उत्तर प्रदेश में प्रधानों को Receiver तैनात करने का 25, 26 मई 2026 का आदेश असंवैधानिक करार, प्रमुख सचिव पंचायत राज बताएं पंचायत चुनाव की तैयारी की डिटेल
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा जिस कोर्ट के जिए आदेश के सहारे लिया गया फैसला उसे डबल बेंच पहले की कर चुकी है खारिज, बनता है अवमानना का मामला

इस स्थिति में यह प्रथम दृष्टया अदालत के आदेश की अवमानना का मामला भी बनता है. कोर्ट ने सुनवाई की तिथि 13 जुलाई को दिन में दो बजे मुकर्रर करते हुए प्रमुख सचिव पंचायती राज को व्यक्तिगत हलफनामा के साथ पंचायत चुनाव की डिटेल शेयर करने को कहा है. ऐसा न करने पर उन्हें खुद कोर्ट में हाजिर होना होगा.
यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की सिंगल बेंच ने अरविंद राठौर की तरफ से दाखिल रिट सी याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का निश्चित होता है और समय पर चुनाव कराना संवैधानिक दायित्व है.
कोर्ट ने मौजूदा प्रधानों को Receiver के रूप में जारी रखने से भी इनकार कर दिया. साथ ही राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा बतानी होगी.
प्रधानों को Receiver तैनात करने के सरकारी आदेश को रद करने की मांग
इस रिट याचिका में 25 और 26 मई जो जारी किये गये उत्तर प्रदेश में प्रधानों को Receiver तैनात करने के सरकारी आदेश को रद करने के साथ ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K का अनिवार्य रूप से पालन करते हुए, पूरी तीन-स्तरीय पंचायत चुनाव प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक विस्तृत और समय-सीमा वाला कार्यक्रम रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिये जाने की मांग की गयी थी.
अपना पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि विवादित आदेश 1947 के अधिनियम की धारा 12(3-A) के तहत पारित किए गए हैं. इस धारा को ‘प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (2000 LawSuit ALL 290) मामले में चुनौती दी गई थी, जिसमें इस अदालत की एक डिवीजन बेंच ने पाया था कि Receiver तैनात करने का प्रावधान अनुच्छेद 243E और 243K का उल्लंघन करता है.
डिवीजन बेंच के फैसले का पैराग्राफ-29, 31, 34, 36 और 37:-
- “29. भारत के संविधान के अनुच्छेद 243E के अनुसार, पंचायत का कार्यकाल निश्चित होता है, यानी इसकी पहली बैठक के लिए तय तारीख से पांच साल और अगर उस समय लागू किसी कानून के तहत इसे पहले भंग न किया जाए तो इससे ज्यादा नहीं. पंचायत के भंग होने की स्थिति में, भंग होने की तारीख से छह महीने की अवधि खत्म होने से पहले पंचायत का चुनाव कराना जरूरी है, बशर्ते कि अगर पंचायत के गठन के लिए बचा हुआ कार्यकाल 6 महीने से कम हो, तो पंचायत के गठन के लिए उस अनुच्छेद के तहत कोई चुनाव कराना जरूरी नहीं होगा.
- 31. अनुच्छेद 243E में दिया गया संवैधानिक आदेश यह है कि हर पंचायत, जब तक कि उस समय लागू किसी कानून के तहत भंग न की जाए, अपनी पहली बैठक के लिए तय तारीख से पांच साल तक चलेगी और उससे ज्यादा नहीं. यह आदेश पक्का है. कोई भी पंचायत पांच साल से ज्यादा समय तक काम नहीं कर सकती. “shall and no longer” शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं. अनुच्छेद 243E कोई विकल्प नहीं छोड़ता, क्योंकि इसमें कहा गया है कि अगली पंचायत के गठन के लिए चुनाव क्लॉज (1) में बताई गई अवधि खत्म होने से पहले पूरे हो जाने चाहिए. उक्त अनुच्छेद को देखने से पता चलता है कि “shall” (होगी/जरूरी है) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब है: क्लॉज (1) में बताई गई पंचायत की अवधि खत्म होने से पहले चुनाव जरूर होने चाहिए. “no longer” (और उससे ज्यादा नहीं) शब्द साफ तौर पर यह आदेश देते हैं कि अगली पंचायत के गठन के लिए नए चुनाव किसी भी कीमत पर मौजूदा पंचायत के पांच साल के कार्यकाल के खत्म होने से पहले पूरे हो जाने चाहिए.
- 34. राज्य, लिस्ट II की एंट्री 5 में बताए गए मामलों के संबंध में किसी ज्यादा अधिकार का दावा नहीं कर सकता, जिसकी संविधान इजाजत नहीं देता. लिस्ट II की एंट्री के तहत अधिकारों का इस्तेमाल संविधान के भाग IX के प्रावधानों के अधीन होगा. संवैधानिक संशोधन किए जाने और चैप्टर IX को बदलने के बाद, चैप्टर IX के तहत आने वाले मामलों के संबंध में राज्य विधानसभा के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं. राज्य विधानसभा अनुच्छेद के दायरे में दखल नहीं दे सकती पंचायत चुनाव को पाँच साल से ज्यादा समय के लिए टालकर और राज्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों को हड़पकर संविधान के अनुच्छेद 243E या अनुच्छेद 243K का उल्लंघन करना.
- 36. विद्वान एडवोकेट जनरल की दलील से हमने यह समझा है कि चूंकि संविधान उन अप्रत्याशित स्थितियों के बारे में चुप है जिनमें चुनाव नहीं हो सकते, इसलिए राज्य विधानमंडल – जिसके पास संविधान के अनुच्छेद 243C के तहत पंचायत के गठन के लिए कानून बनाने की शक्ति है – चुनाव को टालने के लिए अध्यादेश जारी करके इस कमी को पूरा कर सकता है. हमारी राय में यह तर्क गलत है क्योंकि विवादित अध्यादेश की धारा 3, जो U.P. पंचायत राज अधिनियम की धारा 12BB की उप-धारा (3) को बदलना चाहती है, न केवल संविधान के अनुच्छेद 243K के दायरे में दखल देती है, बल्कि राज्य चुनाव आयोग की शक्तियों को भी कमोबेश खत्म कर देती है. संविधान के अनुच्छेद 243K(1) के तहत, मतदाता सूची तैयार करने और पंचायतों के सभी चुनाव कराने की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण राज्य चुनाव आयोग के पास होता है, जिसमें राज्यपाल द्वारा नियुक्त राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं. ग्राम पंचायत के प्रधान या उप-प्रधान या सदस्यों के आम चुनाव या उपचुनाव के लिए तारीख या तारीखें तय करने और चुनाव की अधिसूचना जारी करने से जुड़े मामले राज्य चुनाव आयुक्त की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण के दायरे में आते हैं, जिनकी नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 243K(1) के तहत राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है. U.P. पंचायत राज अधिनियम की धारा 12BB में क्लॉज (3) को बदलकर, राज्य सरकार ने चुनाव आयुक्त के परामर्श से ग्राम पंचायत के प्रधान या उप-प्रधान या सदस्यों के आम चुनाव या उपचुनाव के लिए तारीख या तारीखें तय करने और चुनाव की अधिसूचना जारी करने का काम खुद अपने हाथ में ले लिया है. अनुच्छेद 243K का आदेश स्पष्ट और साफ है. ऐसी सभी शक्तियां राज्य चुनाव आयुक्त के पास होती हैं. राज्य सरकार ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो संविधान के किसी भी प्रावधान – खासकर अनुच्छेद 243K – के खिलाफ हो या जो राज्य चुनाव आयुक्त के अधिकार क्षेत्र में दखल देता हो.
- 37. असल में, पूरा अध्यादेश संविधान के आर्टिकल 243E और 243K में दिए गए संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है. राज्य सरकार की ओर से संविधान के किसी भी प्रावधान के असर को खत्म करने की कोई भी कोशिश निंदा के लायक है. अगर राज्य सरकार संवैधानिक आदेश का पालन नहीं करती है और ऐसा अध्यादेश जारी करती है जो भारत के संविधान के किसी भी प्रावधान के अनुरूप नहीं है, तो चुनाव कराने में होने वाली किसी भी देरी के लिए पूरी तरह से राज्य सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा. हमारी निश्चित राय है कि पूरा अध्यादेश भारत के संविधान के आर्टिकल 243E और 243K के प्रावधानों के खिलाफ (अल्ट्रा वायर्स) है. हमारी इस राय की पुष्टि कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के ‘प्रोफेसर बी. के. चंद्रशेखर और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य’ (AIR 1999 Karn 461) मामले में दिए गए फैसले से होती है.
सुनवाई के दौरान एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल ने बताया कि इसी तरह का विवाद P.I.L. नंबर 559/2026 (आशीष कुमार सिंह बनाम यू.पी. राज्य और अन्य) में भी चल रहा है, जिसमें राज्य का पक्ष यह था कि चूंकि यू.पी. सरकार ने O.B.C. कैटेगरी से जुड़े आरक्षण के पहलुओं को तय करने के लिए O.B.C. कमीशन नियुक्त किया है, इसलिए जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव नहीं कराया जा सकता, क्योंकि आरक्षण पर फैसला इन चुनावों का ही हिस्सा होगा.
कोर्ट ने कहा कि यह हैरानी की बात है कि यू.पी. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिट-C नंबर 981/2019 (विकास किशन राव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य) मामले में दिए गए कुछ निर्देशों के तहत O.B.C. कमीशन नियुक्त किया था, लेकिन आज तक O.B.C. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है.
राज्य चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने कहा कि वोटर लिस्ट 10.06.2026 को जारी की जा चुकी है इसलिए वे चुनाव कराने की स्थिति में हैं और राज्य सरकार को चुनाव कराने के लिए जरूरी लॉजिस्टिक्स उपलब्ध कराने हैं लेकिन राज्य सरकार के इस रुख के कारण चुनाव कराने में बाधा आ रही है.
कोर्ट ने कहा कि 25.05.2026 और 26.05.2026 के प्रधान को Receiver तैनात करने का प्रावधान का विवादित आदेशों को देखने से यह साफ है कि ये आदेश 1947 के एक्ट की धारा 12(3-A) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जारी किए गए थे, जिसे असंवैधानिक माना गया है और इसलिए ये आदेश अमान्य हैं.
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को O.B.C. आयोग को एक पक्ष के तौर पर शामिल करने की इजाजत दे दी. यह देखते हुए कि प्रधानों को Receiver के तौर पर नियुक्त करने के विवादित आदेश अमान्य हैं, प्रधानों को Receiver के तौर पर काम जारी रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती. राज्य सरकार को आखिरी मौका देते हुए उन्हें एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने की इजाजत दी गयी जिसमें O.B.C. आयोग की रिपोर्ट और अन्य विवरण जिसमें साफ तौर पर उस समय-सीमा का जिक्र हो जिसके भीतर चुनाव कराए जाएँगे का डिटेल शेयर करना होगा.
कोर्ट ने कहा कि आदेश का पालन न करने पर प्रिंसिपल सेक्रेट्री पंचायत राज विभाग उत्तर प्रदेश को अगली तय तारीख पर कोर्ट के सामने पेश होना होगा. उन्हें व्यक्तिगत हलफनामे में उन्हें यह साफ करना होगा कि किन हालात में उन्होंने प्रधानों को Receiver के तौर पर काम जारी रखने का विवादित आदेश जारी किए, जबकि प्रधानों को Receiver के तौर पर काम जारी रखने के विवादित आदेश में बताई गई धाराओं को इस कोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही असंवैधानिक करार दे चुकी है. ऐसा न करने पर यह माना जा सकता है कि उन्होंने इस कोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले की प्रथम दृष्टया अवमानना की है. कोर्ट इस मामले में 13 जुलाई को दिन में दो बजे सुनवाई करेगी.
WRIT – C No. 23749/2026; ARVIND RATHORE V/s State of U.P. & 3 Others