याचिकाकर्ता के Defence पर ध्यान न देना और दोषी होने के निष्कर्षों की पुष्टि करते समय कारण दर्ज न करना दर्शाता है कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण की तरफ से दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मोहनलालगंज के तत्कालीन एसडीएम को दी बड़ी राहत, कार्रवाई को रद किया, सभी लाभ तीन महीने में देने के आदेश

बेंच ने प्रतिवादियों को आदेश दिया है कि वे याचिकाकर्ता को सेवा से जुड़े सभी लाभ बहाल करें, जिसमें रोकी गई सालाना वेतन वृद्धि की बहाली, वेतन का फिर से निर्धारण, उससे जुड़े मौद्रिक लाभ और सेवा से जुड़े अन्य सभी लाभ शामिल होंगे, मानो सजा के ये आदेश कभी जारी ही नहीं किए गए थे. इसके लिए सक्षम अअधिकारी को कोर्ट ने 30 दिन का मौका दिया है.
यह रिट याचिका संतोष कुमार सिंह की तरफ से दाखिल की गयी थी जो कार्रवाई किये जाने के समय मोहनलालगंज तहसील में एसडीएम के रूप में तैनात थे. याचिका में राज्य सरकार की तरफ से जारी किये गये आदेश को रद करने, सेवा से जुड़े सभी लाभों (रोके गए इंक्रीमेंट सहित) को बहाल करने करने की मांग की गयी थी.
तथ्यों के अनुसार लखनऊ के डीएम ने 13.12.2018 के पत्र के जरिए याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की. याचिकाकर्ता उस समय लखनऊ के मोहनलालगंज में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात थे और उन पर लखनऊ जिले की मोहनलालगंज तहसील के निगोहा परगना के भसंडा गांव में आवास स्थल के आवंटन में कथित अनियमितताएं करने का आरोप था. उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियमावली, 1999 के नियम 7 के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई और लखनऊ डिवीजन के कमिश्नर को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया.
प्रक्रिया शुरू होने के बाद याचिकाकर्ता को चार्ज शीट दी गयी तो उसने इसका जवाब (Defence) दिया. इसके बाद जांच अधिकारी ने राज्य सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी. रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता पर लगाए गए दो आरोपों में से एक सही पाया गया था. इसके बाद राज्य सरकार ने जांच रिपोर्ट की एक कॉपी आरोपी याचिकाकर्ता को भेजी और उस पर उसका पक्ष (Defence) मांगा.
चार्ज-शीट, जांच रिपोर्ट और ‘कारण बताओ नोटिस’ के जवाब में याचिकाकर्ता द्वारा दी गई Defence पर विचार करने के बाद पाया गया कि याचिकाकर्ता ने गांव भासंडा में आवास के लिए जमीन आवंटित करने के लिए नायब तहसीलदार और कानूनगो द्वारा तैयार की गई लिस्ट को बिना लाभार्थियों की पात्रता और अपात्रता की ठीक से जांच किए मंजूरी दी थी.
याचिकाकर्ता ने जमीन प्रबंधन समिति द्वारा पास किए गए प्रस्ताव को बिना ठीक से जांचे मंजूरी दी जो उनके सरकारी कर्तव्यों के पालन में ढिलाई और लापरवाही को दिखाता है. सक्षम अधिकारी ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में कोई नई बात रिकॉर्ड पर नहीं रखी थी.

इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला गया कि याचिकाकर्ता ने कदाचार किया है. इसके बाद, 30.06.2025 के पत्र के जरिए राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की सहमति लेकर राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता पर एक सालाना इंक्रीमेंट को हमेशा के लिए रोकने और निंदा की सजा लगाई. सजा के आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के सामने अपना पक्ष (Defence) रखा. हालाँकि, उस Defence को खारिज कर दिया गया और सजा के आदेश को बरकरार रखा गया.
याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जांच के लिए कोई तारीख, समय या जगह तय नहीं की गई थी और न ही कोई मौखिक जांच की गई थी. पूरी जांच प्रक्रिया ‘उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1999’ के प्रावधानों के खिलाफ जाकर की गई थी. याचिकाकर्ता ने जांच रिपोर्ट पर अपना जवाब (Defence) सौंप दिया, तो राज्य सरकार ने जांच कार्यवाही में उस पर लगे आरोपों के संबंध में राजस्व बोर्ड की राय मांगी.
राजस्व बोर्ड ने रिकॉर्ड और 18.05.1972 के सरकारी आदेश की जांच करने के बाद राय दी कि याचिकाकर्ता संतोष कुमार सिंह ने जरूरी सावधानी बरती थी और कुछ अनियमितताओं का पता चलते ही उन्होंने आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू कर दी थी. बोर्ड ने यह भी राय दी कि इस मामले में याचिकाकर्ता की कोई गलत मंशा या दुर्भावना नहीं थी.
देखा गया कि आवास स्थलों के आवंटन से संबंधित लीज डीड को रद्द करने की कार्यवाही अतिरिक्त आयुक्त के समक्ष केस नंबर 12/2008-09 में विचाराधीन थी. इसलिए, राजस्व बोर्ड ने राय दी कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही तभी शुरू करना उचित होगा जब संबंधित अदालत उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज करे. अंत में, राजस्व बोर्ड ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को संतोषजनक पाया.
इसके विपरीत स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि जांच कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता ने कभी भी Defence में मौखिक सुनवाई का अनुरोध नहीं किया. इसलिए मौखिक सुनवाई देने का कोई अवसर ही नहीं आया. सही समय पर मौखिक सुनवाई का अनुरोध न करने के कारण, याचिकाकर्ता अब यह तर्क नहीं दे सकता कि उसे मौखिक सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया या इस वजह से जांच कार्यवाही दूषित हो गई है.
जांच रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया है कि सुपरवाइजरी/रिव्यूइंग अथॉरिटी होने के बावजूद, आरोपी अधिकारी-याचिकाकर्ता ने अपने नीचे काम करने वाले राजस्व अधिकारियों की सिफारिशों/टिप्पणियों को बिना किसी स्वतंत्र जांच-पड़ताल के, जैसा था वैसा ही मंजूरी दे दी. ऐसा व्यवहार 19.05.1972 के सरकारी आदेश के खिलाफ है.
तथ्यों को परखने और दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद बेंव ने माना कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि जांच अधिकारी द्वारा कोई मौखिक जांच नहीं की गई थी. रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि जांच अधिकारी के निष्कर्ष पूरी तरह से रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजी सामग्री पर आधारित हैं. इसमें किसी गवाह से पूछताछ नहीं की गई और न ही याचिकाकर्ता को विभाग द्वारा पेश किए गए गवाहों से Defence में जिरह करने का मौका दिया गया.
संबंधित कानूनी प्रावधान: उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियमावली, 1999 का नियम 7 का संबंधित हिस्सा: “7. बड़ी सजा देने की प्रक्रिया. किसी सरकारी कर्मचारी पर कोई बड़ी सजा लगाने से पहले, निम्नलिखित तरीके से जांच की जाएगी:
- (i) अनुशासनात्मक अधिकारी खुद आरोपों की जांच कर सकता है या आरोपों की जांच के लिए अपने अधीन किसी अधिकारी को जांच अधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकता है.
- (ii) दुर्व्यवहार की वे बातें जिन पर कार्रवाई करने का प्रस्ताव है, उन्हें निश्चित आरोप या आरोपों के रूप में लिखा जाएगा, जिसे आरोप-पत्र (चार्ज-शीट) कहा जाएगा. आरोप-पत्र को अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा मंज़ूरी दी जाएगी
- बशर्ते कि जहां नियुक्ति प्राधिकारी राज्यपाल हों, वहां संबंधित विभाग के प्रधान सचिव या सचिव, जैसा भी मामला हो, द्वारा आरोप-पत्र को मंजूरी दी जा सकती है.
- (iii) आरोप इतने सटीक और स्पष्ट होने चाहिए कि आरोपी सरकारी कर्मचारी को अपने खिलाफ तथ्यों और परिस्थितियों का पर्याप्त संकेत मिल सके. प्रस्तावित दस्तावेजी सबूत और उन्हें साबित करने के लिए प्रस्तावित गवाहों के नाम, साथ ही मौखिक सबूत (यदि कोई हों), चार्ज-शीट में बताए जाने चाहिए.
- (iv) आरोपी सरकारी कर्मचारी को एक तय तारीख पर व्यक्तिगत रूप से अपना लिखित बचाव (Defence) बयान देना होगा. यह तारीख चार्ज-शीट जारी होने की तारीख से कम से कम 15 दिन बाद की होनी चाहिए. उसे यह भी बताना होगा कि क्या वह चार्ज-शीट में बताए गए किसी गवाह से जिरह (Defence में cross-examine) करना चाहता है और क्या वह अपने Defence में सबूत देना या पेश करना चाहता है. उसे यह भी बताया जाएगा कि यदि वह तय तारीख पर पेश नहीं होता है या लिखित बयान (Defence) दाखिल नहीं करता है, तो यह मान लिया जाएगा कि उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है और जांच अधिकारी एकतरफा जांच पूरी करने के लिए आगे बढ़ेगा.
- (v) चार्ज-शीट में बताए गए दस्तावेजी सबूतों की कॉपी और गवाहों की सूची व उनके बयानों के साथ, आरोपी सरकारी कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से या आधिकारिक रिकॉर्ड में दिए गए पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजी जाएगी. यदि चार्ज-शीट इस तरह से नहीं भेजी जा सकी, तो इसे व्यापक प्रसार वाले दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित करके भेजा जाएगा:
- जहां दस्तावेजी सबूत बहुत ज्यादा हों वहां चार्ज-शीट के साथ उनकी कॉपी देने के बजाय आरोपी सरकारी कर्मचारी को जांच अधिकारी के सामने उन्हें देखने की अनुमति दी जाएगी.
- (vi) जहां आरोपी सरकारी कर्मचारी पेश होता है और आरोपों को स्वीकार करता है, वहां जांच अधिकारी ऐसी स्वीकृति के आधार पर अनुशासनात्मक प्राधिकरण को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा.
- (vii) जहां आरोपी सरकारी कर्मचारी Defence देता है और आरोपों से इनकार करता है, वहां जांच अधिकारी चार्ज-शीट में प्रस्तावित गवाहों को बुलाएगा और आरोपी सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी में उनके मौखिक बयान दर्ज करेगा; आरोपी कर्मचारी को ऐसे गवाहों से Defence में जिरह करने का मौका दिया जाएगा. सबूत दर्ज करने के बाद जांच अधिकारी उन मौखिक सबूतों को बुलाएगा और दर्ज करेगा जिन्हें आरोपी सरकारी कर्मचारी ने अपने लिखित बयान में अपने बचाव में पेश करने की इच्छा जताई थी:
- बशर्ते कि जांच अधिकारी लिखित में कारण दर्ज करके किसी गवाह को बुलाने से इनकार कर सकता है.
- (viii) जांच अधिकारी, ‘उत्तर प्रदेश विभागीय जांच (गवाहों की उपस्थिति और दस्तावेजों को पेश करने के लिए बाध्य करना) अधिनियम, 1976’ के प्रावधानों के अनुसार, गवाही देने के लिए किसी भी गवाह को बुला सकता है या किसी व्यक्ति से अपने सामने दस्तावेज पेश करने के लिए कह सकता है.
- (ix) जांच अधिकारी सच्चाई का पता लगाने या आरोपों से संबंधित तथ्यों का उचित सबूत प्राप्त करने के उद्देश्य से, किसी भी समय किसी गवाह या आरोपी व्यक्ति से कोई भी सवाल पूछ सकता है.
- (x) यदि आरोपी सरकारी कर्मचारी को नोटिस मिलने या तारीख की जानकारी होने के बावजूद, जांच के लिए तय तारीख पर या कार्यवाही के किसी भी चरण में वह उपस्थित नहीं होता है, तो जांच अधिकारी एकतरफा (जांच आगे बढ़ाएगा) ऐसे मामले में, जांच अधिकारी आरोपी सरकारी कर्मचारी की अनुपस्थिति में चार्ज-शीट में उल्लिखित गवाहों के बयान दर्ज करेगा.
- (xi) अनुशासनात्मक प्राधिकरण, यदि आवश्यक समझे, तो एक आदेश द्वारा किसी सरकारी कर्मचारी या कानूनी व्यवसायी को “प्रस्तुतकर्ता अधिकारी” के रूप में नियुक्त कर सकता है, जो उसकी ओर से आरोप के समर्थन में मामला प्रस्तुत करेगा.
- (xii) सरकारी कर्मचारी अपनी ओर से मामला प्रस्तुत करने के लिए किसी अन्य सरकारी कर्मचारी की सहायता ले सकता है, लेकिन इस उद्देश्य के लिए किसी कानूनी व्यवसायी को नियुक्त नहीं कर सकता, जब तक कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण द्वारा नियुक्त प्रस्तुतकर्ता अधिकारी स्वयं एक कानूनी व्यवसायी न हो और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए प्राधिकरण इसकी अनुमति न दे.
Defence प्रस्तुत करने का यह नियम निम्नलिखित मामलों में लागू नहीं होगा:-
- (1) जहां किसी व्यक्ति पर ऐसे आचरण के आधार पर कोई बड़ी सजा लगाई जाती है जिसके कारण उसे आपराधिक आरोप में दोषी ठहराया गया हो
- (ii) जहां अनुशासनात्मक प्राधिकरण इस बात से संतुष्ट हो (और इसका कारण लिखित रूप में दर्ज करे) कि इन नियमों में दिए गए तरीके से जांच करना उचित रूप से संभव नहीं है
- (iii) जहाँ गवर्नर को यह यकीन हो जाए कि राज्य की सुरक्षा के हित में, इन नियमों में बताए गए तरीके से जाँच करना उचित नहीं है.”
सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्टेट ऑफ यूपी बनाम सरोज कुमार सिन्हा’ (2010) 2 SCC 772 मामले में, 1999 के नियमों के नियम 7 की व्याख्या करते हुए यह कहा है कि जहाँ आरोपों को साबित करने के लिए कोई मौखिक सबूत पेश किए बिना पूरी जाँच प्रक्रिया चलाई जाती है तो वह जाँच प्रक्रिया दोषपूर्ण हो जाती है.
इस मामले में, यह माना गया है कि कोई मौखिक जाँच नहीं की गई थी. जाँच करने के लिए कोई तारीख, समय या जगह तय नहीं की गई थी. नतीजतन, पूरी अनुशासनात्मक कार्यवाही खराब हो गई है, क्योंकि इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और 1999 के नियमों के तहत बताई गई अनिवार्य प्रक्रिया की पूरी तरह से अनदेखी करके किया गया था.
याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए जवाब/अभ्यावेदन (Defence) पर अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने ठीक से विचार नहीं किया है. विवादित सजा के आदेश को देखने से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने Defence में जो खास बचाव पेश किया था, उस पर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है. विवादित आदेश पूरी तरह से बिना कारण बताए दिया गया है, अस्पष्ट है और इसमें कोई वजह नहीं दी गई है.
यह भी साफ है कि सज़ा के आदेश के पैराग्राफ 7 तक, अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने केवल चार्ज-शीट, जाँच रिपोर्ट और याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए जवाब की बातों को दोहराया है. कोई स्वतंत्र विश्लेषण या निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है. केवल अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने अपने निष्कर्ष दर्ज किए हैं. उनमें भी, याचिकाकर्ता द्वारा किए गए खास Defence पर कोई विचार नहीं किया गया है और न ही उसे खारिज करने का कोई कारण बताया गया है.
कोर्ट ने माना कि ऐसा भी लगता है कि विवादित सजा का आदेश बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की 19.04.2022 की राय का जिक्र किए बिना ही जारी किया गया है. बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की राय एक अहम जानकारी थी जो सीधे तौर पर याचिकाकर्ता की गलती से जुड़ी थी. इस बात पर आगे विचार न करने से सजा का विवादित आदेश और भी दोषपूर्ण हो जाता है. कोर्ट ने यह भी देखा कि विवादित आदेश में अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी करने में अत्यधिक और बिना किसी कारण के प्रशासनिक देरी हुई है.
अनुशासनात्मक कार्यवाही 13.02.2019 को शुरू की गई थी. 27.02.2021 को जांच रिपोर्ट के खिलाफ याचिकाकर्ता का अंतिम पक्ष रखे जाने के बाद भी मामला बिना किसी उचित कारण के लंबित रहा. राज्य सरकार लगभग चार साल तक मामले पर कोई कार्रवाई नहीं करती और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की राय केवल जून 2025 में मांगी. इसके बाद सजा का अंतिम आदेश 10.09.2025 को जारी किया गया.
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ‘मध्य प्रदेश राज्य बनाम बानी सिंह’ (1990 Supp (1) SCC 738) और ‘पी.वी. महादेवन बनाम मैनेजिंग डायरेक्टर, तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड’ ((2005) 6 SCC 636) के मामलों में दिये गये आदेश का भी जिक्र किया जिसमें अनुशासनात्मक कार्यवाही में लंबी और बिना वजह की देरी की आलोचना की है और कहा है कि ऐसी देरी से आरोपी कर्मचारी को गंभीर नुकसान होता है.
कोर्ट ने कहा कि वकीलों की दलीलों पर विचार करने और रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच करने के बाद, यह कोर्ट पाती है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही में प्रक्रियात्मक कमियां हैं जो जांच की जड़ पर ही प्रहार करती हैं. जांच अधिकारी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 के नियम 7 का पूरी तरह से उल्लंघन करती है. इस मुद्दे पर कानून अब नया या अनसुलझा नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्टेट ऑफ यूपी बनाम सरोज कुमार सिन्हा’ (2010) 2 SCC 772 और हाल ही में ‘सत्येंद्र सिंह बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश और अन्य’ 2024 SCC OnLine SC 3325 में साफ तौर पर कहा है कि एकतरफा जांच में भी विभाग के लिए आरोपों के समर्थन में सबूत पेश करना और जांच अधिकारी के लिए गवाहों के बयान दर्ज करना जरूरी है, ताकि आरोपी कर्मचारी पर लगाए गए आरोपों को साबित किया जा सके.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि दस्तावेजी सबूत, जब तक कि उन्हें कानून के अनुसार साबित न किया जाए, अकेले दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकते. मौजूदा मामले में जांच की कार्यवाही कानून के इन स्थापित सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी करके की गई है.
अर्ध-न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करने वाले अनुशासनात्मक अधिकारी की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह आरोपी कर्मचारी द्वारा पेश किए गए Defence पक्ष पर विचार करे और उसे स्वीकार या अस्वीकार करते समय कारण बताए. कारणों को दर्ज करना निष्पक्ष निर्णय लेने का एक जरूरी हिस्सा है और यह शक्ति के मनमाने इस्तेमाल के खिलाफ एक सुरक्षा कवच का काम करता है. मौजूदा मामले में चार्ज-शीट, जांच रिपोर्ट और याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण को यांत्रिक रूप से दोहराने के अलावा, विवादित आदेश में कोई स्वतंत्र चर्चा या निष्पक्ष विश्लेषण नहीं दिखता है.
बेंच ने किया कमेंट
यह कोर्ट याचिकाकर्ता की ओर से बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की राय के बारे में दी गई दलील में भी दम पाता है. रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी से पता चलता है कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने संबंधित रिकॉर्ड और लागू सरकारी आदेशों की जांच करने के बाद यह राय दी थी कि याचिकाकर्ता ने उचित सावधानी बरती थी और कथित अनियमितताओं का पता चलते ही सुधारात्मक कदम उठाए थे.
बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता की कोई बुरी नीयत या छिपा हुआ मकसद नहीं था और उसके स्पष्टीकरण को संतोषजनक माना. ऐसी राय एक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक सबूत थी जिस पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अनुशासनात्मक प्राधिकरण को विचार करना चाहिए था. ऐसी सामग्री पर विचार न करने से निर्णय लेने की प्रक्रिया मनमानी हो जाती है और विवादित आदेश अमान्य हो जाता है.
बेंच ने अपने फैसले में किया जिक्र
प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के अलावा, आरोप की प्रकृति पर भी विचार किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप मुख्य रूप से अधीनस्थ राजस्व अधिकारियों द्वारा भेजी गई सिफारिशों पर मंजूरी देते समय पर्याप्त जांच न करने से संबंधित है.
अनुशासनात्मक प्राधिकरण द्वारा ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है कि याचिकाकर्ता को कथित लेनदेन से कोई व्यक्तिगत लाभ हुआ या उसने किसी बुरी नीयत से काम किया. भ्रष्टाचार, बेईमानी, गबन या आधिकारिक पद के दुरुपयोग का भी कोई निष्कर्ष नहीं है. ऐसी परिस्थितियों में निर्धारित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. एक बार जब अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है, तो याचिकाकर्ता पर लगाई गई सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता है.
- (i)मौखिक पूछताछ का बिल्कुल न होना
- (ii) स्वीकार्य सबूतों से आरोपों को साबित न कर पाना
- (iii) Defence का सही मौका न देना
- (iv) याचिकाकर्ता के विस्तृत Defence पर विचार न करना
- (v) राजस्व बोर्ड की राय पर विचार न करना
- (vi) सजा के आदेश का बिना कारण बताए और यांत्रिक तरीके से जारी होना
- (vii) अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी करने में बहुत ज्यादा और बिना वजह देरी
- इस कोर्ट को इस बात में कोई शक नहीं छोड़ता कि सजा का यह आदेश न्यायिक जांच में टिक नहीं सकता.