अप्रैल 2026 को 3,700 रुपये की तीन अलग-अलग जमा राशियां थीं. खाते में कुल शेष राशि 1,03,071 रुपये थी. मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को होगी.

कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की जानकारी अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश लखनऊ और साइबर सेल, उत्तर प्रदेश पुलिस को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ के माध्यम से और साथ ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, कृष्णा नगर शाखा, कानपुर के शाखा प्रबंधक को विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कानपुर नगर के माध्यम से अगले सोमवार तक पहुंचाना सुनिश्चित करें.

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