Compassionate Appointment: रेलवे का इंकार का आदेश रद्द, योग्यता के आधार पर पुनर्विचार का निर्देश

ललितपुर के ग्राम लखिपुरा निवासी सावन सिंह के पिता स्वर्गीय हर चरण उत्तर मध्य रेलवे, झांसी मंडल में गैंगमैन थे. सेवा के दौरान 19 जुलाई 2009 को उनका निधन हो गया. उस समय आवेदक की उम्र करीब 26 वर्ष थी. आवेदक ने 2010, 2012 और 2013 में Compassionate Appointment के लिए अभ्यावेदन दिए, फिर 20 नवंबर 2014 को भी आवेदन किया और 3 जून 2015 को अनुस्मारक भेजा.
सुनवाई न होने पर वह अधिकरण पहुंचा, जिसने 13 अगस्त 2018 को रेलवे को उसके अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया. इसके बाद मंडल रेल प्रबंधक (कार्मिक) ने 13 नवंबर 2018 को Compassionate Appointment का दावा खारिज कर दिया.
Compassionate Appointment का दावा खारिज करते हुए रेलवे का कहना था कि आवेदक केवल कक्षा 8 पास है, जबकि वेतन बैंड-I (ग्रेड पे 1,800 रुपये) के पद पर सीधी भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता 10वीं पास या आईटीआई अथवा समकक्ष है. रेलवे ने यह भी कहा कि आवेदक ने पांच साल की निर्धारित अवधि में दावा नहीं किया, वह बालिग था और Compassionate Appointment अधिकार का विषय नहीं, बल्कि तात्कालिक आर्थिक राहत का साधन है.
आवेदक के अधिवक्ता एसडी द्विवेदी ने कहा कि रेलवे बोर्ड के 9 दिसंबर 2010 और 27 जुलाई 2017 के पत्रों में तय योग्यता उस पर गलत तरीके से लागू की गई. उनके अनुसार Compassionate Appointment के दावे पर आवेदन के समय यानी 2010 में लागू नियमों के आधार पर विचार होना चाहिए था. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली जल बोर्ड बनाम निर्मला देवी के फैसले का हवाला दिया.
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि Compassionate Appointment के लिए आवेदन की तिथि पर प्रचलित योग्यता पर विचार होना चाहिए, न कि उस तिथि पर जब आवेदन पर निर्णय लिया जाए. अधिकरण ने माना कि रेलवे ने इस बात का खंडन नहीं किया कि दावा लंबे समय तक लंबित रहा और अंततः अधिकरण के आदेश के बाद ही विचार हुआ. ऐसे में आवेदक को केवल बाद में बदली शैक्षणिक योग्यता के आधार पर दावे के विचार से वंचित नहीं किया जा सकता.
अधिकरण ने मूल आवेदन स्वीकार करते हुए 13 नवंबर 2018 का आदेश रद्द कर दिया. रेलवे को निर्देश दिया गया कि वह 2010 में दिए गए आवेदन की तिथि और सामग्री तथा उस समय निर्धारित शैक्षणिक योग्यता का सत्यापन कर दावे पर पुनर्विचार करे.और तीन महीने के भीतर नया सकारण और स्पष्ट आदेश पारित करें.
सिर्फ आपराधिक केस पर सिपाही का Appointment निरस्त नहीं किया जा सकता, एसपी मऊ का आदेश रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ आपराधिक केस लंबित होने से अभ्यर्थी का Appointment निरस्त नहीं किया जा सकता, उसे भर्ती से बाहर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यूपी पुलिस सिपाही भर्ती 2023 के एक चयनित की अभ्यर्थिता (Appointment) निरस्त करने का आदेश रद्द कर दिया है. जस्टिस मनीष कुमार निगम ने सूरज कनौजिया की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि नियुक्ति प्राधिकारी ने बिना स्वतंत्र न्यायिक विवेक का प्रयोग किए आदेश पारित किया.
याची अधिवक्ता का कहना था कि याची लिखित परीक्षा और मेडिकल में सफल होकर सिपाही (सिविल पुलिस) पद पर चयनित हुआ था. चरित्र सत्यापन में कुशीनगर के थाना तुर्कपट्टी में उनके खिलाफ आबकारी अधिनियम की धारा 60 के तहत मुकदमे में आरोप पत्र दाखिल था. इसी आधार पर जिलाधिकारी कुशीनगर ने उनके नाम की संस्तुति नहीं की. जिसके बाद पुलिस अधीक्षक मऊ ने 26 अगस्त 2025 को उनकी Appointment निरस्त कर दिया.
कोर्ट याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि पुलिस अधीक्षक मऊ ने केवल जिलाधिकारी और एसपी कुशीनगर की संस्तुति स्वीकार कर ली. उन्होंने न तो अपराध की प्रकृति पर विचार किया और न ही 28 अप्रैल 1958 के शासनादेश तथा सुप्रीम कोर्ट के *अवतार सिंह*केस के फैसले के अनुसार स्वतंत्र निष्कर्ष दिया. एफआईआर में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था. एनसीआर केस की कभी विवेचना ही नहीं हुई, इसलिए उसका चरित्र प्रमाण पत्र रोकने में कोई औचित्य नहीं है.
एफआईआर 30 मई 2021 की है और पांच साल से अधिक बीतने पर भी ट्रायल पूरा नहीं हुआ. याची को 16 मई 2025 को केस में जमानत मिल चुकी है. कोर्ट ने कहा याची पर तथ्य छिपाने का कोई आरोप नहीं है, इसलिए राज्य की ओर से पेश राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम,चेतन जेफ और इम्तियाज अहमद मल्ला जैसे फैसले इस मामले में लागू नहीं होते.
कोर्ट ने यह भी माना कि अभ्यर्थी की उपयुक्तता तय करना नियुक्ति प्राधिकारी का विशेष अधिकार है और ऐसे मामलों में अदालत सामान्यतः दखल नहीं देती, लेकिन विवेक का मनमाने ढंग से प्रयोग होने पर हस्तक्षेप करना उचित है. हाईकोर्ट ने 26 अगस्त 2025 का आदेश रद्द कर दिया और पुलिस अधीक्षक मऊ को निर्देश दिया कि वे मामले पर नए सिरे से विचार कर दो माह के भीतर नया आदेश पारित करें.