+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

कानून स्पष्ट है कि 1 बार Loan का सेटलमेंट हो जाने और एनओसी मिल जाने के बाद बैंक की कानूनी जिम्मेदारी है कि वह बिना किसी शर्त के टाइटल डॉक्यूमेंट वापस करे

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेसर्स आरएस कॉन्ट्रैक्टर्स एंड इंजीनियर्स के पार्टनर्स को राहत देने से किया इंकार, कहा, उनके पास DRT प्रभावी वैकल्पिक उपाय मौजूद

कानून स्पष्ट है कि 1 बार Loan का सेटलमेंट हो जाने और एनओसी मिल जाने के बाद बैंक की कानूनी जिम्मेदारी है कि वह बिना किसी शर्त के टाइटल डॉक्यूमेंट वापस करे

कानून स्पष्ट है कि एक बार Loan का सेटलमेंट हो जाने और एनओसी मिल जाने के बाद बैंक की कानूनी जिम्मेदारी है कि वह बिना किसी शर्त के टाइटल डॉक्यूमेंट वापस करे. चूँकि पार्टियों के बीच Loan के सेटिलमेंट को लेकर एक संभावित विवाद दिख रहा है, इसलिए हम उस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी ने मेसर्स आरएस कॉन्ट्रैक्टर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा अपने पार्टनर सुमित कुमार और 2 अन्य के माध्यम से दाखिल की गयी रिट पर कोई राहत देने से इंकार कर दिया है.

कोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी है और याचिकाकर्ताओं को DRT के सामने उचित एप्लीकेशन दायर करने की छूट दी है. यदि याचिकाकर्ता ऐसी कोई एप्लीकेशन दायर करते हैं तो ट्रिब्यूनल कानून के अनुसार और इस रिट याचिका में इस कोर्ट द्वारा की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना उस पर अपने गुण-दोष के आधार पर फैसला करेगा.

कोर्ट ने कहा कि हम इस बात से अवगत हैं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस कोर्ट को बहुत व्यापक शक्तियाँ मिली हुई हैं और उन शक्तियों के इस्तेमाल पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है लेकिन साथ ही हम कई फैसलों में विकसित किए गए खुद पर लगाई गई रोक के नियमों को नजरअंदाज नहीं कर सकते.

याचिकाकर्ताओं ने इस कोर्ट के सामने रिट अधिकार क्षेत्र के तहत याचिका दायर की है, जबकि उनके पास DRT के सामने एक प्रभावी वैकल्पिक उपाय मौजूद है. इस संबंध में कानून कई फैसलों में अच्छी तरह से स्थापित है, खासकर सत्यवती टंडन और बाफना मोटर्स के मामलों में, जिनमें यह सिद्धांत स्पष्ट किया गया है कि रिट याचिका दायर करने के बजाय पहले कानूनी उपाय का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

इसे भी पढ़ें….राज्य सरकार दुष्कर्म के परिणामस्वरूप जन्मे बच्चों के Independent rights की सुरक्षा के लिए अलग कानूनी ढांचा बनाने पर विचार करे

यह रिट याचिका मेसर्स आरएस कॉन्ट्रैक्टर्स एंड इंजीनियर्स के पार्टनर्स की तरफ से केनरा बैंक को यह निर्देश देने की मांग में दाखिल की गयी थी कि याचिकाकर्ताओं में से एक को मूल टाइटल डीड वापस करे जिसे उन्होंने मॉर्गेज के समय जमा किया था. इसके अलावा ‘नो ड्यूज़ सर्टिफिकेट’ जारी करने और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के के सर्कुलर के अनुसार टाइटल डीड जारी होने की वास्तविक तारीख तक 5,000 रुपये प्रति दिन का मुआवजा देने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी.

तथ्यों के अनुसार एक पार्टनरशिप फर्म ने केनरा बैंक से 70 लाख रुपये की वित्तीय सुविधा (Loan) ली थी. याचिकाकर्ता नंबर 2 Loan गारंटर बने और याचिकाकर्ता नंबर 3 ने अपनी संपत्ति को Loan के अगेंस्ट प्रतिवादी- केनरा बैंक के पास मूल टाइटल डीड जमा करके मॉर्गेज किया था.

इसे भी पढ़ें…. Family dispute को लेकर याचिका पर एकलपीठ ने पति याची पर लगाया 15 लाख रुपए हर्जाना, डबल बेंच ने लगायी रोक

वादीगण बैंक द्वारा दी गई वित्तीय सुविधा (Loan)  का भुगतान करने में विफल रहे और अपने बकाया के निपटान के लिए बैंक से संपर्क किया और Loan के वन टाइम सेटलमेंट का प्रस्ताव दिया. बैंक ने याचिकाकर्ताओं की अपील नहीं मानी और Loan के अगेंस्ट गिरवी रखी गई प्रॉपर्टी की नीलामी के लिए सेल नोटिस जारी करवा दिया. प्रॉपर्टी का फिजिकल कब्जा लेने के लिए सरफेसी एक्ट की धारा 14 के तहत एक आदेश भी हासिल कर लिया.

बैंक की इस कार्रवाई से नाराज होकर याचिकाकर्ताओं ने सरफेसी एक्ट की धारा 17 के तहत डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल लखनऊ में सिक्युरिटाइजेशन एप्लीकेशन दायर की. इस एप्लीकेशन पर सुनवाई के दौरान बैंक ने Loan के अगेंस्ट गिरवी रखी प्रॉपर्टी सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को 62 लाख रुपये में बेच दी. बोली लगाने वाला व्यक्ति रकम जमा कर रहा था उसी समय याचिकाकर्ताओं ने बैंक को 70 लाख रुपये का भुगतान करके मामला सुलझाने की इच्छा जताई.

इसे भी पढ़ें… सिर्फ 2 केस पर Gangster Act की कार्यवाही कानून के अनुरूप नहीं, हाई कोर्ट की प्रयागराज के आईजी को निर्देश सरकारी कामकाज में सतर्क और सावधान रहें

DRT ने 70 लाख रुपये में समझौता करने की याचिकाकर्ताओं की अपील पर विचार करते हुए 27.07.2023 के आदेश के जरिए याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह के भीतर Loan एमाउंट का 20 लाख रुपये जमा करने और बाकी 50 लाख रुपये दो महीने के भीतर जमा करने का निर्देश दिया. इस आदेश में उसी दिन दोपहर के बाद के सेशन में बदलाव किया गया.

इसमें DRT ने याचिकाकर्ताओं को न केवल Loan रकम का भुगतान करने का निर्देश दिया बल्कि बोली लगाने वाले खरीदार द्वारा बैंक के पास जमा की गई 25% रकम पर FDR के हिसाब से लागू अतिरिक्त ब्याज का भुगतान करने का भी निर्देश दिया.

याचिकाकर्ताओं ने 22.09.2023 को Loan रकम का 22,50,000 रुपये जमा किए लेकिन वे पूरी रकम का भुगतान नहीं कर पाए तो समय बढ़ाने के लिए एप्लीकेशन दायर की DRT ने पूरी रकम जमा करने की समय-सीमा 31.10.2023 तक बढ़ा दी और यह भी निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ता तय रकम का 60% जमा करते हैं तो बैंक उन्हें प्रॉपर्टी का फिजिकल कब्जा वापस सौंप देगा.

याचिकाकर्ताओं ने 11.10.2023 को आखिरी किस्त का भुगतान किया और नीलामी में प्रॉपर्टी खरीदने वाले की जमा की गई बोली की रकम पर ब्याज के तौर पर अतिरिक्त रकम भी चुकाई. बैंक ने इसे स्वीकार कर लिया और DRT के निर्देशों का पालन करते हुए याचिकाकर्ताओं को प्रॉपर्टी का फिजिकल कब्जा भी वापस सौंप दिया. बैंक DRT के उस आदेश से खुश नहीं था.

बैंक ने इस कोर्ट में आर्टिकल 227 के तहत मामला नंबर 5154/2023 के रूप में एक रिट याचिका दायर की, जिसे 11.10.2023 के आदेश से ‘प्रेस न किए जाने’ के आधार पर खारिज कर दिया गया. रेस्पॉन्डेंट-बैंक ने DRT के समय बढ़ाने वाले आदेश को चुनौती देते हुए एक और रिट याचिका (Writ-C No. 9217/2023) दायर की, लेकिन 19.10.2023 के आदेश से इसे भी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर खारिज कर दिया गया.

इसी पृष्ठभूमि में, याचिकाकर्ताओं ने RBI के सर्कुलर के अनुसार Loan की राशि का भुगतान कर दिये जाने पर ओरिजिनल टाइटल डीड  वापस पाने और मुआवजा पाने के लिए बैंक को एक रिप्रेजेंटेशन भेजा. रिमाइंडर भी भेजा गया लेकिन बैंक की ओर से कोई जवाब न मिलने पर यह रिट याचिका दायर की गई. 29.07.2024 के आदेश से रेस्पॉन्डेंट-केनरा बैंक को नोटिस जारी किया गया और उन्हें काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया गया.

बैंक ने अपने जवाबी हलफनामे में तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने रिट याचिका में जानबूझकर और धोखाधड़ी से तथ्यों को छिपाया है. बैंक के वकील के अनुसार याचिकाकर्ताओं के पक्ष में चार Loan खाते मंजूर किए गए थे. इनमें से केवल 1 Loan की राशि का भुगतान किया गया है. अन्य Loan खातों की सुरक्षित संपत्ति पर चार्ज (अधिकार) बना हुआ है और देनदारी भी बाकी है, इसलिए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में टाइटल डॉक्यूमेंट जारी नहीं किए जा सकते.

इसे भी पढ़ें… फाइनल रिपोर्ट में IO द्वारा बताए गए कारणों पर सावधानी से विचार किया जाना चाहिए, कोर्ट को उस खास सामग्री की पहचान करनी चाहिए जो उसे जांच एजेंसी के नतीजों से असहमत होने के लिए प्रेरित करती है

वकील ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता DRT द्वारा पारित आदेशों को जानबूझकर गलत तरीके से पेश कर रहे हैं और उनकी गलत व्याख्या कर रहे हैं. उनके अनुसार, दोनों आदेशों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि 70 लाख रुपये जमा करने से Loan खाते का पूरा और अंतिम निपटान हो जाएगा या टाइटल डॉक्यूमेंट अपने आप जारी हो जाएंगे.

बैंक के वकील के तर्क का याचिकाकर्ताओं के वकील ने खंडन किया. कहा कि बैंक ने शुरू में 70 लाख रुपये की क्रेडिट सुविधा मंजूर की थी. बाद में उस खाते को दो खातों में बाँट दिया गया. इसके बाद बैंक ने दो FITL खाते भी मंजूर किए. सेटलमेंट के समय बैंक ने सभी Loan खातों का सेटलमेंट कर दिया था. याचिकाकर्ताओं ने कुल 71,50,000 रुपये जमा किए थे, जबकि उस खाते में मंजूर की गई राशि केवल 20 लाख रुपये थी. बैंक चार लोन खातों की मंज़ूरी के बारे में इस कोर्ट को गुमराह कर रहा है. असल में सभी चार खातों का सेटलमेंट हो गया था.

कहा कि अगर उधार लेने वाले का एक खाता NPA हो जाता है, तो कानून के अनुसार सभी खातों को NPA घोषित किया जाना चाहिए. जब भी बैंक किसी एक खाते के लिए रिकवरी की कार्यवाही शुरू करता है, तो बैंक दूसरे NPA खातों के खिलाफ भी कार्यवाही करने के लिए बाध्य होता है.

इसे भी पढ़ें… आम सभा में चर्चा होने से पहले तक रोका जाय हाई कोर्ट में अधिवक्ताओं को Chamber Allotment की प्रक्रिया

इसकी पुष्टि बैंक द्वारा SARFAESI एक्ट, 2002 की धारा 13(2) के तहत जारी डिमांड नोटिस से की जा सकती है, जो सभी चार Loan खातों की कुल बकाया राशि के लिए एक ही डिमांड नोटिस था. उन्होंने कहा कि बैंक ने 27.07.2023 के सेटलमेंट आदेश के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की है और एक तरह से उक्त आदेश अब अंतिम हो चुका है.

बैंक के वकील ने मौखिक रूप से कहा कि DRT के आदेशों को रोकने वाली उनकी लगातार दो रिट याचिकाओं के खारिज होने के बाद, बैंक ने DRAT के समक्ष एक कानूनी अपील दायर की है और वह उक्त अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष विचाराधीन है.

कोर्ट ने मौजूदा रिट याचिका का निपटारा करने और पक्षों को अपीलीय ट्रिब्यूनल के पास भेजने का प्रस्ताव दिया था, जिसमें उन्हें गिरवी रखी गई संपत्ति के टाइटल डॉक्यूमेंट्स जारी करने सहित अपने सभी मुद्दों को अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष उठाने की छूट दी गई थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कहा कि मौजूदा रिट याचिका में मांगी गई राहत का फैसला DRT/DRAT द्वारा नहीं किया जा सकता है इसलिए इस रिट याचिका का फैसला इस कोर्ट द्वारा मेरिट के आधार पर किया जाए.

इसे भी पढ़ें… उत्तर प्रदेश में प्रधानों को ग्राम पंचायतों का administrators बनाना संविधान के अनुच्छेद 243-E का उल्लंघन

दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में हम रेस्पोंडेंट-केनरा बैंक के इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि याचिकाकर्ताओं का प्रस्तावित Loan सेटलमेंट चार लोन अकाउंट के लिए नहीं बल्कि एक Loan अकाउंट के लिए था. इसका सीधा कारण यह है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा चुकाई गई और रेस्पोंडेंट-बैंक द्वारा विधिवत स्वीकार की गई रकम, इन चारों Loan अकाउंट की कुल रकम के बराबर लगती है; इसे केवल एक लोन अकाउंट के सेटलमेंट के लिए चुकाई गई रकम नहीं माना जा सकता.

बेशक बैंक को DRT के उस आदेश से समस्या हो सकती है जिसमें Loan की कुल सेटलमेंट रकम और देय ब्याज के भुगतान के लिए समय को एकतरफा रूप से बढ़ाया गया था, क्योंकि हम देखते हैं कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तावित सेटलमेंट को DRT ने तब मंजूरी दी थी जब नीलामी में खरीदने वाले ने नीलामी की रकम का 25% हिस्सा चुका दिया था. यह कोर्ट DRT के आदेश की वैधता या अन्य पहलुओं पर विचार नहीं करना चाहता क्योंकि हमें बताया गया है कि ये मुद्दे DRAT के समक्ष अपील में लंबित हैं.

किसी भी स्थिति में, असल बात यह है कि आज की तारीख में बैंक और याचिकाकर्ताओं के बीच Loan को लेकर कम से कम दो विवाद मौजूद हैं:

  • (i) Loan के ब्याज की रकम, और
  • (ii) DRT द्वारा सेटलमेंट की रकम जमा करने की अवधि बढ़ाने की वैधता.

इन मामलों में तथ्यों से जुड़े पहलू शामिल हैं और इनका फैसला किसी उचित फोरम में ही किया जाना चाहिए उसके बाद ही मालिकाना हक का दस्तावेज जारी किया जा सकता है. इस कोर्ट के अनुसार ऐसा तब होता है जब बैंक ने NOC जारी कर दी हो या कम से कम सेटलमेंट को मानते हुए कोई लिखित जवाब दाखिल किया हो. हमें ऐसी कोई NOC या लिखित जवाब नहीं मिला. बल्कि बैंक ने इसके उलट रुख अपनाया है. हमारा नजरिया बिल्कुल साफ है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, यह कोर्ट तथ्यों से जुड़े किसी भी विवादित सवाल में नहीं पड़ना चाहता.

हम यह साफ करना चाहते हैं कि यह कोर्ट ऊपर बताए गए मुद्दों पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है और न ही ऐसा कोई संकेत देना चाहता है कि पार्टियों के बीच असल में ये मुद्दे मौजूद हैं. याचिकाकर्ताओं के पास यह तर्क देने का विकल्प हमेशा रहता है कि DRT ने समय सही ढंग से बढ़ाया था और Loan के ब्याज की रकम न केवल पार्टियों के बीच तय हो चुकी थी बल्कि उसका भुगतान भी किया जा चुका था, जिससे वे RBI की गाइडलाइंस के अनुसार तय समय-सीमा के भीतर टाइटल डॉक्यूमेंट्स वापस पाने के हकदार बन गए थे.

इसलिए, हमारी राय है कि दोनों मामलों में, ये मुद्दे असल में तथ्यों पर आधारित हैं और DRT/DRAT ही इनके लिए सही फोरम है इसलिए इस कोर्ट द्वारा इनका फैसला नहीं किया जा सकता.
बेंच ने किया कमेंट

कोर्ट ने कहा कि वैकल्पिक उपाय का इस्तेमाल करने का नियम विवेक पर आधारित है न कि कोई मजबूरी. लेकिन यह समझना मुश्किल है कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका पर विचार क्यों किया जाए जबकि याचिकाकर्ता कानून में दिए गए प्रभावी उपाय का लाभ उठा सकते हैं. SARFAESI एक्ट, 2002 की धारा 17(7) के तहत, किसी भी एप्लीकेशन के निपटारे के लिए ‘रिकवरी ऑफ डेट्स एंड बैंकरप्सी एक्ट, 1993’ (जिसे पहले RDBFI एक्ट कहा जाता था) के सभी प्रावधान ‘डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल’ (DRT) पर लागू किए गए हैं.

इसे भी पढ़ें… 90 दिन बाद भी नहीं दी गई जानकारी, हाईकोर्ट का यूपी सीएम से आग्रह : समय आ गया है कि बड़े Officers को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए

कोर्ट पाती है कि RDB एक्ट की धारा 19 जो ट्रिब्यूनल में एप्लीकेशन देने से संबंधित है उन विभिन्न शक्तियों को बताती है जो ट्रिब्यूनल के सामने दायर मामले के निपटारे में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को चलाने के लिए उसे दी गई हैं. इस संबंध में, हम धारा 19 की उप-धारा 25 में बताए गए अन्य प्रावधानों पर भी ध्यान देते हैं, जो इस प्रकार हैं:

“(25) ट्रिब्यूनल ऐसे आदेश दे सकता है और ऐसे निर्देश जारी कर सकता है जो उसके आदेशों को लागू करने, उसकी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी या उचित हों.”

हमें ऐसा कोई ठोस कारण नहीं दिखता कि याचिकाकर्ताओं ने टाइटल डॉक्यूमेंट्स (स्वामित्व के दस्तावेज) जारी करवाने के लिए DRT से संपर्क क्यों नहीं किया और सीधे इस कोर्ट का रुख किया, जबकि लोन का निपटारा पूरी तरह से हो चुका था और वह भी DRT के निर्देश पर. हमारी राय में DRT के पास इस संबंध में बैंक को टाइटल डॉक्यूमेंट्स जारी करने का निर्देश देने के लिए पर्याप्त क्षमता और अधिकार हैं.

इसे भी पढ़ें… Cockroach Janta Party के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच पहुंचे भाजपा नेता, कोर्ट ने कहा: यूपी राज्य से संबंधित कुछ नहीं, नहीं कर सकते सुनवाई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *