Fake Document पर केस सिविल नेचर से तय होगा, इसके लिए आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धोखाधड़ी के मामले में माया शर्मा को राहत, आपराधिक कार्यवाही रद्द

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कोई Document तैयार करना कि संपत्ति निष्पादक की अपनी है, यदि बाद में स्वामित्व गलत साबित हो जाए, तो भी यह धारा 467 या 471 के तहत ‘जालसाजी’ की श्रेणी में नहीं आता. यह सिविल नेचर का केस है और इसका निस्तारण भी सिविल केस के जरिए हो सकता है. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने वारणसी की रहने वाली कथित तौर पर जागृति ट्रस्ट की पार्टनर माया शर्मा की अपील पर सुनाया है.
कोर्ट ने वाराणसी के कैंट थाने से जुड़े एक पुराने मामले में माया शर्मा के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी संपत्ति पर कब्जा होने या वहां ट्रस्ट का कार्यालय Document पंजीकृत कराने मात्र से धोखाधड़ी और जालसाजी का आपराधिक मामला नहीं बनता है, क्योंकि Document तैयार करना मुख्य रूप से एक दीवानी (सिविल) प्रकृति का विवाद है.
27 अगस्त 2009 को ‘जागृति ट्रस्ट’ नाम से एक ट्रस्ट का फर्जी Document तैयार कराया
यह पूरा मामला वाराणसी जिले के सिगरा वार्ड के लछिपुरा मोहल्ले में स्थित एक विवादित मकान (संख्या एस-16/38, क्षेत्रफल लगभग 1154.4 वर्ग फीट) से जुड़ा है. प्रशांत शर्मा ने वाराणसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के समक्ष एक शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि माया शर्मा, राजेश कुमार शर्मा और गगन कुमार शर्मा ने एक-दूसरे के साथ मिलीभगत करके 27 अगस्त 2009 को ‘जागृति ट्रस्ट’ नाम से एक ट्रस्ट का फर्जी Document तैयार कराया.
इस ट्रस्ट विलेख Document में उन्होंने खुद को उक्त विवादित मकान का मालिक बताया और ट्रस्ट का पंजीकृत कार्यालय भी इसी मकान में दिखाया, जबकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि यह मकान सुरेश चंद्र शर्मा, दिनेश चंद्र शर्मा, सुरेंद्र चंद्र शर्मा और उनके अन्य पारिवारिक सदस्यों का है. शिकायत के आधार पर 22 अप्रैल 2015 को कैंट थाने में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं (120-B, 419, 420, 467, 468) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी. शुरुआत में पुलिस ने मामले में कोई साक्ष्य न मिलने पर फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी.
उच्चाधिकारियों के निर्देश पर दोबारा जांच कराई गई, जिसके बाद माया शर्मा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट वाराणसी की अदालत ने 27 जुलाई 2017 को इस पर संज्ञान लिया था. इसके बाद माया शर्मा ने इस चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय में धारा 482 CrPC के तहत यह याचिका दाखिल की थी. याचिकाकर्ता (माया शर्मा) के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि विवादित संपत्ति एक पैतृक संपत्ति थी.

इसके संबंध में पूर्व में एक सिविल वाद (मूल वाद संख्या 504/2003) दायर किया गया था, जिसमें 15 जनवरी 2010 को एक समझौता हुआ था. वकीलों का तर्क था कि ट्रस्ट डीड Document 26-27 अगस्त 2009 को ही निष्पादित हो चुकी थी, यानी सिविल समझौते से पहले. इसलिए, उस समय तक याचिकाकर्ता के पास कानूनी अधिकार और हित मौजूद थे. इसके अलावा, उनके बेटे के पक्ष में मौखिक विक्रय अनुबंध भी हुआ था और बयाने के रूप में अग्रिम राशि भी दी गई थी.
दूसरी ओर, निजी प्रतिवादी प्रशांत शर्मा के वकील ने दलील दी कि उन्होंने 12 दिसंबर 2014 को एक पंजीकृत विक्रय विलेख Document के जरिए असली मालिकों से यह संपत्ति खरीदी है. उनका कहना था कि माया शर्मा के पास संपत्ति का कोई वैध स्वामित्व नहीं था, फिर भी उन्होंने गलत तरीके से ट्रस्ट बना लिया और आज भी संपत्ति पर अवैध रूप से कब्जा जमाए हुए हैं. इसलिए उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा चलना बिल्कुल सही है.
जस्टिस संदीप जैन ने मामले की गहराई से समीक्षा की और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे शीला सेबस्टियन बनाम आर. जवाहरराज, मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य और विशाल नोबल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला दिया.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल यह दावा करते हुए कोई Document तैयार करना कि संपत्ति निष्पादक की अपनी है, यदि बाद में स्वामित्व गलत साबित हो जाए, तो भी यह धारा 467 या 471 के तहत ‘जालसाजी’ की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि किसी अन्य व्यक्ति के रूप में प्रतिरूपण न किया गया हो.
कोर्ट ने कहा कि ‘जागृति ट्रस्ट’ के Document को देखने से यह स्पष्ट होता है कि इसमें कहीं भी यह दावा नहीं किया गया है कि माया शर्मा उस मकान की पूर्ण मालकिन हैं. ट्रस्ट डीड Document में केवल यह दर्शाया गया है कि ट्रस्ट का पंजीकृत कार्यालय उक्त पते पर स्थित है. केवल कार्यालय का पता विवादित मकान पर होना इस बात का सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता ने कोई धोखाधड़ी या जालसाजी की है.
अदालत ने यह भी माना कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर पहले से ही दीवानी अदालत में मूल वाद संख्या 1491/2013 लंबित है. आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल निजी रंजिश या दीवानी विवादों को निपटाने के लिए दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता. इन तमाम कानूनी पहलुओं और तथ्यों के आधार पर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माया शर्मा की धारा 482 CrPC के तहत दायर याचिका को स्वीकार कर लिया.
न्यायालय ने वाराणसी के सीजेएम की अदालत में विचाराधीन केस संख्या 10839/2017 (सरकार बनाम माया शर्मा) की संपूर्ण कार्यवाही, 14 जुलाई 2017 की चार्जशीट और 27 जुलाई 2017 के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का असर दीवानी अदालतों में चल रहे अन्य सिविल मुकदमों पर नहीं पड़ेगा. सिविल अदालतें बिना किसी बाहरी प्रभाव के स्वतंत्र रूप से गुण-दोष के आधार पर अपने मामलों का फैसला करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं.