हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(a) के तहत, Minor children की कस्टडी आम तौर पर माँ के पास होती है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मां को सौंपी Minor children की कस्टडी, पिता को भी मिलने और वीडियो कांफ्रेंसिंग से बातचीत की छूट

हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(a) के तहत, Minor children की कस्टडी आम तौर पर माँ के पास होती है, जब तक कि ऐसी परिस्थितियाँ न हों जो उसे कस्टडी पाने के अधिकार से वंचित करती हों. Minor children की Age अभी सिर्फ साढ़े तीन साल है लेकिन अपनी मां से ज्यादा अटैच है. बातचीत के दौरान, Minor children ने भी अपनी माँ के साथ रहने की इच्छा जताई. उसकी कम Age को देखते हुए, ऐसी पसंद को निर्णायक नहीं माना जा सकता, लेकिन इस कोर्ट के सामने उसके व्यवहार और तौर-तरीकों से साफ पता चला कि Minor children भावनात्मक रूप से अपनी माँ से जुड़ा हुआ है और उनके साथ सुरक्षित और सहज महसूस करता है.
यह परिस्थिति, हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(a) के तहत कानूनी धारणा के साथ मिलकर, इस कोर्ट को यह मानने के लिए प्रेरित करती है कि Minor children का कल्याण अभी याचिकाकर्ता की कस्टडी में ही सबसे बेहतर होगा. यह निष्कर्ष दर्ज कराने के साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने Minor children की कस्टडी को लेकर पति-पत्नी के बीच चल रहे मामले को निस्तारित कर दिया है.
कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ता मां Minor children की अच्छी तरह से देखभाल करने में आर्थिक रूप से सक्षम है क्योंकि वह पढ़ी-लिखी है और उसे अपने माता-पिता का भी समर्थन प्राप्त है. कोर्ट ने Minor children को तत्काल मां गरिमा शर्मा की कस्टडी में सौंपनी का आदेश दिया. साथ ही पिता और पुत्र के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने के लिए पिता आकाश शर्मा को भी मुलाकात का अधिकार दे दिया.
कोर्ट ने कहा कि वह याचिकाकर्ता को पहले से सूचित करके घर पर जब चाह Minor children से मिल सकता है. स्कूल से लौटने के बाद पिता जब चाहे तब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बच्चे से बातचीत कर सकता है. Minor children की मां ऐसी मुलाकात या बातचीत में कोई रुकावट या बाधा नहीं डालेगी. स्कूल की छुट्टियों के दौरान पिता नाबालिग बच्चे की कस्टडी की मांग कर सकता है और छुट्टियां खत्म होने के बाद वापस Minor children की मां को सौंप देगा. कोई भी पक्ष बच्चे को लेकर भारत के बाहर नहीं जाएगा.
यह मामला आंशिक रूप से गाजियाबाद और आंशिक रूप से फरीदाबाद से जुड़ा हुआ है. आकाश शर्मा और गरिमा शर्मा की शादी के बाद एक Minor children पैदा हुआ जिसे रुद्र नाम दिया गया था. बच्चे के पैदा होने के बाद पति पत्नी के रिश्तों में खटास आ गयी और दोनों अलग हो गये. बच्चे को दोनों अपने पास रखना चाहते थे. इसी को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था जिसे लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में हैबियस कार्पस याचिका दाखिल की गयी थी.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रतिवादी आकाश शर्मा (Minor children के पिता) से बातचीत की. उन्होंने बताया कि वे दिल्ली में विश्व बैंक की ब्रांच में कार्यरत हैं और प्रति माह लगभग 4.5 लाख रुपये कमा रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि Minor children का दाखिला फरीदाबाद के एक स्कूल में कराया है, जहाँ वह अभी अपनी पढ़ाई कर रहा है.
कहा कि Minor children को फरीदाबाद में उनकी कस्टडी से ले जाया गया था और इसलिए, इस हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करने और निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र इस कोर्ट के पास नहीं है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता मुंबई में कार्यरत हैं और एक कामकाजी महिला होने के नाते, वे Minor children की व्यक्तिगत रूप से देखभाल करने की स्थिति में नहीं होंगी. इसलिए बच्चे को पिता की कस्टडी में सौंपा जाना चाहिए.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता श्रीमती गरिमा शर्मा से भी बातचीत की. उन्होंने बताया कि अप्रैल 2026 तक Minor children उनके साथ था. उन्होंने Minor children का दाखिला गाजियाबाद के एक स्कूल में कराया था, जहाँ से कथित तौर पर बच्चे के पिता ने उन्हें जानकारी दिये बगैर बच्चे को अपनी कस्टडी में ले लिया.
उन्होंने कहा कि बच्चे की उम्र पाँच साल से कम होने के कारण वे उसकी कस्टडी की हकदार हैं. वह मुंबई में एनवायरनमेंटल इंजीनियर के तौर पर काम कर रही हैं और प्रति माह लगभग 80,000 रुपये कमा रही हैं. उनके काम के घंटों के दौरान नाबालिग बच्चे की देखभाल उनके माता-पिता करेंगे, जो इस उद्देश्य के लिए उनके साथ मुंबई में रहने को तैयार हैं.
कोर्ट ने Minor children रुद्र पाराशर से भी बातचीत की ताकि उसकी परवरिश, भावनात्मक जुड़ाव और दोनों पक्षों को पहचानने की क्षमता के बारे में पता चल सके. बातचीत के दौरान, बच्चे ने अपनी माँ और पिता दोनों को पहचाना. उसने यह भी बताया कि उसकी माँ उसकी अच्छी देखभाल करती है और उसने अपनी माँ के साथ रहने की इच्छा जताई. याचिकाकर्ता को Minor children को अपनी गोद में लेने के लिए भी कहा गया, और उन्होंने इस निर्देश का पालन किया. बातचीत के दौरान, यह साफ हो गया कि Minor children का याचिकाकर्ता के साथ गहरा भावनात्मक जुड़ाव है.
कोर्ट की शुरुआती राय यह है कि Minor children भावनात्मक रूप से अपनी माँ से जुड़ा हुआ है और उनके साथ सुरक्षित और सहज महसूस करता है. रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी से यह भी पता चलता है कि नाबालिग बच्चे का दाखिला गाजियाबाद के एक स्कूल में कराया गया था. बच्चे के पिता का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने कहा कि बच्चा फरीदाबाद में पिता की कस्टडी में था. मामले की पूरी वजह इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के बाहर पैदा हुई. इसके आधार पर इस हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करने और फैसला सुनाने का अधिकार क्षेत्र इस कोर्ट के पास नहीं है.
इसके उलट, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि Minor children के इलाज के रिकॉर्ड, स्कूल में दाखिले के कागजात और फीस की रसीदें रिकॉर्ड पर लाई गई हैं, जो साफ तौर पर साबित करती हैं कि बच्चा गाजियाबाद में रह रहा था और वहीं एक स्कूल में उसका दाखिला हुआ था. पति-पत्नी को 15.05.2026 को गाजियाबाद जिले के विजय नगर थाने में बुलाया गया था, जहां पुलिस अधिकारियों की दखल से दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ.
समझौते के तहत यह तय हुआ कि Minor children की कस्टडी बारी-बारी से एक महीने के लिए हर माता-पिता के पास रहेगी. पिता समझौते की शर्तों का पालन करने में नाकाम रहा. थाने में दर्ज समझौते की कॉपी में पिता ने साफ माना है कि नाबालिग बच्चा 03.04.2026 से उसकी कस्टडी में था. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इससे साबित है कि नाबालिग बच्चे को गाजियाबाद में याचिकाकर्ता की कस्टडी से जबरदस्ती ले जाया गया था.
इसलिए मामले की वजह इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के भीतर पैदा हुई, जिससे इस कोर्ट को इस हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करने और फैसला सुनाने का अधिकार क्षेत्र मिलता है. अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने नवल किशोर शर्मा बनाम भारत संघ और अन्य, (2014) 9 SCC 329 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया.
कोर्ट ने पक्षों के साथ-साथ Minor children से भी बातचीत की है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किसकी कस्टडी में बच्चे का कल्याण और हित सुरक्षित रहेगा
फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि पक्षों की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों की बात सुनी है और पक्षों के साथ-साथ Minor children से भी बातचीत की है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किसकी कस्टडी में बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित सबसे अच्छी तरह सुरक्षित रहेगा. याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि Minor children को गाजियाबाद के एक स्कूल में भर्ती कराया गया था और स्कूल की फीस याचिकाकर्ता द्वारा भरी जा रही थी. यह भी स्पष्ट है कि नाबालिग बच्चे की कस्टडी को पति—पत्नी में विवाद हुआ था और दोनों विजय नगर थाने पहुंचे थे जहां एक समझौता किया गया था.
यहां तय हुआ था कि नाबालिग बच्चे की कस्टडी एक महीने के लिए याचिकाकर्ता के पास रहेगी और उसके बाद अगले एक महीने के लिए पिता के पास रहेगी और यह बारी-बारी से तब तक चलता रहेगा जब तक कि कस्टडी के मुद्दे का सक्षम न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से निपटारा नहीं हो जाता.
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर लाए गए तथ्यों से यह स्पष्ट है कि नाबालिग बच्चा मां के साथ रह रहा था और उसे पिता द्वारा गाजियाबाद से ले जाया गया था. इससे कार्रवाई का एक हिस्सा निस्संदेह इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के भीतर उत्पन्न हुआ है. इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(2) को देखते हुए, इस न्यायालय को वर्तमान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार करने और निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र प्राप्त है.