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राज्य या उसकी संस्थाओं से ठेके के तहत Outstanding amount की वसूली के लिए याचिका तभी दायर की जा सकती है, जब बकाया राज्य की ओर से स्वीकार किया गया हो

इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने सहकारी समिति की याचिका खारिज की, सक्षम वैधानिक मंच के समक्ष जाने की छूट

राज्य या उसकी संस्थाओं से ठेके के तहत Outstanding amount की वसूली के लिए याचिका तभी दायर की जा सकती है, जब बकाया राज्य की ओर से स्वीकार किया गया हो

राज्य या उसकी संस्थाओं से ठेके के तहत Outstanding amount की वसूली के लिए  याचिका तभी दायर की जा सकती है, जब बकाया रकम को राज्य की ओर से स्वीकार किया गया हो और उसके निर्धारण के लिए तथ्यों की विस्तृत जांच की जरूरत न हो. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पक्षकारों के बीच Outstanding amount से जुड़े तथ्य गंभीर रूप से विवादित हों और उन्हें साक्ष्यों के आधार पर तय करना जरूरी हो तो हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता.

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने Outstanding amount की वसूली के लिए एक सहकारी समिति की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया. फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कमेंट किया कि हर संविदात्मक बकाया की मांग वाली याचिका को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि मामला अनुबंध से जुड़ा है. लेकिन जहां Outstanding amount स्वीकार हो और तथ्यों की जांच की जरूरत न हो, वहां राज्य के खिलाफ याचिका पर विचार किया जा सकता है.

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मामला सहकारी समितियां अधिनियम, 1965 के तहत पंजीकृत एक सहकारी समिति से जुड़ा था, जिसे आयुष दवाओं के निर्माण का लाइसेंस प्राप्त था. समिति को मुख्य चिकित्सा अधिकारी, इलाहाबाद के कार्यालय से दवाओं की आपूर्ति का आदेश मिला था. समिति ने इसके तहत दवाओं की आपूर्ति की और दावा किया कि उसने करीब दो लाख रुपये जीएसटी के रूप में जमा किए. उसका कहना था कि आपूर्ति में उसकी ओर से कोई कमी या गलती नहीं थी.

Outstanding amount की मांग में पहले हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की

समिति के बिलों का भुगतान नहीं किया गया. इसके बाद उसने Outstanding amount की मांग में पहले हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की. अदालत ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लंबित प्रत्यावेदन पर आठ सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया. इसके बाद 8 अक्टूबर 2018 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बिलों (Outstanding amount) का भुगतान करने से इनकार किया. इस आदेश को चुनौती देते हुए समिति ने वर्तमान याचिका दाखिल की और Outstanding amount का भुगतान 18 प्रतिशत ब्याज के साथ करने का आदेश देने की मांग की.

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हाईकोर्ट ने पाया कि भुगतान रोकने के जिन कारणों का हवाला दिया गया, उनमें कई गंभीर तथ्यात्मक विवाद शामिल हैं. इनमें खरीद नीति का पालन हुआ या नहीं, आपूर्ति की गई दवाओं की गुणवत्ता कैसी थी, उनका इस्तेमाल हुआ या नहीं, दवाएं वापस की गई थीं या नहीं, संबंधित फर्म की सही पहचान क्या थी और दावा समय-सीमा के भीतर था या नहीं जैसे सवाल शामिल थे.

अदालत ने कहा कि इन सवालों का फैसला केवल हलफनामों के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसके लिए दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य की जरूरत पड़ सकती है और पक्षकारों के साक्ष्यों की जिरह भी आवश्यक हो सकती है.

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दवाओं की आपूर्ति में कमी, दोष या गुणवत्ता से जुड़े सवाल अनुबंध के तहत पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों से संबंधित हैं, जिनके लिए निजी कानून के तहत उपलब्ध उपाय अधिक उपयुक्त हैं.
पीठ ने कहा

याचिकाकर्ता ने चीफ फार्मासिस्ट के प्रमाणन पर भी भरोसा किया. अदालत ने पाया कि ऐसा कोई पत्र रिकॉर्ड पर पेश ही नहीं किया गया. अदालत ने कहा कि यदि प्रमाणन को मान भी लिया जाए, तब भी यह सवाल उठेगा कि क्या मुख्य फार्मासिस्ट को दवाओं की मात्रा और गुणवत्ता प्रमाणित करने का अधिकार है.

याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि जिन निर्माताओं को आपूर्ति के लिए सूचीबद्ध किया गया, उनका पंजीकरण समाप्त हो चुका था, जबकि उसका पंजीकरण जारी था. हाईकोर्ट ने कहा कि यह तथ्य अपने आप याचिकाकर्ता को भुगतान का वैधानिक अधिकार नहीं देता.

अदालत ने अपने पहले के फैसले एम्स अलास्का टेक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी हवाला दिया. उस मामले में कहा गया कि गैर-वैधानिक अनुबंध के तहत सामान की आपूर्ति के बकाये (Outstanding amount) की मांग मूल रूप से धन की वसूली का दावा है. सामान निर्धारित गुणवत्ता का था या नहीं और दावा समय-सीमा के भीतर है या नहीं जैसे सवाल संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में तय करना उचित नहीं है.

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पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम डॉली दास मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया. इसमें कहा गया कि संवैधानिक या वैधानिक अधिकार के अभाव में अनुबंध के उल्लंघन के कारण धन की वसूली (Outstanding amount) के लिए अनुच्छेद 226 का सहारा नहीं लिया जा सकता.

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का Outstanding amount भुगतान का अधिकार मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही तय हो सकता है. इसलिए अदालत ने अपने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से याचिकाकर्ता के दीवानी अदालत या किसी अन्य सक्षम वैधानिक मंच के समक्ष जाने का रास्ता बंद नहीं होगा. समिति मध्यस्थता सहित उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का सहारा ले सकती है.

“हर याचिका जिसमें ठेके के तहत Outstanding amount के भुगतान की मांग की गई हो, उसे खारिज नहीं किया जा सकता. यदि अनुबंध के तहत देय रकम स्वीकार की गई हो और तथ्यों का पता लगाने के लिए किसी जांच की आवश्यकता न हो, तो राज्य और उसकी संस्थाओं के खिलाफ ऐसी याचिका पर विचार किया जा सकता है. लेकिन जहां तथ्य इतने विवादित हों कि उन्हें दोनों पक्षों के साक्ष्य के बिना तय नहीं किया जा सकता, वहां रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.”
बेंच ने किया कमेंट

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