यह निर्णय मुख्य रूप से याचिकाकर्ता दिलीप कुमार द्वारा दायर की गई रिट-सी संख्या 2022/2026 (दिलीप कुमार बनाम भारत संघ एवं अन्य) के मामले में आया है, जिसे न्यायालय ने मेरिट और विचारणीयता दोनों ही दृष्टियों से खारिज कर दिया है.
याची दिलीप कुमार, जो कि अंबेडकर नगर जिले के जहांगीरगंज नगर पंचायत के स्थायी निवासी हैं, ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी. उनकी मुख्य मांग थी कि अंबेडकर नगर जिले के विधानसभा क्षेत्रों (जैसे अकबरपुर, आलापुर, जलालपुर, कटेहरी और टांडा) के Delimitation और आरक्षण को संशोधित किया जाए.
याची का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 170(2) के तहत प्रत्येक राज्य में जनसंख्या और सीटों का अनुपात यथासंभव समान होना चाहिए. वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर अंबेडकर नगर जिले की कुल जनसंख्या और विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी के अनुपात का सही आकलन नहीं किया गया. आलापुर विधानसभा सीट को अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित करना और जलालपुर व अन्य क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण मनमाना तथा असंवैधानिक है. याचिकाकर्ता के अनुसार, कुछ क्षेत्रों के फेरबदल से चुनावी समरसता प्रभावित हुई है.
न्यायालय का रुख और मुख्य कानूनी बिंदु
1. Delimitation Commission के आदेशों की अंतिमता
खंडपीठ ने अपने निर्णय की शुरुआत में Delimitation Act, 2002 की धारा 10(2) का हवाला दिया. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Delimitation Commission के आदेशों को जब राजपत्र में प्रकाशित कर दिया जाता है, तो उन्हें कानून का बल प्राप्त हो जाता है. ऐसे आदेशों को सामान्य अदालतों में चुनौती देने की परिधि बेहद संकुचित है.
न्यायालय ने दोहराया कि न्यायिक समीक्षा केवल दो ही आधारों पर की जा सकती है:
विधायी क्षमता की कमी (Want of legislative competence), या
संविधान के भाग-III में प्रदत्त मौलिक अधिकारों या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन.
याचिकाकर्ता इनमें से कोई भी ठोस उल्लंघन साबित करने में असमर्थ रहे. न्यायालय ने कहा कि जनसंख्या के आंकड़ों का गणितीय फेरबदल और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का तकनीकी निर्धारण पूरी तरह से Delimitation आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है.
2. अत्यधिक देरी और विलंभ का सिद्धांत (Doctrine of Laches)
अदालत ने प्रतिवादियों (भारत संघ और अन्य) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ओ.पी. श्रीवास्तव और अधिवक्ता अनुपम श्रीवास्तव के इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार किया कि यह याचिका लगभग 20 साल की लंबी देरी के बाद लाई गई है.
चूंकि वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर Delimitation की अंतिम अधिसूचना 05 दिसंबर 2006 को जारी की गई थी और इसके आधार पर पिछले दो दशकों में कई विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं, इसलिए इस स्थापित चुनावी ढांचे को अचानक छिन्न-भिन्न करना जनहित के खिलाफ होगा. इसके अलावा, अब आगामी जनगणना की प्रक्रिया भी नजदीक है, जिससे भविष्य में नए Delimitation का मार्ग स्वतः प्रशस्त होगा.
3. पूर्ववर्ती निर्णयों और न्यायिक दृष्टांतों की महत्ता
न्यायालय ने अपने फैसले में हालिया और पूर्व के कई अहम मामलों का हवाला दिया:
जगदीश सिंह बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2026): इस मामले में हाल ही में स्पष्ट किया गया था कि आरक्षित सीटों के रोटेशन या तुलनात्मक जनसंख्या के आधार पर फेरबदल का अधिकार केवल संसद के पास है, और अदालतें रिट क्षेत्राधिकार के तहत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं.
चंद्रमणि प्रसाद बनाम भारत संघ (2017): इसमें भी स्पष्ट किया गया था कि जनगणना और आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़े आंकड़ों के सरकारी संशोधनों को कानूनन वैधता प्राप्त है.
किशोरचंद्र छगनलाल राठौड़ बनाम भारत संघ (2024) और मेघराज कोठारी मामले का संदर्भ देते हुए न्यायालय ने माना कि हालांकि संवैधानिक अदालतें न्यायिक समीक्षा कर सकती हैं, परंतु यह हस्तक्षेप सीमित दायरे में और उचित समय पर ही होना चाहिए, न कि दशकों बाद जब चुनावी व्यवस्था पूरी तरह स्थापित हो चुकी हो.
तर्कों को सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों को परखने के बाद कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए आधार न तो किसी मौलिक अधिकार का हनन साबित करते हैं और न ही इनमें विधायी अक्षमता दिखाई देती है. इसके अतिरिक्त, याचिका अत्यधिक विलंब से ग्रसित है. कोर्ट ने कानून सम्मत और तार्किक दृष्टिकोण अपनाते हुए रिट याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया. इस फैसले से उत्तर प्रदेश में दशकों से चले आ रहे परिसीमन और निर्वाचन क्षेत्रों के ढांचे को बड़ी कानूनी स्थिरता मिली है.