43 साल पुराने Rape Case में दोषी की सजा बरकरार, अपील इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की खारिज

यह मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के थाना Alau क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम नगला कादर का है. घटना 30 जून 1982 की दोपहर करीब 2:00 बजे की है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता (जो उस समय लगभग 12-15 वर्ष की नाबालिग थी) अपने खेतों में काम कर रहे अपने पिता लाला राम को पानी देने जा रही थी. जब वह आरोपी राम चरण (पुत्र सूबेदार) के खेत के पास से गुजर रही थी, तभी आरोपी ने उसे दबोच लिया और जबरन खींचकर खेत के पास एक खंदक में गिरा दिया.
पीड़िता ने अपनी इज्जत बचाने के लिए जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया और इज्जत बचाने की गुहार लगाई, तो पास के खेतों में काम कर रहे उसके पिता लाला राम, राम दत्त, हरी राम और जगदीश मौके पर दौड़ पड़े. उन्होंने अपनी आंखों से आरोपी को कुकर्म (Rape) करते हुए देखा. लोगों को अपनी तरफ आते देख आरोपी मौके से फरार हो गया, लेकिन पीड़िता के कपड़ों पर खून के धब्बे साफ पाए गए. घटना के तुरंत बाद Rape पीड़ित के पिता ने रतनापुर पुलिस चौकी में लिखित शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बाद में चार्जशीट कोर्ट में पेश की.
Rape मामले में विचारण न्यायालय ने 17 जनवरी 1983 को अपने फैसले में आरोपी राम चरण को दोषी करार देते हुए 5 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. इसी सजा और फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की थी, जो लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2026 में निस्तारित हुई.
Rape Case में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने कई तर्क दिए:
- गवाहों के बयानों में विरोधाभास: बचाव पक्ष ने दलील दी कि Rape पीड़िता और गवाहों के बयानों में कपड़ों के रंग और घटना के तौर-तरीकों को लेकर कुछ विरोधाभास था.
- पुरानी रंजिश: आरोपी के वकील ने दावा किया कि Rape पीड़िता के परिवार के साथ भूमि विवाद और पुरानी चुनावी/पारिवारिक रंजिश के कारण उसे झूठा फंसाया गया है.
- उम्र का विवाद: बचाव पक्ष का तर्क था कि मेडिकल रिपोर्ट और एक्स-रे के आधार पर पीड़िता की उम्र का निर्धारण गलत तरीके से किया गया है और वह बालिग थी. अपीलकर्ता ने इसे आपसी सहमति या अन्य मोड़ देने का भी प्रयास किया.
दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन करने के बाद कोर्ट ने अपीलकर्ता के सभी तर्कों को खारिज कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु स्पष्ट किए:
पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता: अदालत ने दोहराया कि यौन हिंसा (Rape) के मामलों में पीड़िता का बयान किसी सह-अपराधी जैसा नहीं होता, बल्कि वह एक घायल और पीड़ित गवाह होती है. यदि उसकी गवाही भरोसेमंद है, तो उसे अकेले ही सजा का आधार बनाया जा सकता है. इस मामले में Rape पीड़िता का बयान सुसंगत और अडिग रहा.
स्वतंत्र गवाह की पुष्टि: मौके पर मौजूद स्वतंत्र गवाह राम दत्त की गवाही ने अभियोजन पक्ष के दावों को पूरी तरह पुख्ता किया. उसका आरोपी या Rape पीड़िता से कोई पूर्व संबंध नहीं था, जिससे उसकी गवाही पूरी तरह निष्पक्ष साबित हुई.
चिकित्सकीय साक्ष्य: महिला अस्पताल मैनपुरी की अधीक्षक डॉ. उषा प्रधान ने अपनी मेडिकल जांच में पाया कि पीड़िता का हाइमन पूरी तरह ताजा चोट के साथ फटा हुआ था और ब्लीडिंग हो रही थी. मेडिकल रिपोर्ट ने भी अभियोजन के आरोपों की पुष्टि की.
रंजिश की थ्योरी खारिज: अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी माता-पिता अपनी नाबालिग बेटी के सम्मान और शारीरिक पवित्रता को दांव पर लगाकर किसी को झूठे मामले में नहीं फंसाएंगे. पुरानी रंजिश का दावा पूरी तरह आधारहीन पाया गया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के आरोपी राम चरण के खिलाफ धारा 376 आईपीसी (Rape) के तहत अपराध साबित कर दिया है. चूंकि निचली अदालत ने एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए जघन्य अपराध (Rape) के बावजूद केवल 5 साल की ही सजा सुनाई थी, जिसे अदालत ने पहले से ही काफी नरम माना, इसलिए सजा में किसी भी तरह की नरमी या कटौती करने से इनकार कर दिया गया.
कोर्ट ने अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए निचली अदालत के 17 जनवरी 1983 के कनविक्शन ऑर्डर को पूरी तरह बहाल कर दिया. साथ ही, यदि आरोपी जमानत पर है तो उसके मुचलके रद्द कर तुरंत हिरासत में लेने के निर्देश दिए गए ताकि वह अपनी शेष सजा काट सके.