Illegal detention, शांति भंग में पुलिस की मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त, लगाया 25000 रुपये प्रतिदिन हर्जाना, अफसरों की सैलरी से हर्जाना राशि की वसूली की छूट
हाई कोर्ट ने कहा, किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में लेने के बाद उसे शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने का वचन देते हुए एक पर्सनल बॉन्ड भरना होगा, जमानतदार की जरूरत नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक Illegal detention में रखा जाता है तो उसे 25,000 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देना होगा. Illegal detention की यह राशि विभागीय कार्यवाही में दोषी पाए जाने पर संबंधित मजिस्ट्रेट और/या पुलिस अधिकारी के वेतन से काटी जाएगी. कोर्ट ने प्रदेश के डीजीपी को सभी जिला पुलिस प्रमुखों को सर्कुलर जारी कर अनुपालन कराने का निर्देश दिया है. यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने अधिवक्ता चंदर पाल सिंह और एक अन्य की याचिका पर दिया है.
दो जजों की बेंच ने कहा कि राज्य सरकार ने 2021 में ही एक नीतिगत निर्णय जारी कर दिया है. इसके बावजूद राज्य के पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट बहुत गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम कर रहे हैं. वे शांति भंग होने से रोकने के लिए अपने सामने लाए गए लोगों को कई दिनों तक Illegal detention में रखते हैं और जेल भेज देते हैं. ऐसे Illegal detention के लिए ₹25,000/- का मुआवजा राज्य सरकार ने 2021 में तय किया था. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधान लागू होने के बाद, राज्य सरकार को एक नई नीति बनाकर इस राशि को बढ़ाना चाहिए.
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता चंदर पाल सिंह इस न्यायालय के एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं और याचिकाकर्ता संख्या 2 उनकी पत्नी हैं. दोनों दिव्यांग हैं. 13.2.2026 को अपनी भतीजी की शादी में शामिल होने के लिए वे अपने पैतृक गांव, जावली गाजियाबाद गए थे. दुर्भाग्य से 17.02.2026 को याचिकाकर्ता के बहनोई का निधन हो गया. याचिकाकर्ता ने 22.2.2026 को प्रयागराज लौटने के लिए ट्रेन का टिकट बुक कराया था, लेकिन उसी दिन सुबह 11:00 बजे टीलामोड़ पुलिस स्टेशन की पुलिस उन्हें जबरदस्ती ले गई.
Illegal detention के बाद उन्हें 24 घंटे के भीतर किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया जो कानून का उल्लंघन है. उन्हें सिर्फ असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस, शालीमार गार्डन, जिला गाजियाबाद के सामने पेश किया गया और शांति बनाए रखने के लिए Illegal detention पर बॉन्ड भरने की अनुमति दिए बिना 151 सीआरपीसी में जेल भेज दिया गया. उनके भतीजे के साथ पूरे दिन टीलामोड़ पुलिस स्टेशन की एक कोठरी में रखा गया.
23.2.2026 को ही उन्होंने B.N.S.S. की धारा 170, 126 और 135 के तहत 50,000 रुपये का बॉन्ड भरा. जमानत बॉन्ड भरने के बावजूद दोनों को जेल भेज दिया गया. हेबियस कॉर्पस रिट याचिका दायर होने और इस न्यायालय द्वारा एजीए को निर्देश मांगने के मौखिक आदेश के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया. उनके भतीजे को अगले दिन रिहा किया गया.
कोर्ट ने Illegal detention पर रिट याचिका का निपटारा निम्नलिखित निर्देशों के साथ किया:-
- (i) राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि 23.03.2021 के नीतिगत निर्णय में उल्लिखित सीआरपीसी के प्रावधानों का सभी संबंधित अधिकारियों द्वारा सख्ती से पालन किया जाए.
- (ii) राज्य सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि नीतिगत निर्णय के पैराग्राफ 12 को सख्ती से लागू किया जाए, जिसे दोहराते हुए नीचे दिया गया है:
- 1) भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन करते हुये किसी व्यक्ति की Illegal detention किये जाने के लिए अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा जांच में दोषी पाये जाने पर उत्तरदायी अधिकारी के विरूद्ध उप्र सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999, दि आल इंडिया सर्विसेज (डिसिप्लीन एंड अपील) रूल्स, 1969 एवं उ०प्र० अधीनस्थ श्रेणी के पुलिस अधिकारियों की (दण्ड और अपील) नियमावली, 1991 (यथा संशोधित) में संगत नियमों के अंतर्गत दण्डात्मक कार्यवाही की जायेगी.
- (2) अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट 03 माह में अथवा संगत नियमावली में यथा उल्लिखित समयानुसार प्रस्तुत की जायेगी.
- (3) यदि किसी नागरिक की Illegal detention प्रमाणित पायी जाती है तो पीड़ित व्यक्ति को 25,000/ रुपये की धनराशि का भुगतान मुआवजे के रूप में किया जायेगा.
- (iii) राज्य सरकार अपने नीतिगत फैसले के पैरा 12 को उत्तर प्रदेश राज्य में बड़े पैमाने पर प्रसारित होने वाले सभी राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में प्रकाशित करेगी और इसे पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में सभी ब्लॉक, तहसील मुख्यालयों, पुलिस स्टेशनों और जिला कलेक्ट्रेट परिसर में लोगों की नजर में आने वाली प्रमुख जगहों पर डिस्प्ले बोर्ड पर भी लगाएगी.
- (iv) इस आदेश की एक कॉपी राज्य सरकार द्वारा पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में सभी जिला-स्तरीय और तहसील-स्तरीय बार एसोसिएशनों को भेजी जाएगी.
- इस कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा इस आदेश की एक कॉपी उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को सख्ती से पालन करने के लिए भेजी जाए.
जब तक राज्य सरकार Illegal detention पर कोई नई नीति लागू नहीं करती गैर-कानूनी रूप से हिरासत में लिए गए और जेल में बंद लोगों की आजादी के अधिकार के खुलेआम उल्लंघन को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिये:-

(i) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता या सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में लेने के बाद उसे शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने का वचन देते हुए एक पर्सनल बॉन्ड भरना होगा. ऐसे बॉन्ड की राशि ₹20,000/- से अधिक नहीं होगी और इसके लिए किसी जमानतदारकी आवश्यकता नहीं होगी. यदि बॉन्ड की राशि बढ़ाई जाती है तो मजिस्ट्रेट को इसके कारण लिखित रूप में देने होंगे. हिरासत की तारीख पर यदि हिरासत में लिए गए व्यक्ति द्वारा बॉन्ड भरा जाता है तो उसे रिहा कर दिया जाएगा.
(ii) यदि आरोपी को उसी दिन मजिस्ट्रेट/पुलिस कमिश्नर के सामने पेश किए जाने पर शांति बनाए रखने के लिए पर्सनल बॉन्ड भरने से इनकार करता है तो जेल भेजने से पहले उसके इनकार को लिखित और ऑडियो-विजुअल माध्यम से दर्ज किया जाएगा. उसे उस तारीख पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा जो उसने पर्सनल बॉन्ड भरने से इनकार करते समय बताई थी ताकि वह अपनी चुनी हुई तारीख पर पर्सनल बॉन्ड पेश कर सके.
(iii) जिन मामलों में किसी व्यक्ति को बिना किसी उचित कारण के इस आदेश का उल्लंघन करते हुए 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत (Illegal detention) में रखा जाता है, तो राज्य सरकार द्वारा हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मुआवजे के तौर पर ₹25,000/- प्रति दिन की राशि का भुगतान किया जाएगा. यदि संबंधित मजिस्ट्रेट और/या पुलिस अधिकारी, या दोनों, चूक (Illegal detention) के लिए जिम्मेदार पाए जाते हैं, तो अनुशासनात्मक कार्यवाही करने और उनकी जवाबदेही तय करने के बाद, उनसे (यानी उनके वेतन से कटौती करके) उक्त राशि वसूल की जाएगी.
(iv). चूक (Illegal detention) के लिए प्रथम दृष्टया जिम्मेदार पाए गए मजिस्ट्रेट और/या पुलिस अधिकारी, या दोनों के खिलाफ, उनके संबंधित सेवा नियमों के अनुसार कर्तव्य में लापरवाही के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी.
यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को 22.3.2026 से 25.3.2026 तक अवैध रूप से जेल में हिरासत (Illegal detention) में रखा गया था और इस याचिका के दायर होने के बाद इस न्यायालय के मौखिक निर्देश पर उसे रिहा किया गया था. इसलिए वह Illegal detention के प्रति दिन ₹25,000/- की दर से ₹75,000/- के मुआवजे का हकदार है. राज्य सरकार को यह रकम याचिकाकर्ता नंबर 1 को छह हफ़्ते के अंदर देनी होगी.
इसके बाद राज्य सरकार इस रकम की वसूली असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस शालीमार गार्डन गाज़ियाबाद और/या एसएचओ थाना टीलामोड़, गाजियाबाद से करेगी या दोनों के खिलाफ तीन महीने के अंदर अनुशासनात्मक जाँच करके आनुपातिक रूप से वसूली की जाएगी. कमिश्नर ऑफ पुलिस कमिश्नरेट गाजियाबाद इस आदेश की अनुपालन रिपोर्ट 14.9.2026 को या उससे पहले इस कोर्ट में दाखिल करेंगे. इसी दिन केस में अगली सुनवाई होगी. ऐसा न कर पाने की स्थिति में, उन्हें अगली तय तारीख पर इस कोर्ट के सामने मौजूद रहना होगा.
कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की एक प्रति डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस उत्तर प्रदेश को भेजें ताकि वे पुलिस कमिश्नरेट या जिलों के सभी पुलिस प्रमुखों को सर्कुलर जारी करके जरूरी अनुपालन सुनिश्चित कर सकें. उन्हें इस संबंध में अगली तय तारीख तक अनुपालन का शपथ-पत्र भी दाखिल करना होगा.