डाक्टर पत्नी के खिलाफ Judicial Magistrate पति की एफआईआर रद्द, हाई कोर्ट ने कहा ऐसा करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-की खंडपीठ ने Judicial Magistrate पति द्वारा पत्नी और दो परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने Judicial Magistrate के इस कृत्य को इसे “द्वेषपूर्ण” और “न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” करार दिया. यह याचिका सुषमा रानी व 2 अन्य ने याचिका दाखिल की थी. इसमें उन्होंने 17 जनवरी 2026 को थाना नॉलेज पार्क, ग्रेटर नोएडा, जिला गौतमबुद्ध नगर में दर्ज एफआईआर को चुनौती दी थी.
यह एफआईआर Judicial Magistrate राहुल आनंद ने भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 318(1), 115(2), 352, 308(6), 329(1), 324(4), 351(2) और 221 के तहत दर्ज कराई थी. याची सुषमा रानी, शिकायतकर्ता राहुल आनंद की पत्नी हैं. सुषमा रानी पेशे से रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर हैं और बरेली में कार्यरत हैं, जबकि राहुल आनंद स्वयं Judicial Magistrate के पद पर तैनात हैं.
याचिका पर सुनवाई के दौरान 2 अप्रैल 2026 को कोर्ट ने मामले को हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र को भेजा था और तब तक याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण भी दिया था. हालांकि 20 जून 2026 को केंद्र ने रिपोर्ट दी कि “मध्यस्थता पूर्ण हुई, कोई समझौता नहीं हुआ.”
इसके बाद सुनवाई के दौरान कोर्ट में तर्क दिया गया कि Judicial Magistrate की तरफ से दर्ज करायी गयी एफआईआर में घटना की तारीख/समय का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन मूल पाठ से पता चलता है कि कथित घटनाएं 26 मई 2021 से 18 नवंबर 2025 के बीच की हैं. अंतिम घटना (18 नवंबर 2025) से भी एफआईआर दर्ज कराने में करीब दो माह की देरी हुई, जिसका Judicial Magistrate ने कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया.
तलाक की डिक्री की जानकारी Judicial Magistrate ने एफआईआर में क्यों नहीं दी गई

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में कहा है कि बिना संतोषजनक स्पष्टीकरण के देरी से दर्ज एफआईआर के आधार पर मुकदमा नहीं चल सकता. कहा गया कि Judicial Magistrate राहुल आनंद ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक का वाद दायर किया था, जिसमें फैमिली कोर्ट ने 8 सितंबर 2025 को ही तलाक की डिक्री पारित कर दी थी. लेकिन इस तथ्य को एफआईआर में जानबूझकर छुपाया गया.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीधा सवाल पूछा कि 8 सितंबर 2025 को पारित तलाक की डिक्री की जानकारी Judicial Magistrate ने एफआईआर में क्यों नहीं दी गई. इसका राज्य या प्रथम सूचनाकर्ता पक्ष कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एफआईआर स्पष्ट रूप से विलंब से दर्ज हुई है और इस देरी का कोई पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया गया.
एफआईआर में यह दावा किया गया था कि पत्नी तब तक तलाक के लिए सहयोग नहीं देगी, जब तक उसे एक करोड़ रुपये न दिए जाएं, जबकि वास्तविकता यह थी कि एफआईआर दर्ज होने (17 जनवरी 2026) से पहले ही तलाक की डिक्री (8 सितंबर 2025) पारित हो चुकी थी. यानी एफआईआर में दिया गया यह कथन रिकॉर्ड के विपरीत और तथ्यों से परे था.
प्रयागराज में जलभराव पर हाईकोर्ट का स्वतः संज्ञान, जारी किए आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अजित कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने प्रयागराज शहर में हुए जलभराव को लेकर स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) जनहित याचिका कायम की है और जिला प्रशासन को निर्देश जारी किए हैं. मंगलवार को लगातार बारिश के कारण शहर में भीषण जलभराव हो गया है, जिससे न्यायाधीशों को भी अदालत पहुंचने में परेशानी हुई और कोर्ट की सुनवाई देरी से शुरू हुई. इसी को आधार बनाकर कोर्ट ने स्वयं इस मामले पर संज्ञान लिया है.
हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी और नगर आयुक्त, प्रयागराज को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि निचले इलाकों में जलभराव रोकने के लिए पहले से उचित उपाय क्यों नहीं किए गए. सचिव, नगर विकास एवं नियोजन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार को परसों तक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया है, जिसमें यह बताना होगा कि जलभराव रोकने के लिए क्या योजनाएं स्वीकृत की गई हैं क्योंकि इससे न केवल व्यापार ठप हो रहा है बल्कि न्यायाधीशों को अदालत पहुंचने में भी कठिनाई हो रही है, जिससे न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप हो रहा है.
महाधिवक्ता अजय कुमार मिश्रा, अतिरिक्त महाधिवक्ता एमसी चतुर्वेदी, राज्य के स्थायी अधिवक्ता मनोज कुमार सिंह तथा मुख्य स्थायी अधिवक्ता प्रदीप कुमार शाही को अगली सुनवाई में सहयोग करने और संबंधित अधिकारियों को आदेश की सूचना देने का निर्देश दिया गया है. रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश उसी दिन सभी संबंधित प्राधिकारियों तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं.