इलेक्ट्रोहोम्योपैथी Certificate नेशनल कमीशन फार इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन एक्ट, 2020 के तहत एलोपैथी की प्रैक्टिस के तय मानकों को पूरा करने में नाकाम
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सील की गई क्लिनिक को फिर से खोलने और एलोपैथी की प्रैक्टिस करने की इजाजत मांगने वाली याचिका को खारिज किया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि इलेक्ट्रोहोमियोपैथी Certificate का इस्तेमाल मॉडर्न मेडिसिन या एलोपैथी की प्रैक्टिस करने के अधिकार के तौर पर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि पब्लिक हेल्थ से जुड़े नियम मेडिकल प्रैक्टिस को सिर्फ उन लोगों तक सीमित करते हैं जिनके पास मान्यता प्राप्त क्वालिफिकेशन Certificate और रजिस्ट्रेशन हो. कोर्ट ने माना कि जिस व्यक्ति के पास किसी खास मेडिकल सिस्टम में क्वालिफिकेशन Certificate नहीं है, वह उस सिस्टम के तहत मरीजों का इलाज करने का अधिकार नहीं जता सकता.
यह रिट एटा जिले के रहने वाले संतोष कुमार शर्मा की ओर से दाखिल की गयी थी. इसमें मुख्य चिकित्सा अधिकारी एटा द्वारा 16.02.2026 को पारित आदेश को चुनौती दी गयी थी जिसके तहत उत्तर प्रदेश सरकार के प्रिंसिपल सेक्रेट्री द्वारा जारी पत्र संख्या 1670/(1)/03.06.2024 के अनुपालन में याचिकाकर्ता के अस्पताल को सील कर दिया गया. याचिकाकर्ता ने आधुनिक चिकित्सा पद्धति से इलाज करने की अनुमति देने की भी मांग की थी.
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपने इलेक्ट्रोहोमियोपैथी Certificate के आधार पर एलोपैथी की प्रैक्टिस करने का हकदार नहीं है. उसका क्लिनिक भी अलग-अलग सरकारी आदेशों और नेशनल कमीशन फार इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन एक्ट, 2020 के तहत तय मानकों को पूरा करने में नाकाम रहा.
याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए उसके अधिवक्ता ने दावा किया था कि पिटीशनर ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग से कम्युनिटी हेल्थ में वोकेशनल Certificate हासिल किया था और उस Certificate और अनुभव के आधार पर वह एलोपैथ की प्रैक्टिस करने के योग्य था. चीफ मेडिकल ऑफिसर ने पहले उससे अपनी डिग्रियां और एजुकेशनल रिकॉर्ड जमा करने को कहा था जिनसे यह साबित हो सके कि उसे मेडिसिन की प्रैक्टिस करने का अधिकार है.
लेक्ट्रोहोमियोपैथी में डिग्री (Certificate) के आधार पर क्लिनिक के रजिस्ट्रेशन या संचालन की इजाजत नहीं दी जा सकती
नोटिस और रिप्रेजेंटेशन के बाद, अथॉरिटी ने उसके दावे को खारिज कर दिया. अथॉरिटी ने कहा कि वह चीफ मेडिकल ऑफिसर के ऑफिस में रजिस्टर्ड हुए बिना एलोपैथिक दवाओं से मरीजों का इलाज कर रहा था, और इलेक्ट्रोहोमियोपैथी में डिग्री (Certificate) के आधार पर क्लिनिक के रजिस्ट्रेशन या संचालन की इजाजत नहीं दी जा सकती.
अथॉरिटी ने यह भी नोट किया कि इलेक्ट्रोहोमियोपैथी में Certificate या डिप्लोमा एलोपैथिक मेडिसिन में प्रैक्टिस की इजाजत नहीं दे सकता और क्लिनिक जरूरी मानकों को पूरा नहीं करता था, जिनमें बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट, फायर सेफ्टी क्लीयरेंस और इन्फेक्शन से बचाव और कंट्रोल की जरूरत शामिल हैं. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसे अपनी बात रखने का उचित मौका नहीं दिया गया, उसके खिलाफ की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत किसी भी पेशे (जिसमें चिकित्सा भी शामिल है) को अपनाने का अधिकार सुरक्षित है.
याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने कहा कि इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का Certificate आधुनिक चिकित्सा पद्धति से इलाज करने का अधिकार नहीं देता और क्लिनिक को सील करने का आदेश कानूनी रूप से सही था. कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए शुरुआत की कि पब्लिक हेल्थ की सुरक्षा राज्य की मुख्य जिम्मेदारी है और मेडिकल प्रैक्टिस कोई बिना नियम-कानून वाला पेशा नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि आम जनता की सेहत राज्य सरकार की जिम्मेदारी है. इसके नाम पर किसी भी नीम-हकीम को आम जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. मेडिकल प्रैक्टिस, कानून और सरकारी आदेशों से नियंत्रित होती है, जो इसके नियम और मानक तय करते हैं. अयोग्य डॉक्टरों से पब्लिक हेल्थ की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है.
पूनम वर्मा बनाम अश्विन पटेल (1996) और डॉ. मुख्तार चंद बनाम पंजाब राज्य (1998) का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा की एक प्रणाली के तहत रजिस्टर्ड डॉक्टर जरूरी योग्यता और रजिस्ट्रेशन Certificate के बिना दूसरी प्रणाली में प्रैक्टिस नहीं कर सकता. कोर्ट ने कहा कि यह अच्छी तरह से तय है कि चिकित्सा की एक प्रणाली के तहत रजिस्टर्ड डॉक्टर जरूरी योग्यता और रजिस्ट्रेशन के बिना दूसरी प्रणाली, खासकर ‘एलोपैथी’ में प्रैक्टिस नहीं कर सकता. ऐसा करना अपने आप में लापरवाही है जिससे डॉक्टर और जनता दोनों को गंभीर खतरा हो सकता है.
डॉ. मुख्तार चंद बनाम पंजाब राज्य (1998) 7 SCC 579 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली का डॉक्टर एलोपैथिक दवाएं तब तक नहीं लिख सकता जब तक कि संबंधित कानून या उसके तहत बने नियमों में इसकी स्पष्ट इजाजत न हो. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे को खारिज कर दिया कि उसका Certificate उसे एलोपैथी की प्रैक्टिस करने का अधिकार देता है.
“इलेक्ट्रो-होम्योपैथी में याचिकाकर्ता के Certificate को किसी भी तरह से एलोपैथी की प्रैक्टिस करने के अधिकार वाली वैध डिग्री/डिप्लोमा नहीं माना जा सकता.”
बेंच ने कहा

कोर्ट ने यह भी पाया कि क्लिनिक न केवल योग्यता के मामले में, बल्कि नियमों के पालन के मामले में भी विफल रहा था. कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने और रिकॉर्ड देखने के बाद, यह बात सामने आई है कि भले ही याचिकाकर्ता के पास इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का Certificate है, लेकिन इसके आधार पर वह मॉडर्न मेडिसिन, खासकर एलोपैथिक सिस्टम में प्रैक्टिस करने का हकदार नहीं है. याचिकाकर्ता के क्लिनिक से सील हटाने से इसलिए इनकार कर दिया गया क्योंकि वह अस्पताल/क्लिनिक चलाने के मानकों को पूरा नहीं करता है और उस अस्पताल परिसर में अयोग्य डॉक्टर भी मॉडर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस करते पाए गए थे.
कोर्ट ने कानूनी मेडिकल प्रैक्टिस और संबंधित सिस्टम में अयोग्य व्यक्ति द्वारा इलाज के बीच स्पष्ट अंतर भी बताया. बेंच ने कहा कि कोई व्यक्ति जिसे चिकित्सा के किसी खास सिस्टम की जानकारी नहीं है, लेकिन वह उस सिस्टम में प्रैक्टिस करता है, तो वह नीम-हकीम है और मेडिकल ज्ञान या कौशल का केवल दिखावा करने वाला है, या दूसरे शब्दों में उसे ज्यादा से ज्यादा ढोंगी कहा जा सकता है.
कोर्ट ने माना कि एलोपैथिक प्रैक्टिस के लिए मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता जरूरी है और अयोग्य व्यक्तियों को प्रैक्टिस करने की अनुमति देना सीधे तौर पर संबंधित कानून के खिलाफ होगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का क्लिनिक चीफ मेडिकल ऑफिसर के पास रजिस्टर्ड नहीं था, जो मॉडर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस और मरीजों के इलाज के लिए जरूरी था. किसी पेशे को अपनाने के अधिकार पर आधारित तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि आर्टिकल 19(1)(g) आम जनता के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन है.
“भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(g) के तहत कोई भी पेशा अपनाने का अधिकार पूरी तरह से असीमित नहीं है; इस पर उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं, जो राज्य आम जनता के हित में आर्टिकल 19(1)(g) के तहत लगा सकता है (चिंतामन राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य, AIR 1951 SC 118). रेगुलेटरी उपाय यह पक्का करते हैं कि सिर्फ क्वालिफाइड और रजिस्टर्ड लोग ही मेडिकल प्रैक्टिस करें और क्लिनिकल संस्थान तय मानकों को पूरा करें. ऐसी पाबंदियां जन-स्वास्थ्य के हित में जायज और उचित हैं और इन्हें भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(g) का उल्लंघन नहीं माना जा सकता (देखें गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात, (2005) 8 SCC 534).”
कोर्ट ने कहा
कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्टिकल 226 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, वह सक्षम एक्सपर्ट अथॉरिटीज के निष्कर्षों की जगह अपनी राय नहीं रख सकता. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इलेक्ट्रोहोम्योपैथी Certificate के आधार पर मॉडर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस करने का हकदार नहीं था, और उसका क्लिनिक तय कानूनी और रेगुलेटरी मानकों को पूरा करने में भी नाकाम रहा था. कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है.