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सुप्रीम कोर्ट किसी Legal provision की व्याख्या करता है, तो वह यह बताता है कि कानून का मतलब हमेशा से क्या रहा है , सिंगल बेंच का 2013 का आदेश रद

इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने इंट्रा कोर्ट अपील में शिक्षक के पक्ष में सुनाया फैसला, वेतन भुगतान करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट किसी Legal provision की व्याख्या करता है, तो वह यह बताता है कि कानून का मतलब हमेशा से क्या रहा है , सिंगल बेंच का 2013 का आदेश रद

यह एक स्थापित सिद्धांत है कि जब सुप्रीम कोर्ट किसी Legal provision की व्याख्या करता है, तो वह यह बताता है कि Legal provision का मतलब हमेशा से क्या रहा है. वह अपने फैसले की तारीख से कोई नया Legal provision नहीं बनाता. हाई कोर्ट उस Legal provision को मानने के लिए बाध्य है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने सिविल मिसलेनियस मामले में सिंगल जज द्वारा 29.04.2013 को रिट A नंबर 23422/2013 और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, आजमगढ़ के आदेश को रद्द कर दिया है.

बेंच ने मामले को बीएसए के पास ‘पवन कुमार द्विवेदी’ मामले में तय किए गए Legal provision के आधार पर नए सिरे से विचार करने के लिए भेज दिया है. Legal provision के आधार बीएसए सर्विस रिकॉर्ड, अटेंडेंस रजिस्टर और किसी भी अन्य संबंधित सामग्री से इन बातों की जाँच करेंगे और वेतन का बकाया भुगतान सुनिश्चित करेंगे. यह प्रक्रिया अपीलकर्ता को सुनवाई का मौका देने के बाद बीएसए इस आदेश की सर्टिफाइड कॉपी पेश किए जाने की तारीख से तीन महीने के भीतर पूरी करेंगे. यह फैसला जस्टिस कुणाल रवि सिंह और जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी की बेंच ने सुनाया है.

बेंच ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता 1978 के एक्ट की धारा 10 (Legal provision) के तहत केवल उस अवधि के लिए सैलरी का हकदार होगा जब उसने वास्तव में संस्थान में काम किया और पढ़ाया. चूँकि सेवा की सटीक अवधि दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई स्पष्ट दलील या सामग्री नहीं है, इसलिए कोर्ट देय सैलरी की राशि तय नहीं कर सकता है. यह काम संबंधित सेवा और उपस्थिति रिकॉर्ड की जांच के बाद सक्षम अधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए.

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यह इंट्रा-कोर्ट अपील एकल न्यायाधीश द्वारा सिविल मिसलीनियस रिट याचिका-ए संख्या 23422/2013 (सुरेंद्र शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य) में 29.4.2013 को पारित निर्णय और आदेश तथा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी आजमगढ़ द्वारा 11.4.2013 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग के साथ दाखिल की गयी थी. इसमें यह निर्देश देने की भी मांग की गई थी कि वे सुनिश्चित करें कि अपीलकर्ता को उस तारीख से राज्य के खजाने से वेतन का बकाया भुगतान किया जाए जिस तारीख से उसका वेतन रोका गया था.

याचिकाकर्ता को 01.07.1977 को श्रीमती राम दई बालिका जूनियर हाई स्कूल, दरिया दयालपुर, आजमगढ़ के प्राथमिक अनुभाग में सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था. संस्थान को 1974 में प्राथमिक विद्यालय के रूप में और 1977 में जूनियर हाई स्कूल के रूप में मान्यता दी गई थी. 1980 में संस्थान को अनुदान-सहायता योजना के तहत लाया गया था.

प्रबंधन समिति ने राज्य के खजाने से वेतन भुगतान के लिए अपने शिक्षकों और कर्मचारियों के नाम सौंपे. Legal provision को चेक करने के बाद 03.11.1980 के आदेश द्वारा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने याचिकाकर्ता की नियुक्ति को मंजूरी दी और वेतन भुगतान के लिए स्वीकृत सूची में उसका नाम शामिल किया. याचिकाकर्ता को अक्टूबर 1981 तक राज्य के खजाने से वेतन का भुगतान किया गया, जिसके बाद वेतन का भुगतान रोक दिया गया.

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श्रीमती जगदंबा श्रीवास्तव नाम की एक अन्य शिक्षिका जो समान स्थिति में थीं ने सिविल विविध… रिट याचिका संख्या 10389/1991 (श्रीमती जगदंबा श्रीवास्तव और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) दाखिल की जिसे 15.10.1993 को मंजूरी देते हुए वेतन भुगतान का निर्देश दिया गया था. इस निर्णय के खिलाफ राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई थी.

उसी संस्थान की एक अन्य सहायक शिक्षिका, श्रीमती गायत्री राय, जिनकी नियुक्ति भी 01.07.1977 को हुई थी, ने रिट याचिका संख्या 22154/1988 (श्रीमती गायत्री राय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) दायर की, जिसे 08.03.1996 को मंजूरी दी गई और Legal provision के तहत वेतन भुगतान का निर्देश दिया गया. इसके बाद से उन्हें राज्य के खजाने से वेतन मिल रहा है.

इसके बाद याचिकाकर्ता ने Legal provision के तहत अपना वेतन जारी करवाने के लिए बीएसए से संपर्क किया. इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया तो उन्होंने एक अन्य शिक्षिका के साथ मिलकर रिट याचिका संख्या 33545/1997 (श्रीमती राम दई देवी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) दायर की, जिसका निपटारा 22.07.1998 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदनों पर निर्णय लेने के निर्देश के साथ किया गया.

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इसके बाद 08.10.1998 के आदेश द्वारा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने लेखा अधिकारी को रिकॉर्ड की जांच करने का निर्देश दिया. लेखा अधिकारी ने याचिकाकर्ता को वेतन भुगतान के लिए वित्तीय मंजूरी दे दी. इसके बाद वेतन बिल शुरू में प्रोसेस तो किया गया, लेकिन भुगतान जारी नहीं किया गया. बाद में बीएसए ने वेतन के लिए दावे को खारिज कर दिया.

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी. जिसमें 31.10.2001 को एक अंतरिम आदेश पारित किया गया था. यह रिट याचिका खारिज कर दी गई थी. इससे असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने स्पेशल अपील संख्या 1978/2009 (श्रीमती राम दई देवी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) दायर की. डिवीजन बेंच ने अपील को स्वीकार कर लिया और सिंगल बेंच के फैसले को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए बीएसए आजमगढ़ के पास वापस भेज दिया.

याचिकाकर्ता को सुनवाई का मौका देने के बाद बीएसए ने Legal provision के तहत वेतन भुगतान के लिए याचिकाकर्ता के दावे को खारिज कर दिया. 11.04.2013 के उक्त आदेश को उपरोक्त रिट-ए संख्या 23422/2013 (सुरेंद्र शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य) में चुनौती दी गई.

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रिट-A संख्या 23422/2013 में याचिकाकर्ता द्वारा दावा किया गया कि वह अपने संस्थान के ‘ग्रांट-इन-एड’ योजना के तहत आने के बाद Legal provision के तहत सैलरी पाने का हकदार था, क्योंकि उसकी नियुक्ति एक स्वीकृत पद पर हुई थी. यह भी दावा किया गया था कि उसी संस्थान की एक अन्य शिक्षिका को न्यायालय के आदेशों के माध्यम से सैलरी दी गई थी, और इसलिए उसे वही लाभ न देना भेदभावपूर्ण था.

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि सिंगल जज ने 03.05.1982 के सर्कुलर के क्लॉज 10 (Legal provision) के आधार पर रिट याचिका को खारिज करके गलती की है. उनका कहना है कि अपीलकर्ता की नियुक्ति को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने पहले ही मंजूरी दे दी थी. उनका तर्क है कि 1982 का सर्कुलर बाद में जारी किया गया था और यह पिछली तारीख से लागू नहीं होता है. न तो सर्कुलर और न ही कोई Legal provision यह कहता है कि प्राइमरी सेक्शन के शिक्षकों को पहले से मंजूर वेतन बंद कर दिया जाएगा.

सिंगल जज ने सर्कुलर के क्लॉज 10 को अलग-थलग करके पढ़ा है, जबकि इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि संस्थान को 1980 में ही ग्रांट-इन-एड स्कीम के तहत लाया गया था और सर्कुलर जारी होने से पहले ही अपीलकर्ता को मंजूरी मिल गई थी. सर्कुलर का क्लॉज 14 उन शिक्षकों को सुरक्षा देता है जिनकी नियुक्ति यूपी रिकॉग्नाइज्ड बेसिक स्कूल्स (जूनियर हाई स्कूल्स) (शिक्षकों की भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 1978 के लागू होने से पहले हुई थी, लेकिन इस प्रावधान पर विचार नहीं किया गया है.

अपीलकर्ता के वकील ने ‘स्टेट ऑफ U.P. बनाम पवन कुमार द्विवेदी’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा जताया है. उनका कहना है कि इस अपील में शामिल मुख्य सवाल – क्या किसी ऐसे संस्थान के प्राइमरी सेक्शन में काम करने वाला टीचर, जहाँ कक्षा VI से VIII भी चलती हैं, 1978 के एक्ट की धारा 10 के तहत सैलरी पाने का हकदार है – का जवाब कॉन्स्टिट्यूशन बेंच ने ऐसे टीचरों के पक्ष में पक्के तौर पर दे दिया है.

उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने जूनियर हाई स्कूलों को तीन कैटेगरी में बांटा और माना कि एक ही यूनिट के तौर पर कक्षा I से VIII चलाने वाले संस्थान के लिए 1978 के एक्ट की धारा 10 लागू करने में “कोई मुश्किल नहीं होती है,” और यहाँ तक कि ज्यादा विवादित कैटेगरी वाले संस्थानों में भी, जहाँ पहले से मान्यता प्राप्त सीनियर बेसिक स्कूल में बाद में प्राइमरी सेक्शन जोड़ा गया हो, प्राइमरी सेक्शन के टीचर भी उसी प्रावधान के तहत सैलरी पाने के उतने ही हकदार हैं.

वकील का कहना है कि 1982 के सर्कुलर का क्लॉज 10, सिर्फ एक एग्जीक्यूटिव निर्देश है, उसे किसी कानूनी जिम्मेदारी (Legal provision) को सीमित करने के तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता, जिसकी सुप्रीम कोर्ट ने बाद में आधिकारिक तौर पर व्याख्या की है इसलिए विवादित आदेश और फैसला, जो बाद के इस फैसले पर विचार किए बिना सिर्फ क्लॉज 10 के आधार पर लिया गया था, उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता.

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राज्य-प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए वकीलों ने, सिंगल जज के फैसले और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा पारित आदेश का समर्थन किया. उनका कहना है कि हालाँकि संस्थान को ग्रांट-इन-एड स्कीम के तहत लाए जाने के बाद शुरू में अपील करने वाले को सैलरी दी गई थी, लेकिन अक्टूबर 1981 से भुगतान सही ढंग से बंद कर दिया गया था क्योंकि अपील करने वाला जूनियर हाई स्कूल से जुड़े प्राइमरी सेक्शन में काम कर रहा था और सैलरी भुगतान के नियमों के तहत राज्य के खजाने से सैलरी पाने का हकदार नहीं था.

स्टैंडिंग काउंसिल ने कहा कि डिस्ट्रिक्ट बेसिक एजुकेशन ऑफिसर ने 03.05.1982 के सर्कुलर के क्लॉज 10 पर सही ढंग से भरोसा किया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि 1978 एक्ट (Legal provision) के तहत सैलरी सिर्फ क्लास VI से VIII में काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को दी जाती है न कि क्लास I से V वाले प्राइमरी सेक्शन में काम करने वालों को. उनका कहना है कि मौजूदा स्पेशल अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि विरोधी तर्कों पर विचार करने से पहले, उस Legal provision पर ध्यान देना जरूरी है जिसके तहत दावा किया गया है. 1978 एक्ट की धारा 10 इस प्रकार है:

  • “10. सैलरी के संबंध में दायित्व—
  • (1) राज्य सरकार हर संस्थान के शिक्षकों और कर्मचारियों की उस सैलरी के भुगतान के लिए जिम्मेदार होगी जो तय तारीख के बाद किसी भी अवधि के लिए देय हो.”
  • (2) राज्य सरकार, उप-धारा (1) के तहत अपनी किसी भी देनदारी की रकम को संस्थान की संपत्ति से होने वाली आय को जब्त करके वसूल कर सकती है, मानो वह रकम संस्थान पर बकाया जमीन का लगान हो.
  • (3) इस धारा की कोई भी बात शिक्षक या कर्मचारी के ऐसे किसी भी बकाया के लिए संस्थान की देनदारी को कम नहीं करेगी.
  • 1978 के अधिनियम की धारा 2(e) में “संस्थान” शब्द को इस तरह परिभाषित किया गया है: “एक मान्यता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल जिसे उस समय राज्य सरकार से रखरखाव अनुदान मिल रहा हो.” उस समय, 1978 के अधिनियम में “जूनियर हाई स्कूल” शब्द की परिभाषा नहीं दी गई थी. इसी कमी के कारण पवन कुमार द्विवेदी मामले में सुप्रीम कोर्ट को विवाद का निपटारा करना पड़ा.
  • पवन कुमार द्विवेदी मामले में संविधान पीठ ने उसी मुद्दे पर विचार किया जो इस अपील में उठा है. सवाल यह था कि क्या ऐसे स्कूल के प्राइमरी सेक्शन में काम करने वाला शिक्षक, जिसमें कक्षा VI से VIII तक की कक्षाएं भी चलती हैं, 1978 के अधिनियम की धारा 10 के तहत वेतन पाने का हकदार है, या क्या यह लाभ केवल कक्षा VI से VIII तक के शिक्षकों को ही मिलता है.
  • कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:—
  • (i) संस्थान एक ही जूनियर हाई स्कूल है जिसमें कक्षा I से VIII तक की पढ़ाई होती है. यह पवन कुमार द्विवेदी मामले में कॉन्स्टिट्यूशन बेंच द्वारा पहचानी गई पहली श्रेणी में आता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 1978 के एक्ट (Legal provision) की धारा 10 स्पष्ट रूप से लागू होती है.
  • (ii) 1982 के सर्कुलर का क्लॉज 10 सिर्फ एक एग्जीक्यूटिव निर्देश है. यह संविधान पीठ द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार 1978 के एक्ट (Legal provision) की धारा 10 को ओवरराइड नहीं कर सकता. इसलिए, डिस्ट्रिक्ट बेसिक एजुकेशन ऑफिसर और सिंगल जज का उस सर्कुलर के आधार पर अपीलकर्ता को सैलरी देने से इनकार करना सही नहीं था.
  • (iii) अपीलकर्ता का दावा देरी के कारण खारिज नहीं होता है. वह सर्कुलर के क्लॉज 10 की वैधता को चुनौती नहीं दे रहा है. वह केवल 1978 के एक्ट (Legal provision) की धारा 10 की सही व्याख्या का लाभ मांग रहा है, जैसा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बताया था.
  • (iv) 2018 का संशोधन, जो “जूनियर हाई स्कूल” शब्द का सीमित अर्थ देता है, केवल उस तारीख से लागू होता है जब वह लागू हुआ था. यह संशोधन से पहले की अवधि के लिए अपीलकर्ता के सैलरी के दावे को प्रभावित नहीं करता है.
  • (v) सिंगल जज द्वारा 29.04.2013 को दिया गया फैसला और डिस्ट्रिक्ट बेसिक एजुकेशन ऑफिसर द्वारा 11.04.2013 को दिया गया आदेश केवल 1982 के सर्कुलर के क्लॉज 10 की व्याख्या पर आधारित थे, लेकिन पवन कुमार द्विवेदी मामले में बाद में तय किए गए कानून को देखते हुए, उन्हें बरकरार नहीं रखा जा सकता है.

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