9 साल पुराने Rape केस में आरोपी बरी, अभियोजन नहीं साबित कर सका अपराध

अभियोजन के अनुसार, 27 सितंबर 1984 को जालौन के थाना कुथौंद अंतर्गत गांव जाखा में एक महिला मिट्टी लाने के बहाने पीड़िता को घर से बाहर ले गई थी. वहां आरोपी मेहंदी हसन ने पीड़िता को पकड़ लिया, मारपीट कर गला दबाया और उसके साथ Rape किया. घटना के बाद पीड़िता के पति ने 1 अक्टूबर 1984 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जालौन के समक्ष शिकायत दी, जिसके बाद 8 अक्टूबर 1984 को एफआईआर दर्ज हुई. यानी घटना के करीब 11 दिन बाद.
Rape पीड़िता की मेडिकल जांच घटना के 13 दिन बाद हुई थी
कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे, जैसे पीड़िता के पति के घर लौटने की तारीख को लेकर अलग-अलग बयान, और गवाह गंगा राम को घटना की जानकारी मिलने के तरीके पर एफआईआर व गवाही में अंतर. इसके अलावा, Rape पीड़िता की मेडिकल जांच घटना के 13 दिन बाद हुई थी और रिपोर्ट में कोई चोट नहीं पाई गई, जबकि Rape पीड़िता ने खुद को घायल होने की बात कही थी. जांच करने वाली डॉक्टर को भी अदालत में पेश नहीं किया गया, जिससे मेडिकल रिपोर्ट की साक्ष्यिक वैधता कमजोर पड़ गई.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्मल प्रेमकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य (2024) मामले का हवाला देते हुए कहा कि Rape पीड़िता का बयान शुरू से अंत तक सुसंगत होना चाहिए, और यदि उसमें विरोधाभास हों तो अन्य ठोस सबूतों की जरूरत होती है. इन खामियों के आधार पर कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषसिद्धि रद्द कर दी और अपील स्वीकार कर ली.
सीसीटीवी फुटेज न देने पर मेरठ पुलिस को फटकार, महिला की गिरफ्तारी अवैध करार, रिहाई का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरठ के लिसाड़ी गेट थाने में हुई एक महिला की गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है. जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह आदेश दिया.
अपनी भाभी की हत्या के आरोप में 12 जुलाई 2026 को शाम 4 बजे उसके घर से गिरफ्तार किया गया और 14 जुलाई को दोपहर करीब 1 बजे रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. बचाव पक्ष ने सीजेएम मेरठ के सामने थाने की सीसीटीवी फुटेज मांगने की अर्जी दी थी, जिसे मजिस्ट्रेट ने मंजूर भी किया, लेकिन पुलिस ने फुटेज पेश ही नहीं की.
कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने अदालत से तथ्य छिपाए गए .यह बहाना बनाया गया कि कैमरे खराब हैं और रिकॉर्डिंग नहीं हो रही, जबकि जनरल डायरी में मरम्मत के लिए भेजे गए रिमाइंडरों का जिक्र मिला. कोर्ट ने डीके बासु और परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय गिरफ्तारी संबंधी दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस ने इनका पालन नहीं किया.
गिरफ्तारी मेमो में भी खामियां पाई गईं समय में काट-छांट, गवाहों के हस्ताक्षर न होना और कई कॉलम खाली होना शामिल है. इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने गिरफ्तारी, हिरासत और रिमांड को अवैध बताते हुए सीजेएम मेरठ को आदेश दिया कि 24 घंटे के भीतर महिला को रिहा किया जाय.