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विशेष लोक अभियोजक की जनवरी 2026 में दर्ज एफआईआर में Arrest पर रोक, राज्य सरकार से जवाब तलब

विशेष लोक अभियोजक की जनवरी 2026 में दर्ज एफआईआर में Arrest पर रोक, राज्य सरकार से जवाब तलब

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा के एक विशेष लोक अभियोजक विनायक वशिष्ठ की Arrest पर अंतरिम रोक लगा दी है. जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ल की खंडपीठ ने यह आदेश दिया. याची आगरा जनपद मे विशेष लोक अभियोजक के रूप में कार्यरत हैं. उनके विरुद्ध थाना न्यू आगरा जिला आगरा में 12 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज किया गया, जिसमें भारतीय न्याय संहिता  की धाराएं 316(5), 318(4), 338, 336(3) और 340(2) लगाई गई हैं.

याची अधिवक्ता  ने तर्क दिया किया कि याची एनडीटी एस मामलों में बेहद निष्ठा और उत्कृष्टता से न्यायालय की सहायता करते रहे हैं. अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान वे कई ड्रग तस्करों का कोपभाजन का शिकार बने. दर्ज एफआईआर दुर्भावनापूर्ण है और उनकी निष्पक्ष कार्यप्रणाली को प्रभावित करने की नीयत से लिखाई गई है.

पुलिस विवेचना में सहयोग की शर्त पर Arrest पर रोक

अधिवक्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के सालिब केस के निर्णय का उल्लेख किया जिसमें कहा गया था कि जब किसी मामले में एफआईआर प्रतिशोध की भावना से दर्ज की गई हो तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह समस्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मामले की गहराई से पड़ताल करे. हाईकोर्ट ने विचारणीय मानते हुए शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया है.और राज्य सरकार को चार सप्ताह में प्रति-शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया.और पुलिस विवेचना में सहयोग की शर्त पर Arrest पर रोक लगा दी है.

तेंदुए को बचाने गई पुलिस पर हमला, आरोपियों की याचिका खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुशीनगर के उन चार आरोपियों की याचिका खारिज कर दी जिन पर तेंदुए को बचाने गई पुलिस टीम पर हमला करने का आरोप है. कुशीनगर जिले के जटाहा बाजार थाने में 8 मई 2026 को एफआईआर दर्ज किया गया. आरोप है कि राजन कुशवाहा सहित चार अभियुक्तों ने तेंदुए को रेस्क्यू करने गई पुलिस टीम पर हमला किया और उन्हें अपना सरकारी कर्तव्य निभाने से रोका.

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इस हमले में कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए. जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक की मांग की गई थी. पीठ ने  कहा कि जब जांच चल रही हो और तथ्य स्पष्ट न हों, तब हाईकोर्ट को गिरफ्तारी रोकने जैसे अंतरिम आदेश नहीं देने चाहिए. अभियुक्त चाहें तो अग्रिम जमानत के लिए सक्षम न्यायालय का रुख कर सकते हैं.

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